महिलाओं को आर्थिक न्याय यानी मुआवजे से आगे की सोच

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Supreme Court

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सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले ने घर संभालने वाली महिलाओं के श्रम को 'राष्ट्र निर्माण' के बराबर बताया है. यह निर्णय बिना पैसे के किए जाने वाले घरेलू काम के आर्थिक मूल्य को स्थापित करता है, जो अक्सर अदृश्य रहता है. लेख इस मान्यता से आगे बढ़कर महिलाओं के लिए वास्तविक आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने की नीतिगत चुनौतियों पर प्रकाश डालता है.

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-रश्मि झा
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हाल में ही सर्वोच्च न्यायालय ने घर संभालने वाली महिलाओं को राष्ट्र निर्माता बता कर और मोटर वाहन अधिनियम के तहत हुई मौत के मुआवजे की गणना के लिए 30,000 रुपये प्रतिमाह की न्यूनतम अनुमानित आय तय कर इस सिद्धांत को मजबूत किया है कि बिना पैसे के किये जाने वाले घरेलू काम का भी आर्थिक मूल्य होता है. न्यायालय ने कहा है कि घर संभालने वाली महिलाएं मुख्य रूप से उस 'मानव पूंजी' को तैयार करने के लिए जिम्मेदार होती हैं, जिस पर देश की आर्थिक उम्मीदें टिकी होती हैं. सड़क दुर्घटना जन स्वास्थ्य से जुड़ा मामला है.

वर्ष 2023 में भारत सरकार के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी एक रिपोर्ट, 'रोड एक्सीडेंट्स इन इंडिया 2023' के अनुसार, सड़क दुर्घटनाओं में हुई मौतों में पुरुषों और महिलाओं की कुल संख्या क्रमशः 1,47,316 और 25,574 थी. इन मौतों में 18 से 45 वर्ष के आयु वर्ग में पुरुषों और महिलाओं की संख्या क्रमशः 99,986 और 14,875 थी. वहीं, 'द लांसेट' की मार्च, 2026 में जारी रिपोर्ट की मानें, तो 2023 में देश में हुई मातृ मृत्यु की कुल संख्या 24,700 थी. इन दोनों आंकड़ों को एक साथ देखने पर भारत में मृत्यु दर से जुड़ी लिंग आधारित जो सच्चाई सामने आती है, वह यह कि महिलाओं के लिए जीवित रहने का जोखिम सिर्फ गर्भावस्था और बच्चे के जन्म तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उसमें अब ऐसी चोटें भी तेजी से शामिल हो रही हैं जिन्हें रोका जा सकता है और जिनका संबंध उनकी गतिशीलता, अर्थात परिवहन और सड़क सुरक्षा से है. महिलाओं के घरेलू श्रम को लेकर यह मान्यता पूरी तरह से नयी बात नहीं है.

भारतीय अदालतें अनेक वर्षों से दुर्घटना से हुई मौतों के दावों में मुआवजा तय करते समय घर संभालने वाली महिलाओं के योगदान को ध्यान में रखती आ रही हैं. ऐसे मामले में मुआवजे की रकम तय करते समय कई बातों का ध्यान रखा जाता है, जैसे महिला का घर पर काम करने के निर्णय लेने से छूटे दूसरे मौकों की कीमत (ऑपर्च्युनिटी कॉस्ट), महिला की पढ़ाई-लिखाई, उसकी उम्र और बच्चे की स्थिति. देखा गया है कि कोर्ट द्वारा 34 से 60 वर्ष के आयु वर्ग की घर संभालने वाली महिला की मौत पर मिलने वाले मुआवजे की रकम 61 से 72 वर्ष की उम्र वाली महिलाओं को मिलने वाली रकम से अधिक रही है. मुआवजे में इस अंतर का कारण यह मानना है कि जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, घर संभालने वाली महिला के काम का बोझ काफी कम हो जाता है.

हाल में लिये गये निर्णयों में नुकसान के तहत एक अलग श्रेणी 'घरेलू देखभाल के नुकसान' की बनायी गयी है. इसलिए, ज्यादा जरूरी प्रश्न यह है कि किसके नुकसान को मान्यता दी जा रही है? यह निर्णय परिवार को उन सेवाओं के लिए मुआवजा देता है, जो घर संभालने वाली महिला जीवित रहने पर देती रहती. उसके काम के मौद्रिक मूल्य का पता तभी चलता है जब वह काम नहीं हो पाता, क्योंकि उसकी अनुपस्थिति परिवार पर आर्थिक बोझ डालती है. हालांकि, एक महिला को स्वयं अपने जीवनकाल में कोई स्वतंत्र आर्थिक अधिकार या सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता. अप्रोच के इस अंतर को समझना महत्वपूर्ण है.

मार्क्सिस्ट नारीवादी मीस के अनुसार, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था आइसबर्ग का केवल दिखाई देने वाला ऊपरी हिस्सा है, जबकि पानी के नीचे का हिस्सा बिना मूल्य श्रम से बना है, जो आज भी ज्यादातर महिलाएं करती हैं. अन्य मार्क्सवादी अर्थशास्त्रियों के नजरिये से भी घरेलू श्रम, श्रम शक्ति के पुनरुत्पादन का एक अदृश्य, परंतु जरूरी हिस्सा है, यह मजदूरों और परिवारों को बनाये रखता है. साथ ही, कार्य बल को बनाये रखने की लागत को कम करता है, फिर भी यह भुगतान के दायरे से बाहर रहता है. इसलिए, न्यायालय की यह मान्यता असल में मुआवजे से जुड़ी है- यह परिवार के लिए घर संभालने वाली महिला की गैर-मौजूदगी से होने वाले आर्थिक नुकसान को तो देखती है, पर उस बुनियादी सच्चाई को चुनौती नहीं देती कि महिलाओं के बिना मूल्य श्रम को आज भी 'उत्पादक श्रम' के बजाय परिवार की जिम्मेदारी तक ही सीमित माना जाता है.

इस फैसले से आगे बढ़कर महिलाओं के बिना मूल्य श्रम की व्यापक और बड़ी तस्वीर क्या होगी, इसे देखने की जरूरत है. इसमें बड़ी नीतिगत चुनौती मुआवजे से आगे की सोच रखते हुए महिलाओं के लिए असल आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने की रणनीति का निर्माण करना है. इसके लिए जीवन चक्र आधारित दृष्टिकोण की जरूरत है, जो आवाजाही, परिवहन सुरक्षा, काम के दौरान जोखिम और सुरक्षित सार्वजनिक जगहों तक पहुंच, जैसे अहम जेंडर मुद्दों की पहचान करे. साथ ही, महिलाओं द्वारा किये जाने वाले श्रम को पहचानने, उनका बोझ कम करने, घर के बाकी सदस्यों से बांटने और देखभाल के बुनियादी ढांचे में सरकार द्वारा निवेश, सबके लिए सामाजिक सुरक्षा और जेंडर संवेदी श्रम एवं कल्याण संबंधी नीतियों के जरिये सहायता प्रणाली विकसित करने की ओर होना चाहिए. तभी महिलाएं न सिर्फ मानव पूंजी तैयार करने के एक माध्यम के रूप में, बल्कि स्वयं 'मानव पूंजी' के रूप में भी देखी जाने लगेंगी. 
 (ये लेखिका के निजी विचार हैं.)


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