277 लोगों की हत्या का आरोपी ब्रह्मेश्वर मुखिया राक्षस था या मसीहा, उसके आतंक की पूरी कहानी

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 12 Apr 2025 9:00 PM

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ब्रह्मेश्वर मुखिया

Brahmeshwar Mukhiya Ranvir Sena : बिहार के नरसंहारों की जब भी चर्चा होती है, तो एक नाम ब्रह्मेश्वर मुखिया या ब्रह्मेश्वर सिंह जरूर सामने आता है. आज अगर गूगल पर यह नाम सर्च करें, तो आपको एक दुबले-पतले बुजुर्ग की तस्वीर देखने को मिलेगी, जो दबंग या हत्यारा तो प्रतीत नहीं होता है. लेकिन रूकिए, आप उसकी तस्वीर से कोई धारणा ना बनाएं, वह एक बहुत ही शातिर और खतरनाक व्यक्ति है, जिसने बिहार में एक से बढ़कर एक खतरनाक नरसंहारों को अंजाम दिया.

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Brahmeshwar Mukhiya Ranvir Sena : क्या 277 हत्याओं को अंजाम देने वाला ब्रह्मेश्वर मुखिया एक राक्षस था? अगर नहीं तो क्या वह सचमुच नक्सलियों के खिलाफ अपने हक की लड़ाई लड़नेवाला एक योद्धा था? बिहार में कई नरसंहारों को अंजाम देने वाले ब्रह्मेश्वर मुखिया को लेकर यह दो तरह की विचारधारा समाज में मौजूद है. ब्रह्मेश्वर मुखिया ने जब रणवीर सेना का गठन किया था, तो उसने यह कहा था कि वह नक्सलियों को जवाब देना चाहता है, लेकिन उसने जिस तरह महिलाओं और बच्चों को अपना शिकार बनाया, उसके दावे झूठे साबित हो गए.

कौन था ब्रह्मेश्वर मुखिया?

ब्रह्मेश्वर मुखिया रणवीर सेना का संस्थापक था. हालांकि रणवीर सेना नाम का कोई संगठन रजिस्टर्ड नहीं था, लेकिन ब्रह्मेश्वर मुखिया ने एमसीसी के नक्लियों को जवाब देने के लिए इसका गठन किया था. ब्रह्मेश्वर मुखिया ने जो संगठन बनाया था उसका नाम रणवीर किसान महासंघ था, जिसे पुलिस ने रणवीर सेना का नाम दे दिया था. 1990 से 2002 के बीच बिहार में नक्सलियों ने दलितों की आवाज बनने की कोशिश की और यह भी कहा कि जो लोग गरीबों को उनका हक नहीं दे रहे हैं उन्हें हथियारों से जवाब दिया जाएगा. नक्सलियों के इस तरह के ऐलान के बाद बिहार में जातीय संघर्ष बढ़ गया था. जब दलितों की सामूहिक हत्या के बाद बदला लेने की नीयत से नक्सलियों ने सेनारी नरसंहार( 1999) और अफसर नरसंहार(2000) को अंजाम दिया, तो अगड़ी जाति के लोगों का गुस्सा बहुत बढ़ गया. सेनारी नरसंहार में 34 भूमिहारों की और अफसर में 11 भूमिहार और राजपूत की हत्या हुई थी. एमसीसी के उग्रवादियों ने अगड़ी जाति के लोगों के घर में घुसकर उनकी हत्या की थी. तब ब्रह्मेश्वर मुखिया ने 1994 में रणवीर सेना का गठन किया. रणवीर सेना ने बिहार में लक्ष्मणपुर बाथे जैसे नरसंहारों को अंजाम दिया, जिसमें 58 दलितों की हत्या हुई थी. ब्रह्ममेश्वर मुखिया बिहार के भोजपुर जिला के खोपिरा गांव  का रहने वाला था. मुखिया उसे इसलिए कहा जाता था क्योंकि वह अपने गांव का मुखिया था.

अगड़ी और पिछड़ी जाति की वर्चस्व की लड़ाई में रणवीर सेना की भूमिका

रणवीर सेना ने बिहार में अगड़ी और पिछड़ी जाति की लड़ाई को बहुत क्रूर बना दिया. रणवीर सेना ने नक्सलियों को जवाब देने के नाम पर दलितों को अत्याचार किए और बथानी टोला नरसंहार (1996),लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार (1997) और शंकरबिगहा नरसंहार (1999) जैसी घटनाओं को अंजाम दिया. इन नरसंहारों को बहुत ही क्रूर तरीके से अंजाम दिया गया था. रणवीर सेना ने महिलाओं और बच्चों को भी नहीं छोड़ा था और उनके साथ भी क्रूरता की थी. गोली मार कर आग में झोंक देना जैसी घटनाएं आम थीं.

ब्रह्मेश्वर मुखिया पर 277 लोगों की हत्या का आरोप था

ब्रह्मेश्वर मुखिया को भूमिहार और अगड़ी जाति के लोग अपना मसीहा मानते थे क्योंकि वह उनके हक की बात कर रहा था, जबकि दलित उसे राक्षस मानते थे. पांच लाख के इनामी ब्रह्मेश्वर मुखिया को पटना से पुलिस ने गिरफ्तार किया था. उसपर कई मामलों में केस चला, कई केस में वह साक्ष्य के अभाव में छूट गया, बावजूद इसके नौ साल की जेल हुई. जेल से छूटने के बाद उसने यह कहा था कि वह मुख्यधारा में आकर किसानों के लिए काम करेगा.

जुल्म सहने के बाद बनी रणवीर सेना

ब्रह्मेश्वर मुखिया के करीबी रहे बांके बिहारी शर्मा का कहना है कि ये सही है कि मुखिया जी ने रणवीर सेना बनाई, लेकिन इसकी जरूरत क्यों हुई, इसपर कोई बात नहीं करता है. बिहार में भूमिहार जाति पर अत्यधिक अत्याचार एमसीसी के लोग कर रहे थे. आखिर कब तक कोई बर्दाश्त कर सकता है, उस वक्त बिहार में लालू यादव की सरकार थी. एक बार की घटना मैं बताना चाहता हूं कि कुछ लोगों की हत्या एमसीसी वालों ने कर दी और लाश तीन दिनों तक गांव में पड़ा रहा. सरकार ने दोषियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. भूमिहारों को जमीन जोतने नहीं दिया जा रहा था. उनसे उनके लाइसेंसी हथियार छीने जा रहे थे, मजदूरों को मारा जा रहा था. पैसा नहीं देने पर हत्या हो रही थी और सरकार चुप थी, थक कर रणवीर सेना का गठन किया गया. मुखिया जी आतंक नहीं शांति चाहते थे, लेकिन कितने लोगों की बलि होते चुपचाप देखते. वे तो शुरुआत में गांधीवादी थे. 80-85 बीघा के गृहस्थ. अपने मजदूरों की चिंता करने वाले सबको खिलाकर खाने वाले, लेकिन कोई भी कितना अत्याचार सह सकता है? क्रिया के विपरीत तो प्रतिक्रिया होगी ना, सो हुई. मुखिया जी को बदनाम किया जाता है, उन्होंने जिस वजह से रणवीर सेना बनाई , उन कारणों को मिटाने के लिए कुछ नहीं किया गया. सरकारें अत्याचार देखती रही.

2012 में आरा में हुई हत्या

ब्रह्मेश्वर मुखिया के जितने प्रशंसक थे उतने ही आलोचक भी. यही वजह था कि उसकी हत्या 1 जून 2012 में कर दी गई. मुखिया के शव को जब अंतिम संस्कार के लिए पटना लाया जा रहा था, तो उसके समर्थकों ने पटना की सड़कों पर खूब बवाल काटा. हिंसा हुई और पुलिस पर यह आरोप लगा कि उसने दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की. लेकिन डीजीपी अभयानंद ने बल प्रयोग ना करने के अपने निर्णय को सही ठहराया था. 2005 के बाद से बिहार में नरसंहारों का क्रम रूक गया है, लेकिन उसकी यादें आज भी रोंगटे खड़े कर देती है.

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लेखक के बारे में

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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