देवराहा बाबा ने डाली थी बोधायन आश्रम की नींव

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 05 Jan 2016 6:52 PM

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देवराहा बाबा ने डाली थी बोधायन आश्रम की नींव फोटो- 17 मंदिर में भगवान बोधायन की मूर्ति, 18 मंदिर परिसर में बना तालाब, 19 बोधायन वट वृक्ष सीतामढ़ी. बाजपट्टी प्रखंड के वनगांव स्थित भगवान बोधायन की जन्म व कर्मस्थली तीन दिनों से भक्तिमय बना हुआ है. वहां मंदिर में भगवान बोधायन की भव्य व आकर्षक […]

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देवराहा बाबा ने डाली थी बोधायन आश्रम की नींव फोटो- 17 मंदिर में भगवान बोधायन की मूर्ति, 18 मंदिर परिसर में बना तालाब, 19 बोधायन वट वृक्ष सीतामढ़ी. बाजपट्टी प्रखंड के वनगांव स्थित भगवान बोधायन की जन्म व कर्मस्थली तीन दिनों से भक्तिमय बना हुआ है. वहां मंदिर में भगवान बोधायन की भव्य व आकर्षक मूर्ति है. चार जनवरी से ही बोधायन की जयंती पर विभिन्न कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है. बताया जाता है कि 1961 में वनगांव में देवराहा बाबा ने बोधायन आश्रम के निर्माण कार्य की नींव डाली थी. ग्रामीण सह दार्शनिक वासुदेवाचार्य के प्रयास से देवराहा बाबा समेत बड़े-बड़े संत आश्रम के शिलान्यास कार्यक्रम में शामिल हुए थे. यह स्थल गौतम बुद्ध के बोधगया से कमतर नहीं है. पाणिनी को मार डाला था बाघ जहां पर बोधायन आश्रम है, कभी वहां पर महर्षि पाणिनी भी रहा करते थे. वे वहां पर साधना करते थे. कहा जाता है कि यहीं पर साधना कर महर्षि पाणिनी ने भगवान शंकर को प्राप्त किया था. बता दें कि महेश्वर सूत्र महर्षि पाणिनी की ही देन है. विभिन्न धर्म-शास्त्रों के हवाले से ग्रामीण व सेवानिवृत्त रेलवे कर्मी सुनील कुमार झा बताते हैं कि महर्षि पाणिनी ने ‘अष्टाधायी’ की रचना की थी. महर्षि बरु रुचि ने पाणिनी को अपनी रचना अष्टाधायी में सुधार करने की बात कही थी. इसको लेकर दोनों के बीच शास्त्रार्थ हुआ था और उसी दौरान बरु रुचि ने पाणिनी को शीघ्र मृत्यु को प्राप्त होने का शाप दे दिया था. इससे पाणिनी बच भी नहीं सके. कहा जाता है कि वनगांव के सरेह में बाघ ने पाणिनी को मार डाला था. वह सरेह आज भी ‘बगही चौरी’ के नाम से जाना जाता है. बता दें कि यह शास्त्रार्थ वहीं हुआ था, जहां भगवान बोधायन का आश्रम है. बोधायन यानी पुरुषोत्तमाचार्य कहा जाता है कि जिस भूमि में जैसी विशिष्टता रहती है, उस भूमि से वैसे ही पदार्थों का उद्भव होता है. मिथिला की भूमि भी कम विशिष्टता वाली नहीं रही है. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मिथिला की धरती पर मां जानकी का उद्भव होने के साथ ही इस भूमि पर राजा जनक, महर्षि याग्यबल्क्य, गौतम, कणाद, बुद्ध, बोधायन, कुमारिल, उदयन, वाचस्पति व विद्यापति जैसे विद्वान उत्पन्न हुए. सन्यास ग्रहण करने के बाद बोधायन का नाम पुरुषोत्तमाचार्य हो जाने के बाद भी वे भगवान बोधायन के ही नाम से प्रसिद्ध हुए. जन्म स्थान को लेकर शास्त्रार्थ सैकड़ों वर्ष पूर्व भगवान बोधायन के जन्म स्थान को लेकर विद्वानों व संतो में भ्रम की स्थिति थी. जानकारों का कहना है कि भगवान बोधायन के देहावसान स्थल सूरत में विद्वानों के बीच महीनों तक शास्त्रार्थ हुआ था और उसी दौरान यह स्पष्ट हुआ था कि भगवान बोधायन का जन्मस्थली वनगांव है. भगवान बोधायन वनगांव के बाद गुजरात के सूरत के ताप्ती नदी के तट पर साधना करने लगे थे. वहीं पर उन्होंने अंतिम सांस ली थी. वह स्थान आज भी बोधायन ग्राम के नाम से जाना जाता है. ताप्ती के तट पर भगवान गौतम की समाधि स्थल ‘गौतमेश्वर’ के नाम से जाना जाता है. ठीक उसी तरह ताप्ती के तट पर भगवान बोधायन का समाधि स्थल ‘बोधायनेश्वर’ के नाम से विख्यात है. वासुदेवाचार्य को सार्वभौम की उपाधि वनगांव में भगवान बोधायन आश्रम के निर्माण में ग्रामीण व दार्शनिक वासुदेवाचार्य का अहम योगदान माना जाता है. वे बाल्यावस्था में हीं काशी चले गये थे. काशी विश्वविद्यालय में पढ़ाई पूरी की थी. उनकी विद्वता को देखते हुए विश्वविद्यालय की ओर से उन्हें ‘सार्वभौम’ की उपाधि दी गयी थी. वे छह दर्शन के प्रकांड विद्वान माने जाते थे. राम अनुग्रह सिंह व सुशीला देवी के पुत्र वासुदेवाचार्य काशी विश्वविद्यालय में अध्यापन भी किये थे.

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