गुमला की 446 गर्भवती महिलाओं की हुई जांच 62 में मिले सिकल सेल व थैलीसीमिया के लक्षण
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :10 Jan 2020 4:41 AM (IST)
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संजय, रांची : सिकल सेल तथा थैलीसीमिया जैसी वंशानुगत बीमारी को लेकर गुमला में झारखंड का पहला पायलट प्रोजेक्ट चल रहा है,जो साल भर चलेगा. पिछले तीन माह में यहां 62 गर्भवती में सिकल सेल तथा थैलीसीमिया के लक्षण पाये गयेे हैं. केंद्र सरकार ने इनकी स्क्रिनिंग (जांच) के इस पायलट प्रोजेक्ट के लिए झारखंड […]
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संजय, रांची : सिकल सेल तथा थैलीसीमिया जैसी वंशानुगत बीमारी को लेकर गुमला में झारखंड का पहला पायलट प्रोजेक्ट चल रहा है,जो साल भर चलेगा. पिछले तीन माह में यहां 62 गर्भवती में सिकल सेल तथा थैलीसीमिया के लक्षण पाये गयेे हैं. केंद्र सरकार ने इनकी स्क्रिनिंग (जांच) के इस पायलट प्रोजेक्ट के लिए झारखंड को 82 लाख उपलब्ध कराये हैं. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम), झारखंड ने इस जांच के लिए केंद्र द्वारा तय संस्था जेनिस 2 मी के साथ सितंबर 2019 में करार किया था.
इसके बाद अक्तूबर से गुमला में जांच का काम शुरू हुआ है. इधर तीन माह (अक्तूबर से दिसंबर) में गुमला में 446 गर्भवती की जांच में ही 44 मामले सिकल सेल के तथा 17 थैलीसीमिया के मिले हैं. वहीं, एक महिला में दोनों के लक्षण मिले हैं. अक्तूबर में 165, नवंबर में 125 तथा दिसंबर में 156 गर्भवती की जांच हुई, जिनमें से उपरोक्त 62 केस पॉजिटिव पाये गये.
अनुमान है कि जिले में बड़ी संख्या में लोग सिकल सेल व थैलीसीमिया से प्रभावित हैं. चिकित्सकों का मानना है कि पहले सिकल सेल बीमारी जनजातीय समुदाय में अधिक पायी जाती थी. पर कालांतर में विभिन्न समुदायों के लोगों के एक दूसरे से मिलने के कारण अब यह वंशानुगत बीमारी अन्य समुदायों में भी पायी जा रही है. गुमला के बाद अन्य जिलों में भी इन बीमारियों की स्क्रिनिंग की योजना है.
केंद्र ने पायलट प्रोजेक्ट के लिए झारखंड को 82 लाख रुपये दिये
क्या है थैलीसीमिया
इस बीमारी से ग्रसित व्यक्ति का शरीर यदि कहीं से कट जाये, तो खून बहना बंद नहीं होता है. इससे उसे कमजोरी का एहसास होता है़ ऐसी परिस्थिति में खून की कमी होने पर मरीज को बार-बार खून चढ़ाने की नौबत आ जाती है.
क्या है सिकल सेल
सिकल सेल रोग में लाल रक्त कण कड़ा व चिपचिपा हो जाता है तथा इसका आकार हंसुए (सिकल) की तरह हो जाता है, इसलिए इसे सिकल सेल कहते हैं. इस रोग से प्रभावित मां-बाप से उनके बच्चे को भी यह रोग मिलता है.
जो जांच चल रही है, यह आगे इस रोग को फैलने से रोकने के लिए इसके प्रबंधन में काम आयेगी. इस जांच से कम से कम यह पता चलेगा कि कितनी महिलाएं या पुरुष इससे प्रभावित हैं. अभी हमारे पास इसका कोई आंकड़ा नहीं है. जन्म लेनेवाले बच्चे के बारे में परिवार को फैसला लेना होता है. सरकार उनकी काउंसेलिंग भी करेगी.
डॉ नितिन मदन कुलकर्णी, प्रधान सचिव स्वास्थ्य विभाग
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