Belchhi Massacre : बेलछी गांव का नरसंहार, जिसमें 11 दलित की हत्या कर आग में झोंक दिया गया था

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Belchhi Massacre : बेलछी गांव का नरसंहार, जिसमें  11 दलित की हत्या कर आग में झोंक दिया गया था

बेलछी, सेनारी,लक्ष्मणपुर बाथे,पारसबिगहा, मियांपुर, शंकरबिगहा. ये कुछ नाम हैं बिहार में हुए नरसंहारों के. बिहार के नरसंहारों को जाति आधारित माना जाता है,क्योंकि इसकी वजह हमेशा ही दो जातियों के बीच विवाद रही. लेकिन गौर से देखने पर यह पता चलता है कि बिहार के नरसंहारों का इतिहास आर्थिक कारणों से भी जुड़ा है. बेलछी के नरसंहार ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था और राजनीति भी खूब हुई. इंदिरा गांधी यहां गांधी पर चढ़कर पहुंची और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पुन: काबिज होने का रास्ता भी तलाश लिया, लेकिन बेलछी के लोगों को क्या मिला?

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Belchhi Massacre in Bihar : बिहार एक ऐसा राज्य है, जिससे नरसंहार की कई घटनाएं जुड़ी हैं. प्राचीन इतिहास हो या आधुनिक इतिहास नरसंहार की कई घटनाओं से बिहार राज्य दहला है, भले ही हर काल के नरसंहारों के पीछे वजह और परिस्थितियां अलग-अलग रहीं. इतिहास में घटित इन नरसंहारों पर अगर गौर करें, तो हम पाएंगे कि इनके पीछे जातीय संघर्ष था. अगड़ी और पिछड़ी जातियों ने अपने अस्तित्व के लिए खून की गंगा बहाई और हर नरसंहार के बाद पिछली घटना से लंबी रेखा खिंचने की कोशिश की. ऐसे ही कुछ नरसंहारों को एक बार फिर करते हैं याद, ताकि इतिहास और वर्तमान की घटनाओं को बखूबी समझा जा सके.

बिहार में नरसंहारों का इतिहास

बिहार के इतिहास में अबतक जितने नरसंहार हुए हैं, उनपर एक नजर डालें तो प्राचीन इतिहास में कलिंग का युद्ध एक ऐसी घटना है, जिसमें सम्राट अशोक के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ था. सम्राज अशोक के शासनकाल में 261 ईसा पूर्व में कलिंग का युद्ध हुआ था. इस युद्ध की वजह यह थी कि कलिंग (आज का ओडिशा) ने मौर्य साम्राज्य की अधीनता स्वीकार नहीं की थी, इसलिए सम्राट अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया था. अशोक का 13वां शिलालेख, जो ओडिशा के जौगड़ा में स्थित है, में बताया गया है कि कलिंग युद्ध में 1 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई थी और करीब 1.5 लाख लोग बंदी बनाए गए थे. हालांकि इस युद्ध ने सम्राट अशोक का मन परिवर्तन कर दिया और उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया, लेकिन यह युद्ध एक बड़े नरसंहार की याद दिलाता है, जिसे अंजाम देने वाले मगध के सम्राट थे.

आधुनिक भारत की हिला देने वाली घटना बेलछी नरसंहार

आजादी के बाद अगर बिहार की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को समझने का प्रयत्न करें तो हम पाएंगे कि यहां जातीय संघर्ष की वजह से नरसंहार हुए. नरसंहार में शामिल दोनों पक्ष एक दूसरे पर हावी होना चाहता था और इसी का परिणाम था यह नरसंहार.बेलछी नरसंहार 17 मई 1977 में हुआ था, जिसमें कुल 11 लोगों को गोलियों से भूनने के बाद आग में झोंक दिया गया था. बेलछी गांव बिहार की राजधानी पटना से 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इस नरसंहार में जो लोग मारे गए थे, उनमें 8 हरिजन और तीन सुनार जाति के थे. वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश ने अपने एक लेख में इस नरसंहार का जिक्र किया है. उन्होंने लिखा है कि बेलछी नरसंहार को बिहार के अखबारों ने मामूली घटना मान कर नजरअंदाज कर दिया था, लेकिन जब यह मामला राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में उछला तो राजनीतिक वनवास झेल रहीं इंदिरा गांधी हाथी पर चढ़कर बेलछी पहुंचीं थीं और खुद को हरिजनों का हितैषी साबित करने में सफल होने के बाद वे 1980 में वापस पीएम की कुर्सी तक पहुंच गई थीं.

नरसंहार की वजह क्या थी

बेलछी गांव में कुर्मी जाति के लोग संपन्न थे बाकी जातियां गरीबी में जीती थीं. गांव की कुल आबादी 2000 के आसपास होगी. कुर्मी, पासवान, मांझी, कहार, धानुक, हरिजन, यादव और तेली जातियों के लोगों की आबादी यहां है. सुनार जाति के लोग भी यहां रहते थे, लेकिन संख्या कम होने की वजह से नरसंहार के बाद उन्होंने गांव छोड़ दिया. नरसंहार के दो प्रमुख षड्यंत्रकारियों महावीर महतो और परशुराम धानुक को फांसी की सजा तो हुई, लेकिन गांव में दलितों के बीच खौफ बरकरार रहा. बीबीसी से बात करते हुए बेलछी हत्याकांड के जीवित प्रत्यक्षदर्शी जानकी पासवान ने बताया कि नरसंहार दोनों जातियों के इस सोच का परिणाम था कि कौन बड़ा है. विवाद की वजह महज एक कट्ठा जमीन और सिंचाई से जुड़ा था. घटना के दो मास्टरमाइंड के अलावा 13 लोगों को 20-20साल की जेल हुई थी, लेकिन घटना का हासिल यही था कि गांव में जाति आधारित नफरत और बढ़ी.

बेलछी नरसंहार पर खूब हुई राजनीति

बेलछी नरसंहार के बाद देश में हरिजनों का हितैषी होने की होड़ शुरू हुई. इंदिरा गांधी जिनकी सत्ता इमरजेंसी के वजह से छिन गई थी, उन्होंने बेलछी को टारगेट किया और यहां पहुंचीं. यह इलाका काफी पिछड़ा है और यहां तक पहुंचने का रास्ता काफी दुर्गम. यही वजह था कि कुछ दूर पैदल चलने के बाद वे हाथी की मदद से गांव तक पहुंचीं. पत्रकार हरिवंश ने अपने लेख में लिखा है-‘ इंदिरा गांधी गांव में महज 15 मिनट रूकी थीं और इस दौरान वे हाथी से नीचे भी नहीं उतरीं. दलितों की बिलखती महिलाओं से वे महज औपचारिकतावश मिलीं, वह भी हाथी पर बैठे हुए ही.’ लेकिन उन्होंने इस मुद्दे को इस तरह उछाला कि पीएम की कुर्सी तक उनका रास्ता साफ हो गया. लेकिन गांव के गरीबों को जमीन का ना तो पट्टा मिला और ना ही उनकी आर्थिक स्थिति सुधरी, जबकि इस पूरे विवाद का मूल आर्थिक कारण ही था.

आर्थिक कारणों से बिहार में हुए नरसंहार :पूर्वी डीजीपी अभयानंद

बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद ने प्रभात खबर से बात करते हुए यह जोर देकर कहा कि बिहार में जो नरसंहार हुए उनके पीछे वजह सिर्फ जातीय संघर्ष नहीं थे. मैंने इन घटनाओं का बहुत बारीकी से अध्ययन किया है और यह पाया कि जातीय संघर्ष से ज्यादा आर्थिक वजहों से नरसंहार हुए. जातीय संघर्ष समाज में मौजूद थे, लेकिन उसकी वजह से नफरत इतनी नहीं थी कि नरसंहार को अंजाम दिया जाए.

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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