शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी कम करना जरूरी

Author Aviral Pandey|Edited by Rajneesh Anand
Updated:
विज्ञापन
शिक्षा-रोजगार गैप: भारत का बड़ा संकट

पढ़ाई करते और काम करते युवक और युवतियां

भारत की शिक्षा प्रणाली में एक बड़ा विरोधाभास है: शिक्षा का विस्तार हुआ है, पर रोजगार से इसका जुड़ाव कमजोर हुआ है. यह लेख शिक्षा की गुणवत्ता, निरंतरता के अभाव और कौशल विकास की कमी पर प्रकाश डालता है.

विज्ञापन

भारत में शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की सोच, समझ, नागरिक चेतना और सामाजिक भागीदारी को विकसित करने की एक व्यापक प्रक्रिया है. एक ऐसे नागरिक का निर्माण करना है जो प्रश्न कर सके, तर्क कर सके और समाज में रचनात्मक योगदान दे सके. किंतु, आधुनिक भारत में शिक्षा, आकांक्षा और रोजगार के बीच एक गहरा विरोधाभास उभरकर सामने आया है, शिक्षा का विस्तार हुआ है, पर उसका जीवन, अर्थव्यवस्था और सामाजिक अवसरों से जुड़ाव अपेक्षाकृत कमजोर हुआ है. बीते दो दशकों में, भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया है.

विद्यालयों तक पहुंच लगभग सार्वभौमिक हुई है, उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या बढ़ी है और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने शिक्षा को बहु-विषयक व कौशलोन्मुख बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है. लेकिन नीति आयोग, असर, विश्व बैंक और यूनेस्को की रिपोर्टें लगातार संकेत दे रही हैं कि भारत की अगली चुनौती केवल शिक्षा तक पहुंच नहीं, बल्कि सीखने की गुणवत्ता, बुनियादी दक्षता और वास्तविक जीवन में इसकी उपयोगिता है. आज मूल प्रश्न यह नहीं है कि कितने बच्चे विद्यालय जा रहे हैं, बल्कि यह है कि वे वहां से क्या सीख कर निकल रहे हैं. क्या प्राथमिक स्तर पर उनकी पढ़ने-लिखने और गणितीय समझ मजबूत हो रही है? क्या माध्यमिक स्तर पर उनमें विश्लेषण, समस्या समाधान और निर्णय क्षमता विकसित हो रही है?

क्या उच्च शिक्षा उन्हें रोजगार और नवाचार की दुनिया से जोड़ पा रही है, या पूरी प्रणाली केवल परीक्षा केंद्रित स्मरण और रटंत ज्ञान तक सीमित रह गयी है? यहीं से भारत की शिक्षा व्यवस्था का मूलभूत संकट स्पष्ट होता है- शिक्षा शृंखला में निरंतरता का अभाव, जिस कारण सीखना, कौशल और रोजगार एक-दूसरे से जुड़ नहीं पाते. प्राथमिक शिक्षा में सीखने की नींव कमजोर हो, तो उच्च शिक्षा और रोजगार दोनों प्रभावित होते हैं. पर नीतिगत स्तर पर ये तीनों- विद्यालय, उच्च शिक्षा और रोजगार- अभी भी अलग-अलग विभागों और लक्ष्यों में बंटे हुए हैं. इसी पृष्ठभूमि में विश्वास का संकट भी गहरा रहा है. 'नीट', 'जी', 'सीयूइटी' और विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में बार-बार उठने वाले विवाद उस प्रणाली पर प्रश्न है जिस पर करोड़ों परिवार अपने भविष्य का भरोसा रखते हैं.

जब सार्वजनिक व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होता है, तो समाज समानांतर संरचनाएं खड़ी करता है. कोचिंग उद्योग उसी का परिणाम है. उच्च शिक्षा में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है. सीमित सीटों और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण बड़ी संख्या में विद्यार्थी निजी विश्वविद्यालयों व अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों का रुख कर रहे हैं. कुछ निजी संस्थानों ने गुणवत्ता और शोध के माध्यम से नयी संभावनाएं दिखायी हैं, पर अनेक निजी संस्थानों की गुणवत्ता गंभीर प्रश्नों के घेरे में है. इसलिए बहस सरकारी बनाम निजी शिक्षा की नहीं, संस्थागत गुणवत्ता, जवाबदेही और सीखने के परिणाम की होनी चाहिए. इस व्यापक संरचना को समझने के लिए बिहार एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है.

यहां शिक्षा की आकांक्षा अत्यंत प्रबल है, पर प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक सीखने की निरंतर शृंखला कमजोर है. इस कारण बड़ी संख्या में विद्यार्थी अन्य राज्यों की ओर पलायन करते हैं. हाल के वर्षों में निजी विश्वविद्यालयों को अनुमति और उच्च शिक्षण संस्थानों को स्वायत्तता देने की पहल महत्वपूर्ण है, पर असली सुधार तभी होगा जब इसे स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता सुधार से जोड़ा जाये. यहां एक महत्वपूर्ण नीतिगत विसंगति स्पष्ट होती है- भारत में शिक्षा सुधार टुकड़ों में किया गया है, एकीकृत मानव पूंजी रणनीति के रूप में नहीं. प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार, इन चारों को जोड़ने वाली राज्य स्तरीय नीति अभी भी कमजोर है. बिहार जैसे राज्यों के लिए यह और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां जनसांख्यिकीय लाभांश तभी वास्तविक आर्थिक शक्ति बन सकता है, जब सीखने की पूरी शृंखला मजबूत हो. एआइ इस पूरी बहस को और निर्णायक बना देती है. अब केवल जानकारी याद रखना पर्याप्त नहीं है.

भविष्य का श्रम बाजार विश्लेषणात्मक सोच, रचनात्मकता, समस्या समाधान, सहयोग और नैतिक निर्णय जैसी क्षमताओं की मांग करेगा. यदि शिक्षा इस परिवर्तन के अनुरूप स्वयं को नहीं ढालती, तो शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी और बढ़ेगी. भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा जनसंख्या है. पर यह जनसांख्यिकीय लाभ तभी वास्तविक आर्थिक शक्ति बन सकता है, जब शिक्षा, कौशल, उद्योग और रोजगार को एकीकृत मानव पूंजी प्रणाली के रूप में देखा जाये. इतना ही नहीं, देश में राष्ट्रीय ढांचे के साथ-साथ राज्य विशिष्ट मानव पूंजी रणनीतियों को भी विकसित करने की आवश्यकता है, जो प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक एक निरंतर नीति शृंखला बना सकें. भारत की अगली शिक्षा क्रांति तब आयेगी जब शिक्षा को जन्म से रोजगार तक एक सतत यात्रा के रूप में देखा जायेगा. यदि शिक्षा आकांक्षाओं से कट गयी, तो सामाजिक असंतोष बढ़ेगा, और यदि यह अर्थव्यवस्था एवं समाज से जुड़ गयी, तो यही युवा जनसंख्या भारत की सबसे बड़ी विकास शक्ति बन सकती है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


विज्ञापन
Aviral Pandey

लेखक के बारे में

By Aviral Pandey

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola