इलेक्शन कमीशन पर लीगल ग्रे जोन बनाने, डिजिटल फ्रॉड और राज्य-प्रायोजित उत्पीड़न के माकपा ने लगाये आरोप

बंगाल के दौरे पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार.
SIR Bengal: पश्चिम बंगाल आते ही इलेक्शन कमीशन का काले झंडे से स्वागत करने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने अब चुनाव आयोग पर लीगल ग्रे जोन बनाने, डिजिटल फ्रॉड और राज्य-प्रायोजित उत्पीड़न के आरोप लगा दिये हैं. पार्टी ने ये बातें कब और क्यों कहीं, जानने के लिए पढ़ें ये रिपोर्ट.
जरूरी बातें
SIR Bengal: इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया पर लीगल ग्रे जोन बनाने, डिजिटल फ्रॉड और स्टेट स्पांसर्ड हरासमेंट (राज्य प्रायोजित उत्पीड़न) के आरोप लगे हैं. ये आरोप लगाये हैं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की पश्चिम बंगाल राज्य समिति ने. माकपा के एक प्रतिनिधमंडल ने भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को एक पत्र लिखकर पश्चिम बंगाल में 60 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाये जाने पर गंभीर चिंता जतायी है.
SIR की आड़ में वोटर को नयी और अवैध श्रेणी में डाला
सीपीआई (एम) का आरोप है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) 2026 की आड़ में इन मतदाताओं को ‘अंडर एडजुडिकेशन’ (विचाराधीन) की एक नयी और अवैध श्रेणी में डाल दिया गया है. माकपा ने इसे भारतीय लोकतंत्र पर सीधा हमला करार दिया है.
अंडर एडजुडिकेशन को बताया लीगल ग्रे जोन का निर्माण
माकपा ने कहा है कि कानूनन कोई व्यक्ति या तो ‘मतदाता’ होता है या ‘गैर-मतदाता’. यानी अगर कोई वोटर नहीं है, तो वह वोटर नहीं है. कानून में ‘अंडर एडजुडिकेशन’ (विचाराधीन) जैसी कोई श्रेणी नहीं है. पार्टी का आरोप है कि अल्पसंख्यकों, वंचित समूहों और मतुआ समुदाय के लोगों की आवाज को दबाने के लिए यह अस्पष्ट श्रेणी बनायी गयी है.
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लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर काटे जा रहे अल्पसंख्यकों के नाम
माकपा ने आरोप लगाया है कि ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (Logical Discrepancy) के नाम पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के नाम वोटर लिस्ट से हटाये जा रहे हैं. पार्टी ने इसे एक प्रकार का ‘डिजिटल फ्रॉड’ बताया है. कहा है कि इसमें पुराने सरकारी कर्मचारियों और सत्यापित मतदाताओं के वंशजों के नाम भी शामिल कर दिये गये हैं.
SIR Bengal: अपील के अधिकार में बाधा, फॉर्म-6 का विरोधाभास
माकपा ने कहा है कि प्रशासन नाम काटने का लिखित कारण नहीं दे रहा है. इसकी वजह से लोग कानून के तहत अपील नहीं कर पा रहे हैं. ऑनलाइन सुविधाएं बंद कर दी गयी हैं और गरीब नागरिकों को ऑफलाइन आवेदन के लिए लंबी दूरी तय करने को मजबूर किया जा रहा है. पार्टी ने इसे ‘राज्य-प्रायोजित उत्पीड़न’ करार दिया है.
छोटे अधिकारियों पर एफआईआर काफी नहीं
माकपा ने कहा है कि संस्थागत ईमानदारी की विफलता की उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच करायी जाये. कहा कि केवल छोटे अधिकारियों पर एफआईआर (FIR) करना पर्याप्त नहीं है.
माकपा की चुनाव आयोग से ये हैं मांगें
- अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने से पहले सभी 60 लाख पात्र मतदाताओं के नाम बहाल किये जायें.
- ‘अंडर एडजुडिकेशन’ (विचाराधीन) की स्थिति को तुरंत समाप्त किया जाये और इसके आधार पर किसी की सरकारी सहायता न रोकी जाये.
- नाम हटाने का स्पष्ट लिखित कारण और अपील का स्पष्ट रास्ता दिया जाये.
- जब तक सभी 60 लाख मतदाताओं के नाम बहाल नहीं होते, तब तक चुनाव प्रक्रिया आगे न बढ़ायी जाये. उन्हें अभी वोट देने का अधिकार दिया जाये, उनकी पात्रता की जांच चुनाव के बाद भी जारी रह सकती है.
- अंतिम वोटर लिस्ट जारी होने के बाद किसी भी प्रशासनिक हेर-फेर को रोकने के लिए चुनाव आयोग सख्त निगरानी रखे.
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By Mithilesh Jha
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