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स्वराज के संघर्ष ने जिन्हें ‘लोकमान्य’ बनाया

Updated at : 23 Jul 2024 10:20 AM (IST)
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स्वराज के संघर्ष ने जिन्हें ‘लोकमान्य’ बनाया

वर्ष 1856 में 23 जुलाई को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के चिखली गांव में माता पार्वती बाई और पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक की संतान के रूप में एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्मे लोकमान्य का मूल नाम केशव गंगाधर तिलक था.

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नि:संदेह, ‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर रहेंगे’, आजादी की लड़ाई का सबसे लोकप्रिय नारा था. आज की तारीख में इसकी बाबत यह जानना बहुत दिलचस्प है कि यही नारा था, जिसने महात्मा गांधी का युग शुरू होने से पहले के कांग्रेस के शीर्षस्थ नेता और ‘गरम दल’ की लाल-बाल-पाल के नाम से चर्चित तिकड़ी (जिसके अन्य दो सदस्य लाला लाजपत राय और विपिनचंद्र पाल थे) के ‘बाल’ की ‘लोकमान्यता’ को सर्वथा असंदिग्ध बना दिया था.

सच्चाई तो यह है कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (23 जुलाई, 1856-01 अगस्त, 1920) अपने इस नारे की ही बिना पर स्वराज के सबसे पहले और सबसे प्रखर पैरोकार के रूप में देश के सामने आये. अकारण नहीं कि आजादी की लड़ाई के इतिहास के कई जानकार इस नारे को नारा कम और ब्रिटिश साम्राज्य के लिए चेतावनी अधिक मानते हैं.
इस नारे के पीछे एक बहुत रोचक अंतर्कथा भी है, जो तिलक द्वारा 1881 में चार जनवरी को ‘केसरी’ नामक मराठी समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू करने के बहुत बाद की है.

तब की, जब ब्रिटिश सत्ताधीशों ने उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने केसरी के माध्यम से दो क्रांतिकारियों का बचाव और स्वराज का आह्वान करके देशद्रोह किया है. इसके कुछ ही अरसे बाद उन्हें देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था और छह वर्ष की कड़ी कैद व एक हजार रुपये के जुर्माने से दंडित किया गया था. दरअसल, तिलक ने 1908 में दो क्रांतिकारियों प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस द्वारा मुजफ्फरपुर में अंग्रेज जज किंग्सफोर्ड की बग्घी पर बम फेंकने के समर्थन में केसरी में ‘देश का दुर्भाग्य’ शीर्षक से संपादकीय लिखा था. सत्ताधीशों ने सोचा था कि इस संपादकीय की इतनी बड़ी सजा उनका मनोबल तोड़कर रख देगी.

मनोबल टूटने में कोई कसर न रह जाए, इसके लिए उन्होंने उनकी सजा का त्रास बढ़ाने के लिए उन्हें किसी देशी जेल के बजाय बर्मा (अब म्यांमार) की मांडले जेल में भेज दिया था. पर तिलक तो तिलक थे, उन्होंने मांडले के यातनापूर्ण जेल जीवन के दौरान ही चार सौ पन्नों की ‘गीता रहस्य’ नामक पुस्तक तो लिख ही डाली, अपने पुराने राष्ट्रवादी विचारों को नयी धार भी दे दी. अनंतर, आठ जून, 1916 को सजा काटकर स्वदेश लौटे तो होमरूल लीग की शुरुआत की और मराठी में नारा दिया : स्वराज्य हमाझा जन्मसिद्ध हक्क आहे आणि तासे मी मिळवणारच, अर्थात स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे.

गौरतलब है कि छह वर्ष पहले गोरी अदालत ने इसी स्वराज के आह्वान के लिए उन्हें देशद्रोही करार देकर सजा सुनाई थी, परंतु वह उनके संकल्प को डिगा नहीं पायी और उनका मनोबल टूट जाने का सत्ताधीशों का आकलन भी गलत सिद्ध हुआ था. आगे चलकर उनके इस नारे ने किस तरह पूरे देश में क्रांति की लहर पैदा की और समूचे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य की नाक में दम किये रखा, वह उस संग्राम के इतिहास का सबसे गौरवशाली हिस्सा है.

वर्ष 1856 में 23 जुलाई को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के चिखली गांव में माता पार्वती बाई और पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक की संतान के रूप में एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्मे लोकमान्य का मूल नाम केशव गंगाधर तिलक था. ब्रिटिश साम्राज्यवादी जहां उन्हें ‘भारतीय अशांति का पिता’ कहते थे, भारतवासी अपने स्वतंत्रता संग्राम का जनक मानते थे. केसरी के अलावा उन्होंने ‘मराठा’ (महरट्टा) नाम से अंग्रेजी का पत्र भी निकाला था और दोनों में ब्रिटिश सत्ताधीशों को न केवल उनकी क्रूरताओं, बल्कि भारत की संस्कृति व सभ्यता को कमतर समझने के लिए भी भरपूर कोसते थे.

वर्ष 1893 में 20 अक्तूबर को उन्होंने पुणे स्थित अपने केसरीवाड़ा नामक निवास से दस दिनों का गणेशोत्सव आरंभ किया, तो जल्दी ही वह राष्ट्रीय एकता का पर्व बन गया और गणेश राष्ट्रीय एकता के प्रतीक. उन्हें बचपन से ही झूठ व चुगलखोरी से बहुत चिढ़ थी. उनकी इसी चिढ़ के कारण एक बार उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया,फिर भी उन्होंने समझौता करने और बिना अपराध का दंड स्वीकार करना गवारा नहीं किया था.

कानून की पढ़ाई के बावजूद उन्होंने वकालत केवल इसलिए नहीं की क्योंकि वे उसके चक्कर में अदालतों में दिन में कई-कई बार झूठ नहीं बोलना चाहते थे. दासता उन्हें इतनी असह्य थी कि वे अपने मित्रों से प्रायः कहा करते थे कि उन्हें ऐसे पैसे की कतई जरूरत नहीं, जो सरकार का दास बना कर रखे. बाद में वे शिक्षक बन गये तो एक मित्र ने शिक्षकों की उन दिनों की दयनीय आर्थिक स्थिति के हवाले से उनसे कहा कि वे अंतिम सांस लेंगे तो उनके दाह-संस्कार के लिए भी घर में कुछ नहीं होगा. इस पर तिलक का उत्तर था- मुझे अपने अंतिम संस्कार की चिंता नहीं है क्योंकि उसका प्रबंध कोई और नहीं तो नगरपालिका तो कर ही देगी.

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कृष्ण प्रताप सिंह

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By कृष्ण प्रताप सिंह

कृष्ण प्रताप सिंह is a contributor at Prabhat Khabar.

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