सिफारिश नहीं, योग्यता के आधार पर मिले जिम्मेदारी

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इंदिरा नुई

इंदिरा नुई

इंदिरा नूयी के एक बयान ने भारत में योग्यता प्रणाली पर नई बहस छेड़ दी है. उन्होंने कहा कि भारत में रहकर बड़ी कंपनी की सीईओ बनना संभव नहीं था. जानें क्यों.

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अपनी माटी से दूर, पूरी तरह से अनजान लोगों के बीच किसी मल्टीनेशनल कंपनी का प्रमुख बन जाना मामूली बात नहीं है. तमिलनाडु से खाली हाथ अमेरिका पहुंची इंदिरा नूयी को जब शीतल पेय की दुनिया की जानी-मानी कंपनी पेप्सिको का सीइओ बनाया गया, तब भारत में भी उनकी सफलता की जमकर बलैया ली गयी थी. इस पद पर लगातार बारह वर्षों तक काबिज और फॉर्च्यून पत्रिका की शक्तिशाली महिलाओं की सूची में लगातार शीर्ष पर बने रहना मामूली बात नहीं है. उन्हीं इंदिरा नूयी के एक बयान पर इन दिनों भारत में विवाद खड़ा हो गया है.

अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस से एक बातचीत में उन्होंने कहा है कि 'यदि मैं भारत से यहां नहीं आती, तो कभी इतनी बड़ी कंपनी की सीइओ नहीं बन पाती. भारत में रहकर ऐसा संभव नहीं था.' भारतीय मूल की होने के बावजूद इंदिरा नूयी ने अपनी बातचीत में चीन को भारत की तुलना में कहीं अधिक व्यवस्थित बता दिया है. विवाद इसलिए भी उठा है. पर जब अपने यहां की व्यवस्था को देखते हैं और इंदिरा के विचार को उसके बरक्स तौलते हैं, तो लगता है कि उन्होंने कुछ खास गलत नहीं कहा है. उन्होंने तो बस इतना ही कहा है कि यहां योग्यता प्रणाली वैसी नहीं है, जैसी अमेरिका में है. यदि वे चीन की व्यवस्था को भारत की तुलना में बेहतर बताती भी हैं, तो उनका संदर्भ भारत की योग्यता प्रणाली का ढीला-ढाला रुख ही दिखाता है.

भारत में आए दिन ऐसी कहानियां पढ़ने-सुनने को मिलती हैं, जहां योग्यता के बावजूद कई लोगों को नौकरी नहीं मिली. मॉलिक्यूलर बायोलॉजी में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले हरगोविंद खुराना ने भी एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि यदि उन्हें भारत में नौकरी मिल जाती, तो वे कनाडा नहीं जाते. दिलचस्प यह है कि उन्होंने स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख स्थित फेडरल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से रिसर्च किया था और उसके बाद भारत लौटे थे. वहीं से अमेरिका के विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय के लिए राह खुली और वहीं रिसर्च करते हुए उन्होंने इतिहास रच दिया. ब्रिटिश पद्धति में पद और नौकरी के लिए योग्यता के अतिरिक्त रेफरेंस और सिफारिश का महत्व अधिक रहा है.

जबकि अमेरिकी पद्धति में सिर्फ प्रतिभा और योग्यता पर भरोसा किया जाता है. चूंकि भारत दो सौ वर्षों तक ब्रिटेन का गुलाम रहा, इसलिए शायद यहां भी ब्रिटिश पद्धति गहरे तक पैठ गयी है. ब्रिटिश भारत के कई ऐसे उदाहरण भी हैं, जब गरीब और कमजोर पृष्ठभूमि वालों को सिविल सेवा परीक्षा पास करने के बावजूद ब्रिटिश शासन ने पद और जिम्मेदारी नहीं सौंपी. दुनिया में जहां-जहां ब्रिटेन का शासन रहा है, वहां यह परिपाटी दिख सकती है. हालांकि, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने भी योग्यता प्रणाली को ही अपना लिया है. यही वजह है कि अब वहां भी योग्य लोगों का भारत से पलायन बढ़ रहा है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि योग्यता प्रणाली और उसके जरिये उपलब्ध होनेवाले अवसरों के कारण ही दुनियाभर की प्रतिभाएं अमेरिका का रुख करती हैं.

अमेरिकी व्यवस्था भी ऐसी है कि वह प्रतिभा और योग्यता को खींच ले जाती है और उसे उसके उचित मुकाम तक पहुंचा देती है. फिर वह नहीं देखती कि वह व्यक्ति काला है या गोरा, एशियाई है या यूरोपीय, वह महिला है या पुरुष. इंदिरा नूयी चूंकि इसी व्यवस्था की वजह से शीर्ष पर पहुंची हैं, इसलिए वह इस व्यवस्था की प्रशंसा कर रही हैं. देखा जाये, तो भारत में योग्यता की परख आधुनिक कॉरपोरेट को, इंजीनियरिंग, वैज्ञानिक और मेडिकल के निजी संस्थानों को ज्यादा है. योग्यता आधारित व्यवस्था अमेरिका की तुलना में कुछ और देशों में कहीं अधिक है. वैसे ईसा पूर्व चीन ने सबसे पहले योग्यता प्रणाली, यानी मेरिटोक्रेसी को विधिवत तरीके से अपनाया. यहां प्रशासनिक अधिकारियों के चयन के लिए परीक्षाओं की शुरुआत हुई. इसे ही मेरिटोक्रेसी का सबसे पुराना रूप माना जाता है. आज भी यहां की प्रशासनिक व्यवस्था योग्यता पर काफी जोर देती है.

लेकिन मेरिटोक्रेसी का सबसे बेहतरीन उदाहरण सिंगापुर है, जहां सरकार और सिविल सेवा में चयन और पदोन्नति पूरी तरह से व्यक्ति की योग्यता और कार्य प्रदर्शन पर ही निर्भर करती है. इसके बाद नंबर आता है नॉर्डिक देशों का- नॉर्वे, डेनमार्क और स्वीडन का. इन देशों में जन्म या धन या पृष्ठभूमि की बजाय 'अवसर की समानता' पर जोर दिया जाता है. इसके बाद फ्रांस की व्यवस्था है, जहां लोक सेवा और राजनीति में मेरिटोक्रेसी का मिला-जुला रूप है. यहां के शीर्ष नेता आमतौर पर देश के सबसे प्रतिष्ठित और कठिन प्रवेश परीक्षा वाले शिक्षण संस्थानों से आते हैं. जाहिर है कि यहां की कॉरपोरेट व्यवस्था ने भी पूरी तरह से योग्यता प्रणाली को ही अपना रखा है.

अमेरिका का स्थान इसके बाद आता है. अपने ज्ञान और मेधा के दम पर भारत प्राचीन काल में विश्व गुरु रहा है. तब मेधा और योग्यता को ही किसी जिम्मेदारी का पैमाना माना जाता था. भारत को फिर से विश्व गुरु के पद पर प्रतिष्ठित करने की बात खूब हो रही है, पर यह तभी हो पायेगा, जब भारत में जाति, धर्म, लिंग के बजाय केवल योग्यता आधारित समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास होगा. योग्यतम लोगों का सम्मान होगा और उन्हें उनकी योग्यतानुसार जिम्मेदारियां मिलेंगी. इंदिरा नूयी सीधे-सीधे भारत की व्यवस्था पर सवाल तो नहीं उठातीं, पर प्रकारांतर से वे यह बताने में सफल रहती हैं कि यहां अब भी योग्यता आधारित समाज नहीं बन पाया है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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उमेश चतुर्वेदी

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By उमेश चतुर्वेदी

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