इबोला भारत से दूर, पर तैयारी जरूरी, पढ़ें डॉ चंद्रकांत लहारिया का आलेख

Author : Prabhat Khabar Digital Desk Published by : Pritish Sahay Updated At : 27 May 2026 3:20 PM

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इबोला वायरल से सावधानी जरूरी, फोटो- पीटीआई

Ebola Virus: भारत में इबोला का कोई मामला सामने नहीं आया है और यहां इसके व्यापक खतरा बनने की आशंका भी कम है, पर दुनिया में कहीं भी होने वाला हर प्रकोप मजबूत तैयारी की जरूरत की याद दिलाता है. आज न सिर्फ महामारियों का खतरा मानव इतिहास के किसी भी दौर से अधिक है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा फंडिंग, अमेरिकी मदद में गिरावट तथा डब्ल्यूएचओ के वित्तपोषण में लगातार कमी से स्थिति गंभीर हो गयी है. ऐसे में, ग्लोबल साउथ के देशों, खासकर भारत, को बड़ी भूमिका निभानी होगी.

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डॉ चंद्रकांत लहारिया, वरिष्ठ चिकित्सक और महामारी विशेषज्ञ

Ebola Virus: भारत और अफ्रीकी संघ ने मई के अंतिम सप्ताह में नयी दिल्ली में आयोजित होने वाले भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन स्थगित कर दिया है. ग्लोबल बिग कैट पहल से जुड़ी एक अन्य अंतरराष्ट्रीय संरक्षण बैठक को भी टाल दिया गया है. इस बीच भारत ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, युगांडा और दक्षिण सूडान की गैर-जरूरी यात्रा के खिलाफ एडवाइजरी जारी की है. यह सब तीन अफ्रीकी देशों में इबोला के प्रकोप के कारण हुआ है. यह पहली बार नहीं है जब इबोला ने वैश्विक कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों को प्रभावित किया हो. यह इस बात की भी याद दिलाता है कि संक्रामक रोगों के प्रकोप अब केवल स्वास्थ्य संबंधी मामले नहीं रह गये हैं.

डब्ल्यूएचओ ने 17 मई को कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में बुनडिबुग्यो वायरस से फैले इबोला के प्रकोप के बाद इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति घोषित की. फिर युगांडा और दक्षिण सूडान में भी इबोला रोग के मामले सामने आये. इबोला रोग इबोला वायरस परिवार के कई वायरसों के कारण होता है. जहां जायरे इबोला वायरस के लिए वैक्सीन और कुछ उपचार संबंधी प्रगति उपलब्ध है, वहीं वर्तमान बीमारी बुनडिबुग्यो वायरस के कारण फैल रही है, जिसके लिए न लाइसेंस प्राप्त वैक्सीन है, न कोई प्रमाणित उपचार उपलब्ध है.

बुनडिबुग्यो वायरस की पहचान पहली बार 2007 में युगांडा में हुई थी. अन्य इबोला वायरसों की तरह यह भी बुखार, अत्यधिक कमजोरी, उल्टी, दस्त, रक्तस्राव, शॉक और गंभीर मामलों में कई अंगों के फेल होने जैसी स्थिति पैदा कर सकता है. भूमंडलीकृत विश्व में संक्रमण लेकर यात्रा करने वाला व्यक्ति लक्षण गंभीर होने से पहले ही सीमाओं और महाद्वीपों को पार कर सकता है. कोविड के दौरान हम यह देख चुके हैं. वर्तमान प्रकोप का सबसे चिंताजनक पहलू इसकी पहचान में हुई देरी है. डब्ल्यूएचओ की रिपोर्टों के अनुसार, संभावित पहले मरीज में लक्षण शुरू होने और प्रयोगशाला द्वारा पुष्टि होने के बीच चार सप्ताह का समय बीत गया. साथ-साथ फैल रहे आर्बोवायरल संक्रमण, मलेरिया और फ्लू जैसे रोगों ने चिकित्सकीय संदेह को जटिल बनाया और निदान में देरी की.

भारत में आज तक और अब तक इबोला का कोई मामला सामने नहीं आया है और यहां इसके व्यापक खतरा बनने की आशंका भी कम है. पर दुनिया में कहीं भी होने वाला हर प्रकोप मजबूत तैयारी और ऐसी प्रणालियां विकसित करने की तत्काल जरूरत की याद दिलाता है, जो डब्ल्यूएचओ द्वारा ‘डिजीज एक्स’ या ‘पैथोजन एक्स’ कहे जाने वाले खतरों का सामना कर सकें. यह शब्द ऐसे अज्ञात रोगजनक के लिए प्रयोग किया जाता है, जो भविष्य में उभरकर गंभीर महामारी या वैश्विक महामारी फैला सकता है. फरवरी, 2018 में डिजीज एक्स को डब्ल्यूएचओ की उन प्राथमिक बीमारियों की सूची में शामिल किया गया था, जिनके लिए अनुसंधान और विकास में तत्काल निवेश की जरूरत है. आज महामारियों का खतरा मानव इतिहास के किसी भी दौर से अधिक है.

तेज शहरीकरण, वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन, पारिस्थितिक असंतुलन, मनुष्य और पशुओं के बीच बढ़ते संपर्क, प्रवासन, संघर्ष और अभूतपूर्व वैश्विक आवाजाही ने संक्रामक रोगों के उभरने और फैलने की आदर्श परिस्थितियां बना दी हैं. जबकि वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था कमजोर होती जा रही है. अंतरराष्ट्रीय फंडिंग और अमेरिकी मदद में गिरावट तथा डब्ल्यूएचओ के वित्तपोषण में लगातार कमी से स्थिति गंभीर हो गयी है. निम्न और मध्यम आय वाले अनेक देशों को तब अधिक आत्मनिर्भर बनने की ओर धकेला जा रहा है, जब वैश्विक सहयोग पहले से अधिक जरूरी हो गया है.

एक और चिंताजनक सच्चाई यह है कि बीमारियों पर तब तक वैश्विक ध्यान नहीं दिया जाता, जब तक वे सीधे उच्च आय वाले देशों को प्रभावित न करें. इबोला और कई अन्य उभरते रोगजनकों को अब भी ‘अफ्रीकी समस्या’ माना जाता है. इस कारण वैक्सीन, उपचार, जांच और निगरानी में निवेश तब तक अपर्याप्त रहता है, जब तक प्रकोप अमीर देशों को प्रभावित करना शुरू नहीं करते. बीमारियां उभरती हैं, अस्थायी वैश्विक चिंता पैदा करती हैं और विकसित देशों का ध्यान हटते ही वैश्विक प्राथमिकताओं से गायब हो जाती हैं.

ऐसे में, ग्लोबल साउथ के देशों को बड़ी भूमिका निभानी होगी. खासकर भारत के पास वैज्ञानिक क्षमता और भू-राजनीतिक कद दोनों हैं, जिनकी मदद से वह एशिया और अफ्रीका में सामूहिक रोग तैयारी के लिए मजबूत ढांचा तैयार कर सकता है. भारत को संयुक्त प्रकोप निगरानी, प्रयोगशाला नेटवर्क, वैक्सीन अनुसंधान, जीनोमिक सीक्वेंसिंग और उन बीमारियों के लिए दवाओं के विकास में निवेश बढ़ाना चाहिए, जो निम्न और मध्यम आय वाले देशों को अधिक प्रभावित करती हैं.

बार-बार उभरते इबोला और अन्य संक्रामक खतरे भारत जैसे कई देशों को अपनी तैयारी प्रणालियां मजबूत करने की भी याद दिलाते हैं. इसलिए ईमानदारी से कई आयामों में आकलन होना चाहिए. पहला आयाम अंतरराष्ट्रीय संपर्क है. भारत के पूर्वी और मध्य अफ्रीका के साथ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हवाई संपर्क व्यापक हैं और हजारों यात्री इन क्षेत्रों के बीच यात्रा करते हैं. दूसरा आयाम अफ्रीका में भारत की विशाल कार्यशक्ति और प्रवासी उपस्थिति है. भारतीय पेशेवर पूर्वी और मध्य अफ्रीका में स्वास्थ्य सेवा, बुनियादी ढांचे, खनन, शिक्षा, व्यापार, संयुक्त राष्ट्र अभियानों और विकास क्षेत्रों में गहराई से जुड़े हुए हैं.

तीसरा आयाम बुनडिबुग्यो वायरस से जुड़ी नैदानिक अस्पष्टता है. कांगो में शुरुआती जांच में देरी इसलिए हुई, क्योंकि नमूनों में पहले अधिक परिचित जायरे इबोला स्ट्रेन की जांच की गयी थी और परिणाम नकारात्मक आये थे. पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के रूप में भारत के पास उन्नत वायरोलॉजी ढांचा मौजूद है. पर तैयारी केवल संस्थागत क्षमता पर नहीं, रोगजनक-विशिष्ट तैयारी, चिकित्सकों की जागरूकता, त्वरित जांच और निगरानी की चुस्ती पर भी निर्भर करती है.

केरल में निपाह और कोविड के दौरान भारत ने दिखाया कि उसके पास वैज्ञानिक क्षमता, संस्थागत गहराई और सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षमता मौजूद है. अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि तैयारी प्रकोप की रफ्तार से आगे विकसित हो, केवल इस प्रकोप के लिए नहीं, बल्कि उन भविष्य के प्रकोपों के लिए भी, जो अभी सामने नहीं आये हैं. इबोला भौगोलिक रूप से भारत से दूर हो सकता है. पर ग्लोबल दुनिया में दूरी अब महामारियों से सुरक्षा की गारंटी नहीं रही. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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