कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बदल रही स्वास्थ्य व्यवस्था

Artificial intelligence : कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था को बदल रही है। सर्वाइकल कैंसर से लेकर स्तन कैंसर तक, एआई की मदद से प्रारंभिक जांच सस्ती और सुलभ हो रही है. जानें कैसे यह तकनीक सार्वजनिक स्वास्थ्य को भी मजबूत बना रही है.
-डॉ मयंक भारद्वाज-
Artificial intelligence : वर्ष की शुरुआत में नयी दिल्ली में आयोजित 'एआइ इंपैक्ट समिट' ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) की अभूतपूर्व संभावनाओं को रेखांकित किया. उस सम्मेलन में पुणे के एक हेल्थ-टेक स्टार्टअप द्वारा विकसित एआइ सक्षम उपकरण विशेष आकर्षण का केंद्र रहा, जो सर्वाइकल कैंसर की सस्ती और सुलभ प्रारंभिक जांच को संभव बनाता है. वहीं, 'वाइसा एआइ' ने यह प्रदर्शित किया कि एआइ आधारित चैटबॉट भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता भी प्रभावी ढंग से प्रदान कर सकते हैं. असल में, एआइ जटिल चिकित्सीय आंकड़ों का विश्लेषण कर चिकित्सा सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाते हैं.
एआइ प्रणाली इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड, एक्स-रे, सीटी स्कैन, एमआरआइ जैसी छवियों, प्रयोगशाला रिपोर्टों और जीनोमिक आंकड़ों का तीव्र एवं सटीक विश्लेषण कर सकती है. इससे रोगों की समय पर पहचान, उपचार योजना और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हो रहा है. भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था एआइ के व्यापक उपयोग के लिए अत्यंत अनुकूल है. यद्यपि, देश में डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात लगभग 1:811 है, जो डब्ल्यूएचओ के 1:1000 के मानक से बेहतर है, फिर भी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में भारी क्षेत्रीय असमानता है. साथ ही, गैर-संक्रामक रोगों का बढ़ता बोझ, वृद्ध होती आबादी तथा स्वास्थ्य सेवाओं की लगातार बढ़ती लागत देश के सामने गंभीर चुनौतियां हैं.
ऐसे में तकनीक आधारित 'इंटेलिजेंट सॉल्यूशंस' हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक सक्षम और प्रभावी बना सकते हैं. अस्पतालों तक सीमित न रहकर एआइ अब रोग निगरानी, महामारी की पूर्व चेतावनी, टीकाकरण की योजना, संसाधनों के बेहतर आवंटन तथा आपातकालीन प्रबंधन के माध्यम से सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को भी अधिक सशक्त बना रही है. जब एआइ को टेलीमेडिसिन के साथ जोड़ा जाता है, तब इसके लाभ और व्यापक हो जाते हैं. भारत की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में रहती है, जबकि विशेषज्ञ चिकित्सक और उन्नत स्वास्थ्य सुविधाएं मुख्यतः शहरी क्षेत्रों तक सीमित हैं. एआइ संचालित टेलीमेडिसिन दूरस्थ परामर्श, सटीक निदान व रोगियों की निरंतर निगरानी संभव बनाकर इस भौगोलिक दूरी को कम कर रही है. सरकार की विभिन्न पहलें भी, जैसे 'इ-संजीवनी' टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म', 'आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन' आदि एक समेकित डिजिटल स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र विकसित कर रही हैं.
एआइ की परिवर्तनकारी क्षमता का प्रभाव स्तन कैंसर की जांच के क्षेत्र में देखने को मिलता है. भारत में महिलाओं में स्तन कैंसर सबसे अधिक पाया जाने वाला कैंसर है, किंतु पारंपरिक मैमोग्राफी की अधिक लागत, सीमित उपलब्धता तथा ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी कम पहुंच के कारण प्रारंभिक जांच अब भी बड़ी चुनौती है. इन समस्याओं के समाधान के लिए बेंगलुरु स्थित हेल्थ-टेक स्टार्टअप 'निरामई' ने 'थर्मलाइटिक्स' नामक एआइ आधारित स्तन कैंसर जांच प्रणाली विकसित की है, जो शुरुआती अवस्था में ही शारीरिक असामान्यताओं की पहचान कर सकती है. यह तकनीक पूरी तरह गैर-आक्रामक (नॉन-इंसिव), विकिरण मुक्त और बिना किसी शारीरिक संपर्क के जांच करने वाली है. इसके पोर्टेबल स्वरूप के कारण इसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, मोबाइल स्वास्थ्य शिविरों और दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से ले जाया जा सकता है. हालांकि, एआइ की इस क्षमता के साथ कई नैतिक और व्यावहारिक चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं.
एआइ प्रणाली संवेदनशील रोगी आंकड़ों पर निर्भर करती है, जिससे गोपनीयता, साइबर सुरक्षा और अनधिकृत पहुंच जैसी गंभीर चिंताएं उत्पन्न होती हैं. यदि एआइ मॉडल पक्षपातपूर्ण या अपूर्ण आंकड़ों पर प्रशिक्षित हों, तो वे गलत या भेदभावपूर्ण परिणाम दे सकते हैं. इसके अतिरिक्त, अधिकतर एआइ मॉडल की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को समझना चिकित्सकों के लिए भी कठिन होता है. इससे एआइ आधारित चिकित्सा निर्णयों पर विश्वसनीयता का संकट खड़ा हो सकता है. सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि एआइ कभी भी मानवीय संवेदनशीलता, नैतिक विवेक और उस चिकित्सीय अनुभव का स्थान नहीं ले सकता, जो रोगी केंद्रित स्वास्थ्य सेवाओं की आत्मा है.
भारत के अनेक अस्पतालों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, अभी भी गुणवत्तापूर्ण डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, इंटरनेट सुविधा और आवश्यक तकनीकी बुनियादी ढांचे का अभाव है. एआइ प्रणाली को लागू करने की उच्च लागत, प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी तथा व्यापक कानूनी व नियामक ढांचे का न होना भी इसके विस्तार में बड़ी बाधाएं हैं. नि:संदेह, एआइ स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक तेज, सटीक और प्रभावी बनाकर चिकित्सा क्षेत्र में एक नये युग की शुरुआत कर रहा है. किंतु इसे चिकित्सकों के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि उनके एक सशक्त सहयोगी के रूप में देखा जाना चाहिए. स्वास्थ्य सेवाओं का भविष्य तकनीक और मानवीय विशेषज्ञता के संतुलित समन्वय में ही सुरक्षित है. इसके लिए मजबूत डाटा संरक्षण कानून, पारदर्शी एल्गोरिदम, प्रभावी नियामक व्यवस्था और नैतिक शासन की सख्त जरूरत है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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