केसरी चैप्टर 2 : क्या आप जानते हैं, जालियांवाला बाग नरसंहार के खिलाफ नहीं लड़ा गया था कोई केस?

Edited by Rajneesh Anand
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केसरी चैप्टर 2

kesari 2 : जालियांवाला बाग नरसंहार पर आधारित मूवी केसरी चैप्टर 2 रिलीज के साथ ही चर्चा में है और लोग इस मूवी को पसंद भी कर रहे हैं. यह मूवी भारत के चर्चित वकील सी शंकर नायर के परपोते की किताब -द केस दैट शुक द एम्पायर: वन मैन्स फाइट फॉर द ट्रुथ अबाउट द जलियांवाला बाग मासकर (The Case That Shook the Empire: One Man’s Fight for the Truth about the Jallianwala Bagh Massacre) पर आधारित है. केसरी 2 मूवी में जालियांवाला बाग नरसंहार का सच दिखाने की कोशिश की गई है. फिल्म के बारे में हीरो अक्षय कुमार ने एक कार्यक्रम में कहा था कि यह इतिहास के अनछुए पहलुओं के जरिए इतिहास को दोबारा लिखने की कोशिश है.

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kesari 2 : जालियांवाला बाग नरसंहार भारतीय इतिहास की एक ऐसी घटना है, जिसे याद कर आज भी लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं और लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर जनरल डायर ने निहत्थे लोगों जिसमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे, उनपर इतना जुल्म क्यों किया? जालियांवाला बाग नरसंहार में अधिकारिक तौर पर 379 लोग मारे गए थे जबकि बताया यह जाता है कि नरसंहार में 1500 से अधिक लोगों को मारा गया था और 2000 से अधिक लोग घायल हुए थे. इस नरसंहार के बाद निहत्थे लोगों पर गोलियां चलवाने वाले जनरल डायर का क्या हुआ? क्या कोई मुकदमा उसपर दायर हुआ? कोई सजा मिली, ऐसे कई सवाल लोगों के मन में है.

केसरी चैप्टर 2 में जालियांवाला बाग का सच सामने लाने की कोशिश

केसरी चैप्टर 2 के जरिए भारत में 13 अप्रैल 1919 में घटित एक घटना का सच सामने लाने की कोशिश की गई है. हालांकि यह मूवी ऐतिहासिक रूप से सच नहीं है, क्योंकि जालियांवाला बाग नरसंहार के बाद कोई मुकदमा कोर्ट तक नहीं पहुंचा था, लेकिन इस मूवी में कोर्टरूम ड्रामा के जरिए जालियांवाला बाग में जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर ने जो हैवानियत की थी, उसका काला चेहरा उजागर करने की कोशिश की गई है, जिसे उस दौर में ढंकने की कोशिश की गई थी. इस फिल्म में जालियांवाला नरसंहार के प्रति आम भारतीयों के मन में जो गुस्सा था उसे दिखाया गया है और यह बताया गया है कि जालियांवाला बाग में भारतीय किसी साजिश को अंजाम देने के लिए नहीं जुटे थे.

कौन थे सी शंकरन नायर , जिनका किरदार केसरी चैप्टर 2 में अक्षय कुमार ने निभाया

सी शंकरन नायर आजादी से पहले भारत के एक काबिल वकील थे. जालियांवाला बाग नरसंहार के बाद उन्होंने अपना विरोध दर्ज कराते हुए वायसराय की कार्यकारिणी से इस्तीफा दे दिया और इस नरसंहार के खिलाफ आवाज बुलंद की थी. उस वक्त उन्होंने एक किताब भी लिखी थी जिसमें इस हत्याकांड का विरोध किया गया था और जनरल डायर को निशाने पर लिया गया था.

जालियांवाला बाग नरसंहार के बाद गठित हुआ था हंटर कमीशन

जालियांवाला बाग नरसंहार के बाद भारतीयों ने इसका बहुत विरोध किया. आम जनमानस में ब्रिटिश सरकार के प्रति नफरत बढ़ गई और उनका विश्वास इस घटना ने डिगा दिया. इसे देखते हुए ब्रिटिश भारत में हंटर आयोग का 29 अक्टूबर 1919 को गठन किया गया. इस आयोग ने 26 मई 1920 को अपनी रिपोर्ट दी. जिसमें यह माना गया कि जनरल डायर का बिना चेतावनी दिए गोली चलवाने का निर्णय गलत था और यह भी माना गया कि भारतीय किसी षडयंत्र को अंजाम देने के लिए वहां जमा नहीं हुए थे. जनरल डायर को पद छोड़ना पड़ा था, लेकिन उसे कोई आपराधिक सजा नहीं सुनाई गई थी. किसी भारतीय ने इस घटना के खिलाफ कोर्ट का रुख नहीं किया था, क्योंकि उस वक्त भारत पर अंग्रेजों का शासन था और भारतीय गुलाम थे.


हंटर आयोग के सदस्य

  • अध्यक्ष – लॉर्ड विलियम हंटर, पूर्व सॉलिसिटर-जनरल
  • डब्ल्यूएफ राइस
  • न्यायमूर्ति जीसी रैनकिन
  • मेजर जनरल सर जॉर्ज बैरो
  • सर चिमनलाल सीतलवाड़
  • पंडित जगत नारायण
  • सरदार सुल्तान अहमद खान

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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