ट्रंप की चीन यात्रा के राजनीतिक मायने ज्यादा
Author : राजीव रंजन Published by : Rajneesh Anand Updated At : 29 May 2026 12:03 PM
अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग
Donald trump : वास्तव में ट्रंप की इस यात्रा ने दिखाया कि दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे पर कितनी निर्भर हैं. अमेरिकी कंपनियां चीन की उत्पादन क्षमता और विशाल उपभोक्ता आधार के बिना अपनी वैश्विक वृद्धि की कल्पना भी नहीं कर सकतीं.
Donald Trump : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा के दौरान राजशाही जमाने के बगीचे ‘चोंगनानहाय’ में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ट्रंप की चहलकदमी भले ही एक औपचारिक दृश्य लगे, परंतु चीन की नजर में इसका मतलब कहीं गहरा था. यह एक कूटनीतिक कदम था, ताकि उस रिश्ते को फिर से पटरी पर लाया जा सके, जो दशकों से राजनीतिक उलझन और सामरिक तनाव में रहा है. चोंगनानहाय परिसर में शी द्वारा ट्रंप की अगवानी करना एक राजनयिक संकेत है कि बीजिंग वाशिंगटन से अपने रिश्तों को लेकर गंभीर है, वहीं यह ट्रंप के अहम को साधने का सटीक बाण भी था.
यह दौरा न केवल प्रतीकात्मक था, बल्कि वर्षों के टकराव के बाद दोनों महाशक्तियों का आर्थिक वास्तविकताओं के आगे नतमस्तक होना भी था. इसने स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन की भूमिका को न तो नकारा जा सकता है, न ही उससे आसानी से पल्ला झाड़ा जा सकता है. नौ वर्ष में पहली बार कोई अमेरिकी राष्ट्रपति बीजिंग गया था. सो, चीन के लिए यह एक कूटनीतिक दौरा भर नहीं था, बल्कि वह अपने द्विध्रुवीय दुनिया की सोच पर अमेरिकी मुहर लगा रहा था. इस यात्रा का सबसे दिलचस्प पहलू था ट्रंप के साथ आया कारोबारी दल, जिसमें सत्रह बड़े सीइओ शामिल थे.
एलन मस्क, टिम कुक, जेंसन हुआंग, बोइंग के प्रमुख और ब्लैकरॉक तथा गोल्डमैन सैक्स के दिग्गजों की मौजूदगी चीन की अहमियत खुद बता रही थी. अमेरिका को तेल, गैस, सोयाबीन, मकई, हवाई जहाज और वित्तीय सेवाओं के बड़े सौदे चाहिए थे. बोइंग को चीन से अपने विमानों के ऑर्डर चाहिए थे, कृषि कंपनियों को नये समझौते, और चिप कंपनियां तकनीक हस्तांतरण पर छूट की उम्मीद में थीं. चीन ने इन कारोबारियों का गर्मजोशी से स्वागत कर साफ संदेश दिया कि चीनी दरवाजे खुले हैं और 1.4 अरब लोगों के इस बाजार और विनिर्माण क्षमता को नजरअंदाज करना अमेरिका के लिए मुमकिन नहीं.
वास्तव में ट्रंप की इस यात्रा ने दिखाया कि दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे पर कितनी निर्भर हैं. अमेरिकी कंपनियां चीन की उत्पादन क्षमता और विशाल उपभोक्ता आधार के बिना अपनी वैश्विक वृद्धि की कल्पना भी नहीं कर सकतीं. उधर चीन भी अमेरिकी प्रौद्योगिकी, निवेश और बाजार से लाभान्वित होता रहा है. दोनों देशों के बीच तनातनी से अमेरिकी किसानों के सोयाबीन निर्यात में भारी कमी आयी थी, जबकि चीनी कंपनियों को आपूर्ति शृंखला में अड़चन. इस पृष्ठभूमि में ट्रंप का यह दौरा व्यावहारिक जरूरतों का परिणाम लगता है. यात्रा के दौरान अनौपचारिक बातचीत के लिए जो जगहें चुनी गयीं, वे भी कई संकेत दे रही थीं.
पीपुल्स ग्रेट हॉल में औपचारिक बैठक तो रस्म के मुताबिक थी, पर मिंग राजवंश के 600 साल पुराने स्वर्ग मंदिर इमारत की ‘गोल स्वर्ग, चौकोर पृथ्वी’ दार्शनिकता के माध्यम से शी ने ट्रंप को चीनी सभ्यता और शासन पद्धति का बड़प्पन दिखाया. जब ट्रंप ने चीन को बेहद खूबसूरत कहा, तो उसे चीनी मीडिया ने चीनी संस्कृति और विकास माॅडल की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता से जोड़कर देखा. यह सांस्कृतिक प्रदर्शन चीन की प्राचीन सभ्यता की निरंतरता और उसके वर्तमान वैश्विक महत्व को रेखांकित करने का तरीका था. शी ने बातचीत के दौरान तीन सवाल उठाये. पहला, क्या दोनों देश ‘थ्यूसीडाइड्स ट्रैप’ से बच सकते हैं, यानी क्या दो बड़ी ताकतें बिना लड़े साथ रह सकती हैं. दूसरा, क्या वे जलवायु बदलाव और दुनिया के दूसरे संकटों पर मिलकर काम कर सकते हैं. तीसरा, क्या दोनों देश अपने लोगों और पूरी मानवता की भलाई को प्राथमिकता दे सकते हैं. इन प्रश्नाें के जरिये शी जिनपिंग को वैश्विक दक्षिण की नजर में एक जिम्मेदार और दूरदर्शी नेता के रूप में पदस्थापित करने की चीनी सोच सामने आयी.
पूरी यात्रा में ट्रंप काफी संयमित और गंभीर दिखे. उन्होंने शी को पुराना दोस्त कहा और रिश्ते की अहमियत की तारीफ की. इसके पीछे कई वजहें थीं. देश में मध्यावधि चुनाव की तैयारियां चल रही हैं, महंगाई से लोग परेशान हैं और 2025 के व्यापार आंकड़ों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की कमजोरियां उजागर कर दी हैं. एक अनुभवी व्यवसायी की तरह ट्रंप समझ गये हैं कि लंबा टकराव अमेरिका के लिए भी महंगा सौदा है. इस दौरान शी ने अमेरिका-चीन संबंधों के लिए पुनः एक नया ढांचा ‘रचनात्मक रणनीतिक स्थिरता’ सामने रखा. मतलब यह कि प्रतिस्पर्धा हो, पर नियंत्रित और टकराव से बचा जाये. पर प्रश्न यह है कि ‘महाशक्तिशाली देशों के लिए नये प्रकार के संबंध’ की जो चीनी अवधारणा थी, उसकी भांति अमेरिका इस अवधारणा को भी तवज्जो न दे तो.
क्योंकि चीन अब अपनी अवधारणा, मानक और आदर्शों को बड़े सलीके से वैश्विक शासन प्रतिमान में ढाल रहा है. दूसरी ओर ताइवान, तकनीक और टैरिफ पर अमेरिका और चीन में गहरे मतभेद अभी भी बने हुए हैं. ट्रंप की चीन यात्रा ने साबित किया कि आर्थिक हकीकतें राजनयिक बयानबाजी से ज्यादा असरदार और प्रभावी हैं. हालांकि, ट्रंप के अप्रत्याशित व्यवहार और नीतियों को देखते हुए, अमेरिका-चीन संबंधों में आमूलचूल सकारात्मक बदलाव आयेगा, यह सोचना बेमानी होगा, पर एक ठहराव की गुंजाइश दिख तो रही है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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