वक्फ बिल पास हुआ तो मुसलमानों के जीवन में क्या होगा बदलाव? सरकार की नीयत पर क्यों उठ रहे सवाल
वक्फ बिल को लोकसभा में पेश करते हुए किरन रिजीजू
What Is Waqf Bill : दुनिया में जितनी भी वक्फ संपत्ति है उसमें सबसे ज्यादा संपत्ति भारत में है, बावजूद इसके भारत का मुसलमान पिछड़ा और अल्पशिक्षित है. पिछड़े मुसलमानों को उनका हक दिलाने और वक्फ का सही इस्तेमाल हो इसकी व्यवस्था के लिए वक्फ संशोधन विधेयक लाया गया है, यह दावा केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार कर रही है. केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्यमंत्री किरन रिजीजू ने लोकसभा में कहा है कि 1995 में यूपीए सरकार ने वक्फ अधिनियम के जरिये इसे अन्य कानूनों से ऊपर कर दिया था,यही वजह है कि इसमें नये संशोधनों की जरूरत पड़ी. सरकार किसी भी सूरत में धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप का इरादा नहीं रखती है और उसका इससे कोई लेना-देना भी नहीं है. बस सरकार यह चाहती है कि वक्फ बोर्ड मनमानी ना करे. लेकिन मुस्लिम समाज और सरकार के विरोधी यह कह रहे हैं कि सरकार की नीयत में खोट है
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What Is Waqf Bill : 2 अप्रैल 2025 को संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी की सिफारिशों के बाद वक्फ बिल को लोकसभा में अल्पसंख्यक कार्यमंत्री किरन रिजीजू ने पेश किया. सरकार ने बिल पेश करते हुए यह स्पष्ट किया कि सरकार का उद्देश्य यह कतई नहीं है कि वह मुसलमानों के धार्मिक मामले में हस्तक्षेप करे, सरकार तो पिछड़े मुसलमानों की स्थिति सुधारने और उनके कल्याण के लिए वक्फ की संपत्ति का इस्तेमाल हो, इस नजरिए से वक्फ बिल लेकर आई है.
संशोधनों के बाद वक्फ बिल में क्या किया गया है प्रावधान
वक्फ बिल में कई ऐसे प्रावधान किए गए हैं, जिनका मुसलमान विरोध कर रहे हैं और वे अभी भी इस मसले को लेकर सरकार के विरोध में खड़े नजर आएंगे. मुस्लिम पक्ष और कांग्रेस जैसी विरोधी पार्टियां यह दावा कर रही हैं कि सरकार वक्फ बोर्ड के अधिकारों को सीमित कर रही है, ताकि मुसलमानों से उनकी संपत्ति छीनी जा सके. जिन प्रावधानों की वजह से नरेंद्र मोदी सरकार के वक्फ बिल का विरोध हो रहा है वे हैं-
- वक्फ बोर्ड में 10 मुस्लिम सदस्य होंगे, जिनमें से दो महिला का होना अनिवार्य है.
- वक्फ बोर्ड में कुल 22 सदस्य होंगे, 2 अप्रैल को जब बिल लोकसभा में पेश हुआ था, तो इसमें गैर मुसलमान सदस्य की भी बात हुई थी, लेकिन बाद में इसमें संशोधन कर दिया गया और अब कोई भी गैर मुसलमान बोर्ड में शामिल नहीं होगा.
- पूर्व अधिकारियों सहित संसद के 3 सांसद भी Centre of council के सदस्य होंगे, जो किसी भी धर्म के हो सकते हैं.
- वक्फ बोर्ड में शिया और सुन्नी दोनों संप्रदाय के मुसलमान शामिल होंगे.
- वक्फ बोर्ड की शक्ति पर अंकुश लगाया गया है और अब वक्फ ट्रिब्यूनल का फैसला अंतिम नहीं होगा, उसे रेवेन्यू कोर्ट, सिविल कोर्ट और हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.
- वक्फ की संपत्ति का रजिस्ट्रेशन जरूरी होगा.
- वक्फ की पूरी संपत्ति का ब्यौरा वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा.
- वैसी संपत्ति वक्फ नहीं की जा सकेगी, जिसपर किसी का हक हो. यानी महिला और बच्चों के अधिकारों को दरकिनार कर कोई संपत्ति वक्फ नहीं की जा सकती है.
- इस्तेमाल के आधार पर वक्फ की संपत्ति का दावा मान्य नहीं होगा, उसके लिए रजिस्ट्रेशन जरूरी है.
- वक्फ बोर्ड के अधिकारों को सीमित किया गया है और जिला कलेक्टर की भूमिका बढ़ाई गई है. अब वक्फ संपत्ति के सर्वेक्षण का अधिकार जिला कलेक्टर के पास है, पहले यह काम एक स्वंतत्र सर्वेक्षण आयुक्त करता था.
- अब वक्फ संपत्ति की पहचान और उसके दस्तावेजीकरण के लिए कलेक्टर सीधे तौर पर जिम्मेदार होंगे.
- कोई संपत्ति वक्फ संपत्ति है या नहीं इसपर विवाद होने पर अब फैसला जिला कलेक्टर द्वारा लिया जाएगा, जबकिन पहले यह अधिकार वक्फ ट्रिब्यूनल के पास था.
- वक्फ बोर्ड के कार्यों का ऑडिट होगा.
- आदिवासियों की जमीन को संरक्षित करने के लिए सरकार ने यह प्रावधान किया है कि उनकी जमीन पर वक्फ बोर्ड दावा नहीं कर पाएगी.
मुसलमानों के जीवन में क्या होगा परिवर्तन

केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्यमंत्री किरन रिजीजू का दावा है कि वक्फ संशोधन विधेयक मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति में बड़ा परिवर्तन लेकर आएगा. रिजीजू यह दावा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि विश्व में सबसे ज्यादा वक्फ प्रोपरिटी भारत में है. लगभग 9.4 लाख एकड़ जमीन है और 8.72 लाख संपत्ति है, जिनसे कमाई 200 करोड़ है. सरकार वक्फ प्रोपरिटी का सही इस्तेमाल कर उनका उपयोग गरीब मुसलमानों के लिए करना चाहती है. पसमांदा मुसमानों का जीवन स्तर सुधरेगा और महिलाओं और बच्चों को फायदा मिलेगा. हालांकि वक्फ संशोधन विधेयक का विरोध करने वाले यह कह रहे हैं कि यह बिल मुसलमानों को नियंत्रित करने और उनका हक मारने के लिए लाया जा रहा है.
क्या कहते हैं प्रबुद्ध मुसलमान
पिछले साल जब अगस्त महीने में वक्फ बिल संसद में पेश किया गया था, तो खूब हंगामा हुआ था. उस वक्त प्रभात खबर ने कई प्रबुद्ध मुसलमानों से बात की थी और उनका यह मानना था कि मोदी सरकार के नीयत में खोट है और वे मुसलमानों के हित के लिए यह विधेयक लेकर नहीं आई है. मौलाना तहजीब, इमाम साजिद रशीदी, हाजी मोहम्मद हारुन और अनवर कासमी सब ने यह शंका जताई थी कि सरकार वक्फ बोर्ड पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहती है और हमारा यह मानना है कि वक्फ मुसलमानों का निजी और धार्मिक मसला है, जिसमें सरकार को दखल नहीं देना चाहिए. गैर मुसलमानों को भी बोर्ड में शामिल करने के वे खिलाफ थे और उनका यह तर्क था कि क्या राममंदिर के ट्रस्ट में किसी मुसलमान को जगह दी जाएगी? अगर दी जाएगी तो हम भी वक्फ बोर्ड में गैर मुसलमान को जगह देने के लिए तैयार हैं.
क्या है वक्फ बोर्ड
अल्लाह के नाम पर दान की गई वस्तु,जिसका उद्देश्य परोपकार हो उसे वक्फ कहते हैं.वक्फ बोर्ड उन चीजों की निगरानी करता है जो अल्लाह के नाम पर दान की गई हो. वक्फ बोर्ड के पास असीमित अधिकार और संपत्ति हैं, जिसकी वजह से वक्फ बोर्ड हमेशा चर्चा में रहता है. वक्फ बोर्ड दान में मिली चल-अचल संपत्ति का सही इस्तेमाल हो इसकी व्यवस्था देखता है. इस्लाम के अनुसार वह इसके उपयोग भी करता है. जैसे मस्जिद बनवाना, शिक्षा की व्यवस्था करवाना और अन्य धार्मिक काम करवाना.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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