Pakistani Hindu : पाकिस्तान में हिंदुओं की बहू–बेटियां की जाती हैं अगवा, जबरन बदला जाता है धर्म

Edited by Rajneesh Anand
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पाकिस्तानी हिंदू, AI Image

Pakistani Hindu : 1947 के बंटवारे ने जब भारत को दो टुकड़ों में बांटा तो पाकिस्तान मुस्लिम राष्ट्र के रूप में सामने आया. जब देश का ही एक धर्म हो, तो स्वाभाविक है कि अन्य धर्मों के लोग वहां दूसरे दर्जे के नागरिक होंगे. लेकिन पाकिस्तान में हिंदू सिर्फ दूसरे दर्जे के नागरिक नहीं हैं, उनके साथ दुर्व्यवहार भी किया जाता है. खासकर लड़कियों के साथ तो बहुत ही बुरा व्यवहार होता है. जबरन धर्मांतरण और शादी इसका जीवंत उदाहरण है. भारत–पाक के बीच राजनीतिक संबंधों की कटुता का प्रभाव भी पाकिस्तानी हिंदू झेलते रहे हैं. एक नया वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक हिंदू व्यक्ति अपनी बहू–बेटियों की रक्षा के लिए पीएम मोदी से हाथ जोड़कर निवेदन कर रहा है. वह यह अपील कर रहा है कि हिंदुओं की अपील पर ध्यान दें, चाहे वो माइग्रेशन चाहते हों या फिर रिफ्यूजी ही बनकर रहना चाहते हों.

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Pakistani Hindu : एक पाकिस्तानी हिंदू की फरियाद सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें वे पीएम मोदी से यह अपील कर रहे हैं कि उनकी बहू-बेटियों को बचा  लिया जाए. वे हाथ जोड़कर भारत के विपक्षी पार्टियों के नेता से भी अपील कर रहे हैं कि वे प्लीज पाकिस्तानी हिंदू  लड़कियों को बचा  लें. इस रिटायर वृद्ध व्यक्ति का कहना है कि पाकिस्तान में उनकी बहू-बेटियां असुरक्षित हैं, उनके साथ अन्याय होता है, उनका अपहरण कर जबरन उनका धर्म परिवर्तन करा दिया जाता है. पहलगाम की घटना के बाद वहां हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ा है, हालांकि वह व्यक्ति पहलगाम की घटना का जिक्र नहीं करते हैं,  लेकिन यह कहते हैं कि दो दिन पहले छह  लड़कियों का जबरन धर्मांतरण हुआ है. वह व्यक्ति डरा हुआ भी दिखता है इसलिए वह कहता है कि मैं पाकिस्तान की बुराई नहीं कर रहा हूं, पर सच तो कहना पड़ेगा. दरअसल पाकिस्तान में जो हिंदू रहते हैं, उनकी सामाजिक और राजनीति स्थिति बहुत ही खराब है.

1947 में जब देश का बंटवारा हुआ, तो उस वक्त टू नेशन का सिद्धांत धर्म के आधार पर दिया गया था. पाकिस्तान का निर्माण इसलिए किया गया क्योंकि मुसलमानों को अगर देश चाहिए था. बंटवारे के बाद पाकिस्तान एक इस्लामिक देश बना जबकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बना, जहां धर्म के आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं किया जाता है. पाकिस्तान चूंकि एक इस्लामिक राष्ट्र है, इसलिए वहां मुसलमानों के अलावा अन्य धर्म के  लोगों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है. पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यक हैं और उनका दर्जा कानून और समाज दोनों के सामने ही मुसलमानों के बराबर का नहीं है, जबकि भारत का संविधान धर्म के आधार पर किसी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं करता है. 

पाकिस्तान में हिंदुओं की सामाजिक स्थिति

पाकिस्तान में बंटवारे के बाद जो हिंदू रह गए आज के समय में उनकी जनसंख्या पाकिस्तान की कुल आबादी का 1.61% है, जो बंटवारे के वक्त 20.5% थे. हिंदू आबादी की संख्या में लगातार गिरावट की वजह जबरन धर्मांतरण है. पाकिस्तान में जो हिंदू रहते हैं, उनमें से अधिकांश वही लोग हैं, जो दंगे की वजह से पाकिस्तान में फंस गए और वापस नहीं आ पाए. कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें अपने घर से बहुत प्यार था और उन्हें उस वक्त यह महसूस हुआ कि सबकुछ ठीक हो जाएगा और वे यह समझ नहीं पाए कि पाकिस्तान अलग मुल्क का अर्थ क्या होगा. आज उनकी सामाजिक स्थिति यह है कि उन्हें ना तो समाज में बराबरी का दर्जा प्राप्त है और ना ही वे खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं. उनकी लड़कियों का अपहरण कर उनसे जबरन निकाह किया जाता है और उनका धर्म परिवर्तन कराया जाता है. हिंदू अगर इस धर्मांतरण के खिलाफ कोर्ट में जाते हैं, तो उन्हें न्याय नहीं मिलता है. कई बार लड़कियों को बरगलाकर उनका धर्म परिवर्तन कराया जाता है, तो कभी उन्हें घर से उठा लिया जाता है.

धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी रिपोर्ट के अनुसार धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करने वाले लोगों को पाकिस्तान में या तो सजा नहीं दी जाती है या फिर सजा दी जाती है तो वह बहुत ही मामूली सजा होती है. कई लोगों पर ईशनिंदा का कानून लगाकर उन्हें प्रताड़ित किया जाता है. 

हिंदुओं की बहू बेटियां नहीं हैं सुरक्षित

पाकिस्तान में हिंदू परिवार की बहू-बेटियों पर वहां के दबंग नजरें गड़ाए बैठे रहते हैं. अमेरिकी रिपोर्ट में बताया गया है कि जबरन विवाह और जबरन धर्म परिवर्तन यहां आम हैं. इस तरह के मामलों में सजा भी ना के बराबर ही होती है. संयुक्त राष्ट्र ने भी 2023 में पाकिस्तान में जबरन विवाह, धर्म परिवर्तन और अपहरण की घटनाओं पर चिंता जताई थी और कहा था कि नाबालिगों के साथ गलत व्यवहार परेशान करने वाला है. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार हिंदू लड़कियों के जबरन धर्मांतरण के मामले पाकिस्तान में बहुत अधिक हैं, लेकिन उनका कोई अधिकारिक आंकड़ा किसी संगठन के पास नहीं है. गरीब परिवार की लड़कियां इस तरह के धर्म परिवर्तन की शिकार ज्यादा होती हैं. कोर्ट में यह साबित कर दिया जाता है कि उन्होंने अपनी मर्जी से शादी की थी. पाकिस्तान का एक मानवाधिकार संगठन कहता है कि अगर शादी मर्जी से हुई थी, तो फिर लड़कियों को आजीवन उनके परिवार से मिलने क्यों नहीं दिया जाता है, यह बड़ा सवाल है.

भारत के साथ राजनीतिक संबंधों की मार झेलते हैं पाकिस्तानी हिंदू

पाकिस्तान में हिंदुओं की 90% आबादी सिंध प्रांत में रहती है. इसके अलावा ब्लूचिस्तान और पंजाब में भी कुछ हिंदू परिवार रहते हैं. यहां गौर करे वाली बात यह है कि हिंदू परिवार ज्यादातर गरीब हैं और निम्न स्तर का काम करते हैं. जब भी भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक संबंध बिगड़ते हैं, तो इन हिंदुओं को उसकी मार झेलनी पड़ती हैं. इन्हें सामाजिक तौर पर अपमानित किया जाता है और इनके मंदिरों पर हमले किए जाते हैं. यहां हिंदुओं को राज्य विरोधी और इस्लाम विरोधी के रूप में देखा जाता है. 1971 के युद्ध बार इनपर जमकर अत्याचार हुआ था. अयोध्या में विध्वंस के बाद पाकिस्तान में 120 हिंदू मंदिरों को तोड़ा गया था.

नौकरियों में हिंदुओं की अनदेखी

पाकिस्तान के हिंदुओं को शिक्षा और नौकरी में भी भेदभाव का शिकार होना पड़ता है. यही वजह है कि वहां के प्रशासन, नौकरशाही और सैन्य सेवाओं में हिंदुओं की उपस्थिति ना के बराबर है. पाकिस्तानी क्रिकेट के इतिहास में अबतक दो खिलाड़ी सामने आए, जिन्हें टीम में स्थान मिला. इनके नाम हैं अनिल दलपत और दानिश कनेरिया. अनिल दलपत 1984 से 1986 तक खेले. जबकि दानिश कनेरिया को 2000 से 2010 के बीच में खेलने का मौका मिला. इनका आरोप है कि टीम के चयन में हिंदुओं के साथ भेदभाव होता है. यहां की टीम के खिलाड़ी उनके साथ खाना-पीना भी नहीं चाहते हैं. सेना में तो वर्ष 2000 तक हिंदुओं की भर्ती ही नहीं होती थी, बाद में हिंदुओं की भर्ती शुरू हुई है और अधिकारिक आंकड़े तो नहीं हैं, लेकिन कहा जाता है कि सौ से अधिक सैनिक भी सेना में नहीं हैं. राजनीति में भी हिंदुओं को प्रतिनिधित्व का अवसर नहीं मिलता है. वे नामित किए जाते हैं, इसलिए वही व्यक्ति नामित हो सकता है, जिसका राजनीतिक पार्टियों से बेहतर संबंध हो. वोट देने का अधिकार तो हिंदुओं को है, लेकिन वे स्वतंत्र रूप से मतदान नहीं कर पाते हैं, उनपर दबाव होता है.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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