…तो पाकिस्तान कल की सुबह नहीं देख पाएगा,जब वाजपेयी जी ने अमेरिकी राष्ट्रपति को लिखा था पत्र
अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा
India-Pakistan War : भारत के बंटवारे के बाद जब पाकिस्तान का जन्म हुआ, तो भारत ने भारी मन से ही सही उसके अस्तित्व को स्वीकार लिया और एक जिम्मेदार पड़ोसी की भूमिका निभाई. इसके विपरीत पाकिस्तान हमेशा घोखेबाजी करता आया है. 1947 का युद्ध, 1965 का युद्ध, 1971 का युद्ध और फिर लाहौर समझौते के बाद 1999 का कारगिल युद्ध. हमेशा पाकिस्तान ने भारत की पीठ पर छुरा घोंपा है. भारत-पाकिस्तान के बीच पहलगाम की घटना के बाद से युद्ध जैसे हालात हैं और पाकिस्तान, भारत को परमाणु हथियारों की धमकी दे रहा है, लगता है वह 1999 का कारगिल युद्ध भूल गया है, जब उसके परमाणु बम चला देने की धमकी के बीच वाजपेयी जी ने कहा था, तो पाकिस्तान कल का सूरज नहीं देख पाएगा.
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India-Pakistan War : गृहमंत्रालय ने सभी राज्यों को यह निर्देश दिया है कि वे 7 मई को देश में हवाई हमले से निपटने के लिए उपायों की माॅक ड्रिल कराएं. इस ड्रिल में आम नागरिकों को हवाई हमले की स्थिति में बचाव के उपाय और जरूरी संयंत्रों को बचाने की ट्रेनिंग दी जाएगी. गृहमंत्रालय का यह निर्देश भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसे हालात के मद्देनजर दिया गया है. पहलगाम आतंकी हमले के बाद अबतक भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई तो नहीं की है, लेकिन अपनी संप्रुभता पर हुए हमले का कूटनीतिक से तगड़ा जवाब दिया है, जिसकी वजह से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है और अपने आका की गोद में जाकर बैठ गया है. पीएम मोदी की आक्रामकता से पाकिस्तान की हालत पतली है और वह परमाणु बम की गीदड़ भभकी दे रहा है. लेकिन शायद वह कारगिल युद्ध को भूल गया है, जब भारत ने अपनी नैतिकता के साथ उसके घुसपैठ के जवाब दिया था और अमेरिका के राष्ट्रपति भी हमारे तात्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनके इरादों से डिगा नहीं पाए थे.
कारगिल के युद्ध में पाकिस्तान ने अमेरिका से भारत पर डलवाना चाहा था दबाव
1999 में पाकिस्तान की सेना और आतंकवादियों ने कारगिल में घुसपैठ की थी, जब इस बात की जानकारी सरकार को मिली, तो प्रधानमंत्री वाजपेयी ने संयम दिखाते हुए यह कहा था कि हम एलओसी का उल्लंघन नहीं करेंगे, लेकिन पाकिस्तान ने भारत में घुसपैठ की जो हिमाकत की है, उसका जवाब उसे जरूर दिया जाएगा. जब इस युद्ध में पाकिस्तान की हालत खराब होने लगी तो उसने अमेरिका के सामने गुहार लगाई और कहा कि वह भारत पर इस बात के लिए दबाव बनाए कि वह युद्ध रोके और बातचीत करे. इतना ही नहीं पाकिस्तान की ओर से नवाज शरीफ ने अमेरिका को यह भी कहा था कि अगर युद्ध नहीं रूका तो पाकिस्तान, भारत पर परमाणु बम हमला भी कर सकता है. अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने अपनी आत्मकथा “My Life” में इस बात का जिक्र किया है. अमेरिका की खुफिया एजेंसियों (CIA) को इस तरह की सूचना मिली थी कि पाकिस्तान ने अपने परमाणु हथियारों को तैयार रखा था.
क्या था भारत का रुख और अटल बिहारी वाजपेयी ने क्लिंटन को क्या कहा था
भारत ने कारगिल युद्ध के दौरान अपनी नैतकिता को बनाए रखा और एलओसी का उल्लंघन नहीं किया, लेकिन जब पाकिस्तान ने अमेरिका के जरिए भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की, तो वाजपेयी जी ने उस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के नाम एक गोपनीय पत्र भेजा था. वह पत्र क्लिंटन को तब मिला था, जब वे जिनेवा में थे. The Washington Post के अनुसार यह पत्र बिल क्लिंटन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सैमुअल आर सैंडी ने प्राप्त किया था. इस पत्र में भारत ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अगर पाकिस्तान ने अपने सैनिकों को वापस नहीं बुलाया तो भारत उन्हें खदेड़ेगा ही, संभव है कि पाकिस्तान कल का सूरज ना देखे. भारत की ओर से वाजपेयी जी ने यह दृढ़ प्रतिक्रिया इसलिए दी थी कि पाकिस्तान ने भारत पर परमाणु हमले की बात की थी.
क्लिंटन ने 4 जुलाई को नवाज शरीफ से की मीटिंग
भारत की दृढ़ प्रतिक्रिया के बाद अमेरिका यह समझ गया था कि दक्षिण एशिया में बड़ी अनहोनी हो सकती है, जिसका जिक्र करते हुए बिल क्लिंटन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-“I was deeply disturbed by the possibility that the conflict might escalate into a nuclear confrontation.”— Bill Clinton, My Life. परमाणु युद्ध की स्थिति को बनते देख क्लिंटन ने पाकिस्तान से कहा कि वह घुसपैठ को तुरंत रोके और एलओसी से तुरंत हटने को कहा था. उस वक्त भारतीय मीडिया में इस तरह की खबर भी आई थी कि बिल क्लिंटन ने आधी रात को वाजपेयी जी को फोन किया था, जिसपर उन्हें वैसा ही जवाब मिला था , जैसा कि पत्र में दिया गया था.
भारत की नैतिकता को हमेशा मिला है विश्व का समर्थन
चाहे कारगिल युद्ध हो या 1971 का युद्ध, भारत ने हमेशा अपनी नैतिकता को बनाए रखा है. 1971 के युद्ध में हारे हुए पाकिस्तान पर भारत ने दया करके उसकी पांच हजार वर्गमील से अधिक की जमीन वापस कर दी थी और उसके 93 हजार युद्धबंदियों को भी रिहा कर दिया था, क्योंकि भारत ने युद्ध नैतिकता के आधार पर लड़ा था. 1999 में भी भारत ने एलओसी का सम्मान किया था. भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी किताब My Country My Life में इस बात का जिक्र भी किया है. वे लिखते हैं कि वाजपेयी जी ने एलओसी पार ना करने का निर्णय किया और युद्ध को घुसपैठियों को खदेड़ना तक रखा था, जिसकी वजह से भारत को वैश्विक समर्थन मिला और पाकिस्तान झूठा और गलत साबित हुआ. आज भी भारत को विश्व का समर्थन मिल रहा है, तो उसकी वजह नैतिकता ही है. 26 निर्दोष लोगों की हत्या भारत में घुसकर करना भारत की संप्रभुता का हनन है.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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