प्रवासी मजदूरों के अधिकार और नये लेबर कोड

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झारखंड के मजदूर: नये कानून से क्या बदलेगा?

प्रवासी मजदूर

झारखंड, जो खनिज संपदा से भरपूर है, श्रमिकों को कम वेतन और शोषण का सामना करना पड़ता है. नए लेबर कोड प्रवासी मजदूरों के अधिकारों की रक्षा कैसे कर सकते हैं, यह लेख विस्तार से बताता है. क्या ये कानून जमीनी हकीकत बदलेंगे?

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-डॉ शांतनु ब्रज चौबे
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(असिस्टेंट प्रोफेसर (लॉ) एनयूएसआरएल, रांची)

देश के कुल खनिजों का लगभग 40 फीसदी हिस्सा झारखंड में है. यहां कई बड़ी महारत्न, नवरत्न और मिनिरत्न कंपनियों के मुख्यालय स्थित हैं. टाटा और अडानी जैसी बड़ी निजी कंपनियों की भी यहां भारी मौजूदगी है. फिर भी, रोजगार के बेहतर अवसरों की तलाश में हर साल लाखों प्रवासी मजदूर दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं. इसके दो कारण हैं. पहला, पर्याप्त संख्या में कुशल नौकरियों का न होना और दूसरा, वेतन बहुत कम होना.

एसबीआइ की एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में करीब 65 फीसदी नौकरियों में कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन से भी कम वेतन दिया गया. नगरपालिका क्षेत्रों के लिए भी आज लागू न्यूनतम वेतन की अधिकतम दर 13,385 से 21,336 रुपये के बीच है, जो कई राज्यों की तुलना में काफी कम है. ऐसे में मजदूर बाहर जाने को मजबूर हो जाते हैं. पर इसके साथ चुनौतियां भी जुड़ी होती हैं. अक्सर ठेकेदार उनका शोषण करते हैं और कई मामलों में उन्हें वेतन में भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

नये लेबर कोड इनमें से कुछ चुनौतियों का समाधान करते हैं. ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड, 2020 में दूसरे राज्यों से आने वाले प्रवासी मजदूरों के लिए कुछ सुरक्षा उपाय दिये गये हैं. उन्हें अपॉइंटमेंट लेटर और यात्रा भत्ता दिया जाना है, ताकि वे साल में कम से कम एक बार घर आ सकें. शिकायतें दर्ज कराने के लिए उनके लिए एक केंद्रीय हेल्पलाइन भी है. झारखंड सरकार द्वारा भी एक हेल्पलाइन चलायी जाती है. उन्हें सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 के तहत मिलने वाले फायदे भी दिये जायेंगे. ऐसे कर्मचारियों को भी वैसी सुविधाएं पाने का अधिकार है, जैसी मुख्य नियोक्ता नियमित कर्मचारियों को देता है. उन्हें वेतन देने की मुख्य जिम्मेदारी ठेकेदार की होती है.

अगर वह वेतन अवधि खत्म होने के सात दिनों के भीतर भुगतान नहीं कर पाता है, तो यह जिम्मेदारी मुख्य नियोक्ता पर आ जाती है, जिसे 15 दिनों में भुगतान करना होता है. अगर वह भी भुगतान नहीं कर पाता, तो संबंधित सरकारी अधिकारी वेतन का भुगतान करवा सकते हैं. कर्मचारियों की सेहत व सुरक्षा की जिम्मेदारी भी मुख्य नियोक्ता की होती है. न्यूनतम वेतन के संबंध में 'वेतन संहिता, 2020' में 'फ्लोर वेज' की अवधारणा का प्रावधान है. केंद्र सरकार को फ्लोर वेज तय करने का अधिकार दिया गया है. उसके बाद किसी भी राज्य को फ्लोर वेज के स्तर से कम न्यूनतम वेतन तय करने की अनुमति नहीं होगी. इससे नोएडा में हुए विरोध-प्रदर्शन जैसी स्थितियों को संभालने में मदद मिल सकती है.

हालांकि, इससे झारखंड जैसे राज्यों में न्यूनतम वेतन कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने में कोई मदद नहीं मिलती, जहां ज्यादातर नियोक्ता इसके उल्लंघन के बावजूद बच निकलते हैं. गौरतलब है कि यू उनीचोयी बनाम केरल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, नियोक्ता की भुगतान करने की क्षमता कम से कम न्यूनतम वेतन का भुगतान करने की उसकी जिम्मेदारी पर असर नहीं डालती है. इसमें कुछ बड़ी कमियां भी हैं. जैसे, नये कोड में 'डिस्प्लेसमेंट अलाउंस' का कोई जिक्र नहीं है. इसमें ऐसी पासबुक का भी प्रावधान नहीं है, जिसमें प्रवासी मजदूर की नौकरी से जुड़ी सभी जानकारी हो. कोड इस बारे में भी कुछ नहीं कहते कि घर वाले राज्य से आने-जाने में लगे समय को 'ड्यूटी पर' माना जायेगा और उसके लिए मुआवजा दिया जायेगा या नहीं.

और आखिर में, इसके असरदार तरीके से लागू होने को लेकर हमेशा एक सवाल बना रहेगा. इसके अलावा अदालतों के कुछ फैसले भी कर्मचारियों के लिए बहुत उत्साहजनक नहीं रहे हैं. बलवंत राय सलूजा बनाम एयर इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि एयर इंडिया की पूरी तरह से मालिकाना हक वाली सब्सिडियरी द्वारा चलायी जाने वाली कैंटीन के कर्मचारियों को एयर इंडिया का कर्मचारी नहीं माना जा सकता, भले वह कैंटीन मुख्य रूप से उसी कंपनी के लिए काम करती हो. उस मामले में तय किया गया पैमाना ‘प्रभावी और पूर्ण नियंत्रण’ का था; असल में, यह पैमाना पारंपरिक नौकरी के रिश्ते में ही पूरा हो सकता है और किसी भी कॉन्ट्रैक्ट वर्कर के लिए इसे साबित करना लगभग नामुमकिन होगा.

हालांकि, मद्रास हाई कोर्ट का 'जनरल मैनेजर बनाम बीएचइएल' वाला फैसला उम्मीद की एक किरण है, क्योंकि उसने लगभग एक जैसे तथ्यों वाले मामले में कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया और यह भी साफ किया कि बलवंत राय सलूजा मामले के फैसले ने पुराने फैसलों को रद्द नहीं किया है. प्रवासी मजदूर सबसे ज्यादा कमजोर वर्गों में से एक हैं. कोविड के दौरान शहरों से प्रवासियों का बड़े पैमाने पर पलायन और मजदूरों का सैकड़ों किलोमीटर तक नंगे पैर चलना आज भी हमारी यादों में ताजा हैं. हमें उम्मीद है कि विधायिका और इसे लागू करने वाले अधिकारी इनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए असरदार उपाय करने पर विचार करेंगे. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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