दरकते भवन के साथ खंडहर होता बच्चों का भविष्य

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 12 Jan 2015 8:31 AM

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मंत्री जी जरा दशा देखिये ना : आदिम जनजाति आवासीय मध्य विद्यालय मंङिायाड़ा का बदहाली में रह रहे पहाड़िया बच्चे, कैसे होगा इनका कल्याण खुले में शौच जाने को बच्चे मजबूर जुगाड़ व्यवस्था से मिल रही सुविधाएं मुकम्मल जरूरतों के लिए तरस रहे बच्चे दुमका : दुमका जिले में पहाड़िया आदिम जनजाति बच्चों के लिए […]

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मंत्री जी जरा दशा देखिये ना : आदिम जनजाति आवासीय मध्य विद्यालय मंङिायाड़ा का
बदहाली में रह रहे पहाड़िया बच्चे, कैसे होगा इनका कल्याण
खुले में शौच जाने को बच्चे मजबूर
जुगाड़ व्यवस्था से मिल रही सुविधाएं
मुकम्मल जरूरतों के लिए तरस रहे बच्चे
दुमका : दुमका जिले में पहाड़िया आदिम जनजाति बच्चों के लिए बने आवासीय विद्यालयों का बुरा हाल है. दुमका-पाकुड़ मार्ग पर मंझियाड़ा स्थित आदिम जनजाति आवासीय मध्य विद्यालय खंडहर में तब्दील हो चुका है.
बच्चे उसमें जैसे-तैसे रहने को विवश हैं. भवन की दीवारों और छज्जे दरक रहे हैं और आये दिन गिरतेहते हैं. छात्रावास की खिड़कियों में न तो ग्रिल है और न ही उसे बंद करने के लिए कुंडी ही. कई दरवाजे तो बांस के फट्टे के जरिये टीका कर रखे गये हैं. दीवारों पर सिलन है. रोशनी भी कमरों में नहीं पहुंचती. जिससे कड़ाके की ठंड में उन्हें और भी परेशानी का सामना करना पड़ता है.
आये थे पढ़ने, बन गये रसोइया !
इस आवासीय विद्यालय में रविवार को अजीब ही नजारा दिखा. किचन शेड में चावल बनाने के लिए बड़ा सा वर्तन भट्टी में चढ़ा हुआ था. यह चावल कोई रसोइया नहीं बल्कि स्कूल का ही एक छात्र पका रहा था. इस स्कूल में गैस चूल्हा वाली भट्टी भी है, जो दूसरी जगह है.
इस गैस भट्टी में गोभी-आलू की सब्जी भी बनी. इस गैस चूल्हे में मास्टर साहब के सामने बच्चे सब्जी पका रहे थे. रिंकू देहरी, पंकज गृही आदि बच्चों ने कहा कि डर लगता है, पर खाने के लिए खाना पकाना पड़ेगा ना. रसोइया नहीं रहने की वजह से वे खाना खुद ही बना रहे हैं. बच्चों ने मीनू के अनुरूप खाने में अंडा नहीं दिये जाने की शिकायत की. उन्हें अक्सर खाने में दाल भी नहीं दिया जाता.
स्वच्छता के नारे लिखे पर शौचालय नहीं
विद्यालय में 85 बच्चे नामांकित हैं, पर शौचालय एक भी नहीं है. हां शौचालय के उपयोग से संबंधित नारे जरूर लिखे हुए हैं. बच्चे शौच के लिए विद्यालय प्रांगण से बाहर निकल कर दुमका-पाकुड़ मार्ग को क्रॉस कर सामने मैदान में खुले में जाते हैं.
शिक्षकों के क्वार्टर पड़े हैं खाली
ऐसे तो इस विद्यालय प्रांगण के अंदर शिक्षकों के लिए क्वार्टर भी बने हैं. पर एक भी शिक्षक क्वार्टर में नहीं रहते. प्रभारी प्रधानाध्यापक मनोज कुमार रविवार को विद्यालय में मौजूद थे, पर दूसरा कोई भी कर्मचारी विद्यालय में नहीं था. इस स्कूल में शिक्षकों के कुल सात पद सृजित हैं, पर पदस्थापित चार ही हैं. रविवार को मृणाल मणि, संजय कुमार व विरेंद्र सिंह में नहीं दिखे.
कई बच्चों को नहीं मिली किताबें
शैक्षणिक सत्र 2014-15 बीतने को है. पर अब तक इस आवासीय विद्यालय में पहली, तीसरी एवं पांचवी कक्षा के बच्चों को किताब नहीं मिली है. जिससे बच्चों को काफर परेशानी हो रही है. वहीं दूसरी, चौथी व छठी के बच्चों को भी किताब मिले ज्यादा दिन नहीं हुए हैं.
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