50 Years of Emergency : इंदिरा गांधी के चुनाव को कब किया गया था अवैध घोषित, जो बना इमरजेंसी की बड़ी वजह

Edited by Rajneesh Anand
Updated:
विज्ञापन

50 Years of Emergency, AI Image

50 Years of Emergency : देश में 25 जून की रात को इमरजेंसी घोषित हुआ था. इस इमरजेंसी की घोषणा के पीछे, जो तात्कालिक कारण बना था, वो था इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा उनके चुनाव को अवैध घोषित करना. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के 1971 के चुनाव को 12 जून 1975 को अवैध करार दिया था.

विज्ञापन

50 Years of Emergency : 25 जून 1975 को देश में इमरजेंसी या आपातकाल लागू हुआ था, इसके पहले देश में एक बड़ी घटना हुई थी जिसने ना सिर्फ पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था, बल्कि एक तरह से पूरे देश में सनसनी पैदा कर दी थी. वह घटना थी इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द करना. आजाद हिंदुस्तान में यह पहली घटना थी जब किसी प्रधानमंत्री का चुनाव अवैध घोषित किया गया था. कोर्ट में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से दो दिनों तक बहस की गई थी और यह एक अभूतपूर्व घटना थी.

इंदिरा गांधी के चुनाव को कोर्ट ने क्यों कहा था अवैध

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 जून 1975 को जब इंदिरा गांधी के 1971 के रायबरेली लोकसभा चुनाव को अवैध ठहराया, तो इसके पीछे कोर्ट के पास ठोस और संवैधानिक कारण थे. कोर्ट ने यह पाया कि 1971 के चुनाव में चुनाव आचार संहिता और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act, 1951) का उल्लंघन किया है. इंदिरा गांधी ने सरकारी मशीनरियों का दुरुपयोग किया और सरकारी कर्मचारियों को जिनमें यशपाल कपूर का नाम काफी चर्चा में रहा था, उन्हें अपने चुनाव प्रचार में लगाया. इतना ही नहीं सरकारी संसाधनों का भी दुरुपयोग हुआ, जिनमें सरकारी अधिकारी, हेलीकाॅप्टर और अन्य संसाधन शामिल थे. साथ ही इंदिरा गांधी ने अपने चुनाव प्रचार में कई अन्य अनुचित तरीकों का प्रयोग किया, जिससे विपक्ष को नुकसान हुआ. इसी वजह से कोर्ट ने 1971 के चुनाव को रद्द किया और छह साल तक उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था.

1971 में इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़े थे राजनारायण

1971 में इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले नेता राजनारायण एक समाजवादी नेता थे. उन्होंने 1971 में संयुक्त समाजवादी पार्टी की टिकट पर इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा था. वे इंदिरा गांधी के कट्टर विरोधी थे और जब वे चुनाव हार गए, तो उन्होंने 1971 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया और उनके चुनाव को रद्द करने की मांग की. उन्होंने कोर्ट में प्रधानमंत्री पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग किया और भ्रष्ट आचरण से चुनाव जीता.

कोर्ट के फैसले का क्या हुआ प्रभाव

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया, तो उनका पद खतरे में पड़ गया. उस वक्त देश में जेपी का आंदोलन भी चल रहा था, हालांकि इस आंदोलन से इंदिरा गांधी के पद को खतरा नहीं था, लेकिन जब कोर्ट ने उनके चुनाव को अवैध ठहराया, तो आंदोलन से भी यह मांग उठने लगी कि इंदिरा गांधी अपने पद से इस्तीफा दें. 12 जून 1975 के कोर्ट के फैसले के बाद तो यह मांग और तेज हो गई थी. कोर्ट के फैसले और 1975 के माहौल के बारे में बात करते हुए 1974 के आंदोलन में भाग लेने वाले राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता सत्यनारायण मदन ने बताया कि 12 जून को जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने अपना फैसला सुनाया, तो पूरे से देश में सनसनी फैल गई. विपक्षी नेता भी स्तब्ध थे, क्योंकि किसी प्रधानमंत्री वो भी इंदिरा गांधी जैसी शख्सियत के चुनाव को अवैध ठहराने का फैसला कोर्ट ने सुनाया था. जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से तो इंदिरा गांधी हिल ही चुकीं थीं, लेकिन चुनाव रद्द होने के बाद उनकी स्थिति बहुत ही खराब हो गई और इसके बाद ही उन्होंने देश में आपातकाल लागू किया. इसमें कोई दो राय नहीं है कि आपातकाल लागू करवाने में संजय गांधी की भूमिका बहुत अहम थी, लेकिन इंदिरा गांधी पद पर थीं और जो फैसला हुआ, उसके लिए वो निश्चित तौर पर जिम्मेदार मानी जाएंगी.

कोर्ट के फैसले से जेपी के आंदोलन को मिला था बल

संपूर्ण क्रांति आंदोलन के सक्रिय भागीदार और वरिष्ठ पत्रकार श्रीनिवास बताते हैं कि इंदिरा गांधी के खिलाफ जब फैसला आया, तो आंदोलन को बड़ी मजबूती मिली. विपक्ष ने उनसे इस्तीफे की मांग शुरू कर दी. इंदिरा गांधी इस फैसले से बहुत परेशान हो गई थीं. हाईकोर्ट ने उन्हें आगे अपील करने की मोहलत तो दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से भी उन्हें पूर्ण राहत नहीं मिली. जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने इंदिरा गांधी की सदस्यता तो बरकरार रखी,लेकिन संसद में बहस करने और वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया था, जिसके बाद विपक्ष ने उनकी सरकार को अवैध ठहराना शुरू कर दिया था और अंतत: 25 जून की रात को इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी की घोषणा कर दी थी.

Also Read :

50 Years of Emergency : बिहार के योग गुरु धीरेंद्र ब्रह्मचारी, जो इमरजेंसी में थे इंदिरा गांधी के खास सलाहकार

277 लोगों की हत्या का आरोपी ब्रह्मेश्वर मुखिया राक्षस था या मसीहा, उसके आतंक की पूरी कहानी

जब बिहार में एक साथ बिछा दी गईं थीं 30–40–50 लाशें,  नरसंहारों की कहानी कंपा देगी रूह

 बेलछी गांव में हुआ था बिहार का पहला नरसंहार, 11 दलित की हत्या कर आग में झोंक दिया गया था

विभिन्न विषयों पर एक्सप्लेनर पढ़ने के लिए क्लिक करें

विज्ञापन
Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola