सेहत पर भारी गोरखधंधा : दवाओं का बड़ा खेल, कहीं 700 में, तो कहीं मिल रहीं 2000 रू में, मरीजों को हो रहा नुकसान

Updated at : 18 Oct 2019 8:36 AM (IST)
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सेहत पर भारी गोरखधंधा : दवाओं का बड़ा खेल, कहीं 700 में, तो कहीं मिल रहीं 2000 रू में, मरीजों को हो रहा नुकसान

रविशंकर उपाध्याय पटना : ये दो केस दवाओं की कीमतों में बड़े खेल की ओर इशारा करते हैं. एक ही कंपनी की दवा खुदरा दुकानों में क्यों प्रिंट रेट पर मिलती है और क्यों थोक दवा की मंडी में उसका रेट आधा या उससे भी कम हो जाता है? क्यों इस कारोबार पर किसी जिम्मेदार […]

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रविशंकर उपाध्याय
पटना : ये दो केस दवाओं की कीमतों में बड़े खेल की ओर इशारा करते हैं. एक ही कंपनी की दवा खुदरा दुकानों में क्यों प्रिंट रेट पर मिलती है और क्यों थोक दवा की मंडी में उसका रेट आधा या उससे भी कम हो जाता है?
क्यों इस कारोबार पर किसी जिम्मेदार की नजर नहीं जाती है? जब हमने इस धंधे को समझने के लिए दवा कारोबारियों, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव और डॉक्टरों से बात की तो उनका कहना था कि दवाओं की कीमत देखकर ही सबकुछ नहीं तय किया जा सकता है. जेनरिक दवाओं में मार्जिन काफी ज्यादा होता है. डॉक्टरों के कमीशन का खेल अलग है और बड़े दुकानदारों द्वारा दवाओं की उपलब्धता का हवाला देकर पैसे एेंठने की जुगत अलग.
एक्सपायरी डेट बदलने से लेकर बोनस का खेल
पटना के दवा बाजार को लंबे समय से समझ रहे संदीप पाटील कहते हैं कि ब्रांडेड कंपनियों में या यूं कहिए कि जो जेनरिक दवाएं नहीं हैं, उनकी कीमतों में बड़ा डिस्काउंट नहीं मिल सकता है. ब्रांडेड के नाम पर जेनरिक दवाएं बेचकर ज्यादा छूट दी जाती है. यही नहीं, एक्सपायरी डेट को बदलने तक का खेल खेला जाता है. दवाओं में कंपनियां जो बोनस रखती हैं, वह बड़ी दुकानों द्वारा नहीं दिया जाता है. यही सब कारण है कि बड़ी दुकानों में प्रिंट रेट पर मिलने वाली दवाएं आपको किसी अन्य दुकान में सस्ती मिल जाती हैं.
केस
दरभंगा के एक शिक्षक ने पत्नी का इलाज पटना के बोरिंग राेड स्थित एक डॉक्टर के यहां कराया. डॉक्टर ने उन्हें वीनैट नामक टैबलेट लिखा. पहली बार उन्होंने इस दवा को एक ब्रांडेड स्टोर पर खरीदा तो उन्हें प्रिंट रेट 2027 रुपये में मिली. दूसरी बार उन्होंने उसी दुकान के पास रेट पूछा तो कहा गया कि 800 रुपये में मिल जायेगी. जब उन्होंने उस डॉक्टर के कंपाउंडर से रेट पूछा तो उसने 700 रुपये में दे दी.
केस
गया के रामानुज पांडेय तीन दिनों से पीएमसीएच के डेंगू वार्ड में भर्ती हैं. उनको बाहर की दवाएं लिखी गयीं तो उनके पुत्र नीरज पांडेय अशोक राजपथ स्थित दुकानों में खरीदने गये. रेट लिया तो उन्हें प्रिंट रेट पर दवाएं देने की बात कही गयी. चूंकि दवाएं काफी महंगी थीं तो उन्होंने उसी दुकान की बगल वाली गली में एक बार कीमत जानने का फैसला किया. वहां पर उन्हें वही दवाएं लगभग आधे रेट में दी गयीं.
बिना बिल के ही मरीजों को दी जाती हैं दवाएं
ज्यादा डिस्काउंट देने का एक और कारण है कि मरीजों को दवा देने के बाद भी यहां पक्का बिल नहीं दिया जाता है. केमिस्ट शॉप में बिना बिल के ही सारा काम हो रहा है. इतना ही नहीं, यहां जीएसटी का भी पालन नहीं हो रहा. बिना जीएसटी नंबर दिये ही दवाओं की खरीद-फरोख्त हो रही है. सरकार के राजस्व की चोरी कर दवाएं सस्ती दी जाती हैं.
ढुलमुल ड्रग पॉलिसी जिम्मेदार : आइएमए
आइएमए के वरीय उपाध्यक्ष डॉ अजय कुमार कहते हैं कि दवाओं की कीमतों में खेल की बड़ी वजह केंद्र सरकार की ढुलमुल ड्रग पॉलिसी है. पॉलिसी में कमियों की वजह से लगातार खेल हो रहा है. जेनरिक दवाओं को लेकर स्पष्ट निर्देश है कि वह कम-से-कम कीमत में लोगों को उपलब्ध करायी जाये, लेकिन ऐसा होता नहीं है. इसे लेकर कार्रवाई भी नहीं होती है.
नकली दवा की शिकायत पर कार्रवाई : ड्रग इंस्पेक्टर
प्राइस कंट्रोल व क्वालिटी सेल्स की जिम्मेदारी संभालने वाले ड्रग इंस्पेक्टर विश्वजीत दास गुप्ता कहते हैं कि जो दवाएं शिड्यूल श्रेणी में हैं, उन पर रेग्यूलेशन के लिए हमारी टीम लगातार काम करती है. जहां तक कुछ दवाओं पर ज्यादा छूट देने का सवाल है तो उसमें दवा कंपनियों की मार्केटिंग पॉलिसी जिम्मेदार होती है. नकली दवा की शिकायत के बाद फौरन कार्रवाई करते हैं.
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