पश्चिम एशिया में भारत की कूटनीतिक परीक्षा

पश्चिम एशिया में तनाव
ईरान और अमेरिका के बीच हालिया सैन्य टकराव पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक बड़ा बदलाव ला रहा है. यह संघर्ष अब सिर्फ परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं, बल्कि समुद्री प्रभुत्व और क्षेत्रीय व्यवस्था के लिए एक व्यापक लड़ाई बन गया है. जानें इसके गंभीर परिणाम.
अमेरिका और ईरान के बीच हालिया संघर्ष में हुई बढ़ोतरी पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक निर्णायक बदलाव का संकेत देती है. यह स्थिति जितनी चिंताजनक है, उतनी ही गंभीर भी है. शुरुआत में पश्चिम एशिया का यह टकराव एक सीमित सैन्य संघर्ष जैसा प्रतीत हो रहा था, लेकिन अब यह एक व्यापक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में बदल चुका है, जिसमें समुद्री सुरक्षा, क्षेत्रीय प्रभाव, ऊर्जा आपूर्ति और पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन का भविष्य शामिल है. वॉशिंगटन और तेहरान द्वारा हाल ही में एक-दूसरे पर किये गये हमलों ने यह उम्मीद समाप्त कर दी है कि जून के मध्य में हस्ताक्षरित सहमति पत्र स्थायी शांति का आधार बनेगा.
इसके बजाय, यह क्षेत्र फिर से एक लंबे संघर्ष के कगार पर खड़ा है, जिसके परिणाम फारस की खाड़ी से कहीं आगे तक जायेंगे. जाहिर है कि शांति की जो उम्मीद बनती दिख रही थी, वह टूट रही है. अमेरिका के ताजा हमलों का लक्ष्य ईरान की सैन्य अवसंरचना थी, जिसमें वायु रक्षा प्रणाली, मिसाइल भंडार, नौसैनिक ठिकाने, तटीय निगरानी प्रतिष्ठान और लॉजिस्टिक केंद्र शामिल थे. वॉशिंगटन ने इस कार्रवाई को एक आवश्यक कदम बताया, जिसका उद्देश्य ईरान की उस क्षमता को कमजोर करना था, जिससे वह होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों को खतरे में डाल सकता है. ईरानी सरकारी मीडिया ने बंदर अब्बास, चाबहार और बुशहर सहित कई महत्वपूर्ण सैन्य और बंदरगाह शहरों में विस्फोटों की पुष्टि की, जिससे हमलों के पैमाने और भौगोलिक विस्तार का पता चलता है.
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने तेजी से जवाब देते हुए कुवैत और बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किये और चेतावनी दी कि अमेरिका की किसी भी आगे की कार्रवाई का जवाब पूरे खाड़ी क्षेत्र में व्यापक प्रतिशोध के रूप में दिया जायेगा. वर्तमान संकट के केंद्र में होर्मुज जलडमरूमध्य है, जिसके माध्यम से प्रतिदिन वैश्विक तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है. जून में हुए युद्धविराम ने वाणिज्यिक नौवहन को फिर शुरू तो कर दिया, पर इस मूल प्रश्न को हल नहीं कर पाया कि जलडमरूमध्य पर नियंत्रण किसका होगा. सहमति पत्र की पांचवीं धारा के अनुसार, ईरान को 60 दिनों तक वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करनी थी. हालांकि, तेहरान ने इस प्रावधान की व्याख्या इस रूप में की कि उसे अपनी सुरक्षा जरूरतों के अनुसार नौवहन को नियंत्रित करने का अधिकार है.
अमेरिका का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है, जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के अधीन है और इस पर एकतरफा ईरानी नियंत्रण नहीं हो सकता. यह कानूनी विवाद अब सैन्य टकराव में बदल चुका है. जिन जहाजों को ईरान ‘अनुमोदित नहीं’ मानता है, उन पर हमले यह संकेत देते हैं कि वह एक नयी समुद्री व्यवस्था स्थापित करना चाहता है, जिसमें वाणिज्यिक जहाज तेहरान की निगरानी में संचालित हों. वॉशिंगटन इसे नौवहन की स्वतंत्रता और वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिरता के लिए अस्वीकार्य चुनौती मानता है. यह संघर्ष अब केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह समुद्री प्रभुत्व और क्षेत्रीय व्यवस्था के लिए एक व्यापक संघर्ष बन गया है. स्थिति को और जटिल बनाता है नाटो की अनिश्चित भूमिका. डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार यूरोपीय सहयोगियों की आलोचना की है कि वे पर्याप्त सैन्य समर्थन नहीं दे रहे हैं. वहीं नाटो महासचिव ने यूरोप के योगदान का बचाव करते हुए रक्षा खर्च और लॉजिस्टिक समर्थन में वृद्धि का उल्लेख किया. इसके बावजूद, इटली सहित कई यूरोपीय देशों ने ईरान के खिलाफ सीधे सैन्य कार्रवाई में शामिल होने से इनकार कर दिया है.
सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में से एक है ईरान के भीतर हुआ राजनीतिक परिवर्तन. अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के साथ एक ऐसा युग समाप्त हो गया, जो सावधानीपूर्ण रणनीतिक संतुलन से परिभाषित था. नये नेतृत्व ने पहले की तुलना में अधिक आक्रामक रुख दिखाया है. इस युद्ध ने ईरान की घरेलू राजनीति को भी बदल दिया है. पहले जनता का गुस्सा मुख्य रूप से शासन के खिलाफ था, जो आर्थिक कठिनाइयों, राजनीतिक दमन और व्यापक विरोध प्रदर्शनों से प्रेरित था. पर अमेरिकी और इस्राइली हमलों ने, जिनसे नागरिक अवसंरचना को नुकसान पहुंचा और नागरिक हताहत हुए, जनधारणा को बदल दिया है. इसके बावजूद, गंभीर संरचनात्मक समस्याएं बनी हुई हैं. ईरान आर्थिक प्रतिबंधों, मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और शिक्षित युवाओं के पलायन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है. राजनीतिक और आर्थिक जीवन पर आइआरजीसी का बढ़ता प्रभुत्व राज्य की शक्ति को मजबूत कर सकता है, लेकिन इससे दीर्घकालिक स्थिरता की गारंटी नहीं मिलती.
किसी समझौते की संभावना दो प्रमुख मुद्दों पर निर्भर करती है-ईरान का परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन को लेकर एक पारस्परिक रूप से स्वीकार्य ढांचा. जब तक इन दोनों मुद्दों का समाधान नहीं होता, तब तक युद्धविराम केवल अस्थायी विराम ही साबित होंगे. भारत के लिए यह संघर्ष तात्कालिक आर्थिक जोखिमों और दीर्घकालिक रणनीतिक चुनौतियों, दोनों को प्रस्तुत करता है. भारत की ऊर्जा सुरक्षा फारस की खाड़ी की स्थिरता से जुड़ी हुई है. होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी प्रकार का व्यवधान वैश्विक तेल कीमतों को प्रभावित करता है, आयात लागत बढ़ाता है और घरेलू महंगाई को बढ़ावा देता है. हाल के हफ्तों में सैकड़ों तेल टैंकर इस मार्ग से गुजरते रहे हैं, पर सुरक्षा स्थिति अब भी नाजुक बनी हुई है. भारत के इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण समुद्री और मानवीय हित भी हैं.
भारतीय ध्वज वाले जहाज खाड़ी के जल में लगातार चल रहे हैं, जबकि सैकड़ों भारतीय नाविक संघर्ष क्षेत्र के पास वाणिज्यिक जहाजों पर तैनात हैं. उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रमुख कूटनीतिक व लॉजिस्टिक प्राथमिकता बन गया है. ऊर्जा के अलावा, पश्चिम एशिया भारत के व्यापार, प्रवासी समुदाय और रणनीतिक साझेदारियों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. नयी दिल्ली ने अमेरिका, इस्राइल, ईरान और खाड़ी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाये रखे हैं. यदि संघर्ष और बढ़ता है, तो इस संतुलन को बनाये रखना और कठिन हो जायेगा. यह उभरता हुआ संघर्ष केवल वॉशिंगटन और तेहरान के बीच तनाव का एक और अध्याय नहीं है. यह पूरे क्षेत्रीय रणनीतिक ढांचे के पुनर्गठन का संकेत है. होर्मुज इस व्यापक संघर्ष का प्रतीक और युद्धक्षेत्र, दोनों बन चुका है. यह टकराव कूटनीति के माध्यम से समाप्त होगा या एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल जायेगा, यह आने वाले महीनों में वॉशिंगटन, तेहरान और अन्य क्षेत्रीय राजधानियों द्वारा लिये जाने वाले राजनीतिक निर्णयों पर निर्भर करेगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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