Sholay में काम के बदले इस एक्टर को फीस में मिला था फ्रिज, जानें तब क्या थी उसकी कीमत

Updated at : 20 Feb 2025 3:56 PM (IST)
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Sholay में काम के बदले इस एक्टर को फीस में मिला था फ्रिज, तब जानें क्या थी उसकी कीमत

Sholay: जब शोले फिल्म 15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई थी, उस समय भारत की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे विकसित हो रही थी. फ्रिज को एक लग्जरी आइटम माना जाता था, और इसे केवल उच्च मध्यम वर्ग और अमीर परिवार ही खरीद सकते थे.

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Sholay: हिंदी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता सचिन पिलगांवकर ने अपने करियर की शुरुआत बतौर बाल कलाकार की थी. वह 65 से अधिक फिल्मों में चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में नजर आ चुके हैं और अपने बेहतरीन अभिनय से दर्शकों के दिलों में खास जगह बना चुके हैं. अभिनय के अलावा, उन्होंने निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रखा और अब तक 50 से अधिक फिल्मों का सफल निर्देशन कर चुके हैं.

बॉलीवुड के साथ-साथ मराठी सिनेमा और टेलीविजन में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया. सचिन को असली पहचान 1975 में आई ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘शोले’ से मिली. इस फिल्म में उनका किरदार भले ही छोटा था, लेकिन दर्शकों ने इसे खूब पसंद किया. दिलचस्प बात यह है कि इस फिल्म के लिए उन्हें फीस के बजाय एक फ्रिज मिला था, जो उस दौर में काफी महंगा माना जाता था. तो आइए जानते हैं कि 1975 में फ्रिज की कीमत और बाजार की स्थिति क्या थी.

1975 में फ्रिज की कीमत और बाजार स्थिति

जब शोले फिल्म 15 अगस्त 1975 को रिलीज़ हुई थी, उस समय भारत की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे विकसित हो रही थी. फ्रिज को एक लग्जरी आइटम माना जाता था, और इसे केवल उच्च मध्यम वर्ग और अमीर परिवार ही खरीद सकते थे.

1975 में फ्रिज की औसत कीमत

1970 के दशक में भारत में फ्रिज की कीमत लगभग ₹3,000 से ₹5,000 थी. कुछ उच्च गुणवत्ता वाले और बड़े ब्रांड के मॉडल ₹6,000 तक भी मिलते थे. 1970 के दशक में भारत में मुख्य रूप से कुछ चुनिंदा कंपनियां ही फ्रिज का उत्पादन और बिक्री करती थीं:

  • Kelvinator – यह उस दौर का सबसे लोकप्रिय ब्रांड था.
  • Godrej – भारतीय ब्रांड जो घर-घर में जाना जाता था.
  • Voltas – इस कंपनी के फ्रिज भी बाज़ार में उपलब्ध थे.
  • Allwyn – यह भी एक प्रसिद्ध ब्रांड था.

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1975 समय की औसत सैलरी और फ्रिज की तुलना

1975 में एक आम सरकारी कर्मचारी की औसत मासिक सैलरी ₹500 से ₹1,000 के बीच थी. यानी एक अच्छे ब्रांड का फ्रिज खरीदने के लिए किसी को अपनी 4-5 महीनों की पूरी सैलरी खर्च करनी पड़ती थी.इस वजह से अधिकतर लोग फ्रिज नहीं खरीद पाते थे, और घरों में मिट्टी के मटकों का उपयोग पानी ठंडा करने के लिए किया जाता था.

क्यों था फ्रिज महंगा?

उस समय भारत में बहुत कम कंपनियां फ्रिज बनाती थीं, इसलिए कॉम्पिटिशन कम था. ज़्यादातर फ्रिज या तो इम्पोर्ट किए जाते थे या महंगे भारतीय मॉडल होते थे. इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स पर ऊँचा टैक्स भी लगता था.

लोगों की जीवनशैली पर असर

केवल अमीर और उच्च-मध्यम वर्ग के पास ही फ्रिज हुआ करता था. सब्जियों और दूध को ताजा रखने के लिए पारंपरिक तरीकों (जैसे मटके, छांव में रखना, और गीले कपड़े में लपेटना) का उपयोग किया जाता था.शादी के समय फ्रिज को दहेज में देना एक बड़ी बात मानी जाती थी. 1975 में फ्रिज खरीदना हर किसी के बस की बात नहीं थी. यह एक स्टेटस सिंबल हुआ करता था, और केवल संपन्न परिवार ही इसे खरीद सकते थे. धीरे-धीरे 1980 और 1990 के दशकों में फ्रिज की कीमतें थोड़ी कम हुईं और मध्यम वर्ग के लिए भी यह सुलभ हो गया.

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Abhishek Pandey

लेखक के बारे में

By Abhishek Pandey

अभिषेक पाण्डेय पिछले 2 वर्षों से प्रभात खबर (Prabhat Khabar) में डिजिटल जर्नलिस्ट के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने पत्रकारिता के प्रतिष्ठित संस्थान 'दादा माखनलाल की बगिया' यानी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (MCU) से मीडिया की बारीकियां सीखीं और अपनी शैक्षणिक योग्यता पूरी की है। अभिषेक को वित्तीय जगत (Financial Sector) और बाजार की गहरी समझ है। वे नियमित रूप से स्टॉक मार्केट (Stock Market), पर्सनल फाइनेंस, बजट और बैंकिंग जैसे जटिल विषयों पर गहन शोध के साथ विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं। इसके अतिरिक्त, इंडस्ट्री न्यूज, MSME सेक्टर, एग्रीकल्चर (कृषि) और केंद्र व राज्य सरकार की सरकारी योजनाओं (Sarkari Yojana) का प्रभावी विश्लेषण उनके लेखन के मुख्य क्षेत्र हैं। आम जनमानस से जुड़ी यूटिलिटी (Utility) खबरों और प्रेरणादायक सक्सेस स्टोरीज को पाठकों तक पहुँचाने में उनकी विशेष रुचि है। तथ्यों की सटीकता और सरल भाषा अभिषेक के लेखन की पहचान है, जिसका उद्देश्य पाठकों को हर महत्वपूर्ण बदलाव के प्रति जागरूक और सशक्त बनाना है।

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