लीड :6:::: पहले के सरपंच न्याय व विकास करते थे मुखिया
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 07 Oct 2015 6:43 PM
लीड :6:::: पहले के सरपंच न्याय व विकास करते थे मुखिया7 गुम 1 में पूर्व मुखिया फिलिप तिर्की़7 गुम 2 में पूर्व सरपंच रामचरण भगत़प्रतिनिधि, गुमलावर्ष 1967 की बात है. त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव हुआ था. उस समय चुनाव जीत कर मुखिया व सरपंच बने, कुछ लोग अभी भी जीवित हैं. प्रभात खबर ने ऐसे लोगों […]
लीड :6:::: पहले के सरपंच न्याय व विकास करते थे मुखिया7 गुम 1 में पूर्व मुखिया फिलिप तिर्की़7 गुम 2 में पूर्व सरपंच रामचरण भगत़प्रतिनिधि, गुमलावर्ष 1967 की बात है. त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव हुआ था. उस समय चुनाव जीत कर मुखिया व सरपंच बने, कुछ लोग अभी भी जीवित हैं. प्रभात खबर ने ऐसे लोगों से बात की. अब उनकी उम्र ढल चुकी है. ठीक ढंग से चल नहीं पाते, लेकिन उनसे बात करने के बाद तब और अब का अंतर सामने आता है. तब और अब में काफी अंतर है : रामचरणडुमरी प्रखंड में नवाडीह पंचायत है. 1967 ई के चुनाव में रामचरण भगत सरपंच चुने गये थे. अभी इनकी उम्र 80 साल है. कहा कि 1967 से 1979 तक सरपंच रहा. उस समय सरपंच का काम न्याय करना था और मुखिया क्षेत्र का विकास देखते थे. वार्ड सदस्य सहयोगी होते थे. उस जमाने में कोई वित्तीय अधिकार नहीं था. अलग से कोई फंड भी नहीं था. सरपंच व मुखिया का पद प्रतिष्ठा का होता था. हमारा निर्णय सर्वमान्य होता था. गांव की कोई भी समस्या सरपंच, मुखिया व वार्ड सदस्य ही पंचायत बुला कर सलटाते थे. अब वो बात नहीं रही. सबकुछ बदल गया. कमीशनखोरी व भ्रष्टाचार चरम पर है. अगर अब जाति, आय व आवासीय प्रमाण पत्र में मुखिया, सरपंच व वार्ड सदस्य का हस्ताक्षर कराना है तो पहले घूस देना पड़ता है. इसके बाद कोई काम होता है. अब लोगों का विकास नहीं. प्रतिनिधियों का विकास हो रहा है.अब बिना कमीशन के काम नहीं होता : फिलिप1967 ई में डुमरी प्रखंड के नवाडीह पंचायत के मुखिया फिलिप तिर्की चुने गये थे. उन्होंने 1967 से 1979 तक मुखिया के पद पर काम किये. इनकी उम्र 83 साल है. कहा कि पहले मुखिया का पद रुतबा का होता था. हमारा फैसला पूरा गांव मानता था. जनता की जरूरत को ध्यान में रख कर विकास के काम होते थे. व्यक्तिगत लाभ व योजना को प्राथमिकता नहीं दी जाती थी. हमलोगों का काम लोगों की सेवा करना था. लेकिन आज वैसी बात नहीं है. मुखिया को वेतन मिलता है. अलग से कमीशन खाने के लिए फंड है. कई अधिकार मिले हैं. अपने स्वार्थ की योजना का चयन करते हैं. अब मुखियाओं की कोई प्रतिष्ठा नहीं रही. पहले हमलोग श्रमदान से काम करते थे. एक गांव से दूसरे गांव पैदल चलते थे. लेकिन अब श्रमदान तो दूर, कोई दो कदम पैदल नहीं चलता है. चुनाव जीतने के लिए अब धन-बल का उपयोग होता है.
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