ममता की प्रतिमूर्ति बीजो देवी: गुमला में 52 अनाथ बच्चों के लिए बनीं 'यशोदा मां', माड़ पिलाकर पाला-पोसा

Published by :Sameer Oraon
Published at :10 May 2026 5:35 AM (IST)
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Mothers Day 2026

बीजो देवी अपने 52 बच्चों के साथ

Mothers Day 2026: झारखंड के गुमला जिले की उर्मी पंचायत में बीजो देवी पिछले पांच वर्षों से 52 अनाथ बच्चों की मां बनकर उनकी सेवा कर रही हैं. कोरोना काल की विभीषिका से शुरू हुआ यह सफर आज एक बड़े परिवार में बदल चुका है. उनके बेटे सुनील ने भी अपनी नौकरी छोड़कर इस मिशन में मां का हाथ बंटाया है. आज यह आश्रम गुमला से लेकर असम तक के बच्चों के लिए उम्मीद की किरण बना हुआ है.

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गुमला, (जगरनाथ/रविशंकर की रिपोर्ट): कहते हैं कि ईश्वर हर जगह नहीं पहुंच सकता, इसलिए उसने ‘मां’ को बनाया. गुमला जिले की उर्मी पंचायत में रहने वाली बीजो देवी इस कहावत को अक्षरशः जी रही हैं. पिछले पांच वर्षों से वे एक ‘सेवा आश्रम’ के माध्यम से उन बच्चों का सहारा बनी हुई हैं, जिनका इस दुनिया में कोई नहीं है. उनकी यह यात्रा साल 2021 में आधिकारिक रूप से शुरू हुई, लेकिन इसकी नींव कोरोना काल की उस विभीषिका में पड़ी जब इंसानियत खुद को बचाने की जद्दोजहद में थी.

माड़-साग पिलाकर सींचा मासूमों का भविष्य

शुरुआती दिन बीजो देवी के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे. संसाधनों के नाम पर कुछ नहीं था, लेकिन हृदय में असीम करुणा थी. उन्होंने डबडबाती आंखों से बताया, “धन से बगरा धनी मन कर होएक जरूरी है बेटा (धन से बड़ा धनी मन का होना जरूरी है).” उन कठिन दिनों में जब अनाज की कमी थी, बीजो देवी ने खुद आधा पेट खाकर बच्चों को माड़ (चावल का उबला पानी) पिलाकर पाला और खेतों से साग तोड़कर उनकी भूख मिटायी.

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एक से शुरू हुआ कारवां, अब 52 का विशाल परिवार

बीजो देवी की ममता का आंचल इतना बड़ा है कि आज उनके आश्रम में 52 बच्चे रह रहे हैं. यह सिर्फ गुमला तक सीमित नहीं है, यहां असम जैसे सुदूर राज्यों के बच्चे भी आश्रय पा रहे हैं. इन बच्चों के लिए बीजो देवी केवल एक संचालिका नहीं, बल्कि साक्षात मां का रूप हैं. हर बच्चे की आंखों में उनके प्रति वही चमक है, जो एक संतान की अपनी मां के लिए होती है.

पुत्र का त्याग: करियर छोड़ मां के मिशन में शामिल

मां के इस पुनीत कार्य में उनके बड़े बेटे सुनील ने त्याग की एक अनूठी मिसाल पेश की है. कोरोना काल के दौरान सुनील कोलकाता में एक अच्छी नौकरी कर रहे थे. जब उन्होंने अपनी मां के संघर्ष और बच्चों के प्रति उनके निस्वार्थ प्रेम को देखा, तो उनसे रहा नहीं गया. उन्होंने अपनी जमी-जमायी नौकरी को तिलांजलि दे दी और वापस गुमला लौट आए. आज सुनील पूरी तरह से इस मिशन में अपनी मां के दाहिने हाथ बनकर जुटे हुए हैं.

समाज का बढ़ता सहयोग और नई उम्मीदें

पांच वर्षों के अथक परिश्रम के बाद अब इस ‘ममता के मंदिर’ की चर्चा पूरे जिले में हो रही है. धीरे-धीरे गुमला के समाजसेवी और जागरूक नागरिक भी इस आश्रम की मदद के लिए आगे आ रहे हैं. सामाजिक सहयोग मिलने से बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्य की उम्मीदें अब और प्रबल हो गई हैं. बीजो देवी का यह आश्रम आज समाज के लिए एक बड़ा संदेश है कि सेवा के लिए धन से अधिक धनी मन की आवश्यकता होती है.

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Sameer Oraon

लेखक के बारे में

By Sameer Oraon

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

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