आतंकवाद बंद करे पाकिस्तान, तभी वार्ता

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शहबाज शरीफ

शहबाज शरीफ

भारत ने पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश दिया है. सिंधु जल संधि के स्थगन और आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदमों के साथ, भारत ने साफ कर दिया है कि वार्ता तभी संभव है जब पाकिस्तान अपनी धरती से होने वाले आतंकी हमलों को रोके.

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पिछले साल पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से आतंकवादी ढांचे पर सैन्य कार्रवाई की और साथ ही सिंधु जल संधि को स्थगित करने का निर्णय लिया. वह केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं था, बल्कि एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश था कि आतंकवाद और सामान्य सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते. सिंधु जल संधि छह दशकों से भी अधिक समय तक भारत-पाकिस्तान के बीच सबसे स्थायी समझौतों में से एक रही. इसने युद्धों, सैन्य संघर्षों और कूटनीतिक तनावों के बावजूद अपनी प्रासंगिकता बनाये रखी.

भारत ने इसे स्थगन की स्थिति में रखकर संकेत दिया कि विश्वास का आधार समाप्त हो जाये, तो कोई द्विपक्षीय व्यवस्था स्थायी नहीं रह सकती. यद्यपि, नदियों का प्राकृतिक प्रवाह पाकिस्तान की ओर जारी है और भारत के पास इतना भंडारण ढांचा नहीं है कि वह पश्चिमी नदियों के जल को तत्काल रोक सके, फिर भी संधि के प्रशासनिक और संस्थागत प्रावधान प्रभावी रूप से स्थगित हो चुके हैं. पाकिस्तान ने इसके उत्तर में जल विवाद को राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बनाना शुरू कर दिया है. सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने घोषणा की है कि पाकिस्तान अपने हिस्से के पानी की सुरक्षा के लिए 'हर आवश्यक कदम' उठायेगा. वहीं बिलावल भुट्टो जरदारी ने चेतावनी दी है कि यदि पाकिस्तान के जल अधिकारों से छेड़छाड़ की गयी, तो युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है.

इस तरह पाकिस्तान ने जल विवाद को तकनीकी और कानूनी प्रश्न के बजाय अस्तित्व और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है. इससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ने की आशंका है. इस समय पाकिस्तान स्वयं भी गंभीर आंतरिक संकटों से जूझ रहा है. बलूचिस्तान में बलूच लिबरेशन आर्मी और अन्य आतंकी संगठनों ने सुरक्षा बलों पर हमले तेज कर दिये हैं. हाल ही में जियारत जिले में पुलिस चौकी पर हमले में नौ पुलिसकर्मियों की मृत्यु इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में राज्य की पकड़ कमजोर होती जा रही है.

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान भी लगातार सक्रिय है और सुरक्षा बलों को चुनौती दे रहा है. इन घटनाओं के लिए पाकिस्तान अक्सर भारत पर आरोप लगाता है, पर अब तक ऐसे आरोपों के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाया है. वस्तुतः ये समस्याएं पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक, प्रशासनिक और सुरक्षा कमजोरियों का परिणाम हैं. पीओके में लंबे समय से महंगाई, बेरोजगारी, बिजली संकट, खाद्यान्न की कमी और प्रशासनिक उपेक्षा के खिलाफ व्यापक प्रदर्शन हो रहे हैं. प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई, इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में बाधा जैसी खबरों ने स्थानीय असंतोष को और बढ़ाया है. अब यह आंदोलन केवल आर्थिक मांगों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि बेहतर शासन, राजनीतिक अधिकारों और सम्मानजनक व्यवहार की मांग भी इसका हिस्सा बन चुकी है.

ऐसे समय में पाकिस्तान की प्राथमिकता अपने आंतरिक संकटों का समाधान होना चाहिए. दूसरी ओर भारत ने आतंकवाद के विरुद्ध अपनी कूटनीतिक और कानूनी कार्रवाई तेज कर दी है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद के विरुद्ध पहलगाम हमले के संबंध में आरोपपत्र दाखिल किया है. ऐसी खबरें भी हैं कि भारत वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफएटीएफ) की आगामी बैठक में पाकिस्तान को पुनः ग्रे सूची में शामिल कराने के लिए नये साक्ष्य प्रस्तुत कर सकता है. एफएटीएफ के इतिहास में पहली बार किसी भारतीय को इसके उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है. यही नहीं, हाल ही में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि एफएटीएफ की साख पर सवाल उठाने वाले देश अक्सर वे होते हैं, जिन्हें जांच में फंसने का भय होता है.

स्पष्ट है कि भारत अब केवल सैन्य प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि आतंकवाद के विरुद्ध बहुआयामी रणनीति अपनाकर पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बढ़ाना चाहता है. ऐसे समय में भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत शुरू करने की मांग आश्चर्यजनक ही है. भारत और पाकिस्तान भौगोलिक रूप से हमेशा पड़ोसी रहेंगे. लेकिन केवल भौगोलिक निकटता किसी सार्थक वार्ता की गारंटी नहीं हो सकती. वार्ता तभी सफल हो सकती है, जब दोनों पक्ष न्यूनतम विश्वास और हिंसा से परहेज की प्रतिबद्धता प्रदर्शित करें. यदि एक ओर आतंकवाद जारी रहे और दूसरी ओर व्यापक राजनीतिक वार्ता की अपेक्षा की जाये, तो ऐसे प्रयास सफल होने की संभावना बहुत कम रहती है.

इसका अर्थ यह नहीं कि दोनों देशों के बीच हर प्रकार का संपर्क समाप्त कर दिया जाये. व्यापक राजनीतिक वार्ता और संकट प्रबंधन के लिए आवश्यक संवाद में स्पष्ट अंतर है. दोनों देशों के सैन्य संचालन महानिदेशकों के बीच स्थापित हॉटलाइन ने अतीत में कई बार तनाव कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है. ऐसी व्यवस्थाओं को समाप्त करने के बजाय और अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए. कोलंबो में हाल ही में हुई ट्रैक-2 वार्ता इसी दृष्टिकोण का उदाहरण है. यद्यपि इन बैठकों से कोई ठोस समझौता नहीं निकला, फिर भी उन्होंने दोनों देशों के पूर्व अधिकारियों, सैन्य विशेषज्ञों और रणनीतिक समुदाय को आतंकवाद, सिंधु जल संधि और संकट प्रबंधन जैसे विषयों पर विचार-विमर्श का अवसर प्रदान किया. ऐसी अनौपचारिक वार्ताएं भारत की आधिकारिक नीति को कमजोर नहीं करतीं. इसके उलट, वे दोनों पक्षों की सोच को समझने, संभावित जोखिमों का आकलन करने और संकट की स्थिति में संवाद के विकल्पों को जीवित रखने में सहायता करती हैं.

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलित नीति अपनाने की है. सीमा पार आतंकवाद समाप्त हुए बिना व्यापक राजनीतिक वार्ता शुरू करना भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप नहीं होगा. पर साथ ही सैन्य हॉटलाइन, मानवीय मामलों में सीमित संपर्क, आवश्यक राजनयिक संवाद तथा ट्रैक-2 जैसे अनौपचारिक मंचों को जारी रखना भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक हित में है. इससे एक ओर आतंकवाद के विरुद्ध भारत की कठोर नीति बरकरार रहेगी और दूसरी ओर संकट की स्थिति में तनाव कम करने के लिए आवश्यक साधन भी उपलब्ध रहेंगे. अंततः भारत और पाकिस्तान के बीच स्थायी शांति केवल बैठकों और घोषणाओं से स्थापित नहीं होगी. इसके लिए पाकिस्तान को आतंकवाद के प्रति अपनी नीति में बुनियादी परिवर्तन करना होगा और यह दिखाना होगा कि वह वास्तव में शांतिपूर्ण और जिम्मेदार पड़ोसी बनना चाहता है. जब तक ऐसा नहीं होता, व्यापक राजनीतिक वार्ता की परिस्थितियां नहीं बनेंगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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आनंद कुमार

लेखक के बारे में

By आनंद कुमार

आनंद कुमार नई दिल्ली स्थित विश्लेषक हैं, जिनकी विशेषज्ञता रणनीतिक मामलों, सुरक्षा मुद्दों और दक्षिण एशियाई भू-राजनीति में है। उन्होंने विभिन्न प्रतिष्ठित थिंक टैंकों में कार्य किया है। वे चार पुस्तकों के लेखक और दो संपादित ग्रंथों के संपादक हैं। उनकी नवीनतम पुस्तक Strategic Rebalancing: China and US Engagement with South Asia है।

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