जनाकांक्षाओं के शिल्पी और संवेदना के प्रतीक थे चंद्रशेखर

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर
चंद्रशेखर भारतीय राजनीति के एक संवेदनशील और दृढ़ व्यक्तित्व थे. उनकी निष्कपटता और सहज आत्मीयता ने उन्हें अनगिनत प्रशंसकों का प्रिय बनाया.
-रवीन्द्र भारती-
(प्रसिद्ध साहित्यकार)
भारतीय राजनीति के उज्ज्वल नक्षत्रों में चंद्रशेखर जी का स्थान विशिष्ट है. समय के अनेक उतार-चढ़ाव आए, सत्ता बदली, राजनीतिक समीकरण बदले, पर उनकी आभा कभी धूमिल नहीं हुई. उनके प्रशंसकों की संख्या असंख्य थी और प्रत्येक व्यक्ति यह विश्वास करता था कि चंद्रशेखर उसे सबसे अधिक स्नेह करते हैं. सच तो यह है कि हर व्यक्ति के पास अपने-अपने चंद्रशेखर थे, अपनी-अपनी स्मृतियां थीं और अपने-अपने किस्से.
ऐसा सौभाग्य विरले ही किसी राजनेता को प्राप्त होता है. उनका व्यक्तित्व गहन संवेदनशीलता, निष्कपटता और सहज आत्मीयता का अद्भुत संगम था. उनसे एक बार मिलने वाला व्यक्ति पुनः उनसे मिलने की इच्छा अवश्य करता. उनकी वाणी में मिट्टी की सोंधी सुगंध बसती थी. जब वे भोजपुरी और हिंदी का सहज मिश्रण करते हुए बोलते, तो शब्द सीधे हृदय में उतर जाते. वे कठिन से कठिन बात भी अत्यंत सरलता से कहते थे. उनके विचारों में दृढ़ता, वैज्ञानिक दृष्टि और नैतिक स्पष्टता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता था. वे ऐसे निर्भीक व्यक्तित्व थे जिन्होंने जीवन भर किसी भी प्रकार के दबाव के आगे समझौता करना स्वीकार नहीं किया. लोग उन्हें आदरपूर्वक अध्यक्षजी कहकर संबोधित करते थे, जबकि मैं उन्हें स्नेह से भइया कहता था.
चंद्रशेखर से पहली मुलाकात
उनसे मेरी पहली भेंट बिहार आंदोलन के दौरान पटना की महिला चरखा समिति में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सान्निध्य में हुई. चरखा समिति की सीढ़ियां उतरते हुए उन्होंने मुझसे पूछा, अज्ञेय जी भी आंदोलन के साथ हैं न? मैंने उत्तर दिया, जी हां. विजय तेंदुलकर, यूआर अनंतमूर्ति, गौरीशंकर घोष जैसे अनेक गैर-हिंदी भाषी रचनाकार भी इस आंदोलन से जुड़े हैं. केवल लेखक ही नहीं, बल्कि मूर्तिकार, चित्रकार, रंगकर्मी, नर्तक और गायक भी हैं. वह संक्षिप्त-सी बातचीत कब आत्मीय संबंध में बदल गई, इसका पता ही नहीं चला. उसके बाद जब भी दिल्ली जाता, उनसे मिले बिना लौटना अधूरा सा लगता था. सन 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद चंद्रशेखर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. इसके पश्चात उनका बिहार आना-जाना और अधिक बढ़ गया. पटना आने पर वे कभी राजकीय अतिथिशाला में ,तो कभी किसी कार्यकर्ता के घर ठहरते. मुझे उनके आगमन का समाचार मिल जाता और मैं उनसे मिलने पहुंच जाता. उनके पास मिलने वालों की लंबी कतार रहती. भीड़ में मुझे देखते ही वे मुस्कराकर पुकारते, आवाऽ हो भारती, आवाऽ... आवे दऽ भाई. मेरे साथ प्रायः आंदोलन के साथी छोटन सिंह भी होते थे.
अप्रत्याशित राजनीतिक निर्णय लेने में माहिर
एक प्रसंग आज भी स्मृति में ताजा है. पटना पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव घोषित हुआ था. छोटन सिंह एक सुबह मेरे घर आए और बोले कि मैं चुनाव लड़ना चाहता हूं. अध्यक्षजी से एक बार कह दीजिए. उनकी बात सुनकर मुझे हंसी आ गई. मैं अपनी हैसियत भी जानता था और परिस्थितियां भी. मैंने उन्हें बहुत समझाया कि मुझे इस झंझट में मत डालो, मेरी कौन सुनेगा. पर वे अपनी जिद पर अड़े रहे. अंततः मैं उन्हें लेकर चंद्रशेखर के पास पहुंचा. अवसर देखकर मैंने कहा कि भइया, छोटन पटना पश्चिम से चुनाव लड़ना चाहते हैं. मेरी बात सुनते ही वे मुस्कराए और अपनी चिरपरिचित भोजपुरी में बोले, ई त टमटम के घोड़ा बा. बीच पिचे पर दौड़ी, दांए-बांए कुछो ना देखी. एकरा के दस वोटो ना मिली. उनकी बात सुनकर वहां उपस्थित सभी लोग ठहाका लगाकर हंस पड़े.
कुछ दिनों बाद आंदोलन के साथी और इमरजेंसी में मेरे साथ जेल रह चुके अरुण कुमार वर्मा से भेंट हुई. उन्होंने बताया कि वे भी उसी सीट से चुनाव लड़ेंगे. उनके पक्ष में अनेक सांसद, विधायक और प्रभावशाली नेता थे. स्वाभाविक रूप से टिकट मिलने की संभावना भी उनकी ही अधिक मानी जा रही थी. इसके बावजूद छोटन सिंह मुझे दिल्ली ले गए. हम साउथ एवेन्यू स्थित चंद्रशेखर के आवास पहुंचे. मुझे देखते ही उन्होंने स्नेहपूर्वक बुलाया. मैंने कहा, भइया, छोटन के टिकट की बात लेकर आया हूं. वह एक समर्पित राजनीतिक कार्यकर्ता है. आंदोलन में उसकी सक्रिय भूमिका रही है. लोकतंत्र रचनाकार मंच की ओर से मैं उसके नाम का प्रस्ताव करता हूं. वे कुछ क्षण मौन रहे. फिर शांत स्वर में बोले, ठीक बा, कलम उठा लेहलीं. अब पार्टी रहे चाहे टूट जाए, कोनो चिन्ता ना ह. उन्होंने तत्काल सुरेन्द्र मोहनजी को बुलाकर आवश्यक पत्र तैयार कराने का निर्देश दिया. दो दिन बाद पार्टी की बैठक हुई. लंबी बहस और अनेक मतभेदों के बावजूद अंततः पटना पश्चिम से जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में छोटन सिंह के नाम पर सहमति बन गई. यह निर्णय अनेक लोगों के लिए अप्रत्याशित था.
स्नेह और विश्वास की स्मृति है उनसे मिला पश्मीना शॉल
दिल्ली से लौटने से पहले मैं उनका आभार व्यक्त करने उनके आवास पहुंचा. उन्हें सामने देखकर मैं कुछ बोल नहीं पाया. मेरी आंखों से आंसू स्वतः बह निकले. उन्होंने स्नेहपूर्वक मेरे कंधे पर हाथ रखा और अपने निजी सचिव गौतम से कहा कि मुझे स्टेशन छोड़ आएं. विदा होते समय गौतम ने मुझे एक पैकेट और पश्मीने का एक शाल भेंट किया. वह शाल आज भी मेरे लिए केवल एक उपहार नहीं, बल्कि चंद्रशेखर जी के स्नेह और विश्वास की अमूल्य स्मृति है. चंद्रशेखर सचमुच अलग मिट्टी के बने हुए व्यक्ति थे. उनमें उदारता थी, करुणा थी, विनम्रता थी और अहंकार का नामोनिशान नहीं था. वे लेखकों, कवियों, कलाकारों और वैचारिक कर्मियों का हृदय से सम्मान करते थे. उन पर लिखने बैठूं तो एक पूरी पुस्तक तैयार हो जाए. वास्तव में वे जनाकांक्षाओं के ऐसे शिल्पी थे जिनकी झोली एक बेहतर, अधिक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज के सपनों से सदैव भरी रहती थी.
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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