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2019 के लिए अमित शाह की नीतीश कुमार के साथ बैठक कितनी अहम है?

Updated at : 12 Jul 2018 9:35 AM (IST)
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2019 के लिए अमित शाह की नीतीश कुमार के साथ बैठक कितनी अहम है?

नयी दिल्ली :पटना में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह व जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार की मुलाकात पर आज हर किसी की नजरें टिकी हैं. एक महीने के अंतराल पर अमित शाह की यह एनडीए के एक और अहम सहयोगी से दूसरी मुलाकात है. इससे पहले वे मुंबई में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से मिले थे. भारतीय […]

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नयी दिल्ली :पटना में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह व जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार की मुलाकात पर आज हर किसी की नजरें टिकी हैं. एक महीने के अंतराल पर अमित शाह की यह एनडीए के एक और अहम सहयोगी से दूसरी मुलाकात है. इससे पहले वे मुंबई में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से मिले थे. भारतीय जनता पार्टी के लिए लोकसभा चुनाव 2019 का मैदान 2014 की तरह बेहद आसान नहीं है. तब यूपीए सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से सत्ता में होते हुए ही आखिरी सासें लेती साफ दिख रही थी. अन्ना हजारे के आंदोलन व अरविंद केजरीवाल के बेहद आक्रामक प्रेस कान्फ्रेंस ने यूपीए दो के अंतिम सालों में सत्ता के विरोध में एक जन मानस तैयार किया था. अब कांग्रेस न तो केंद्र में है और न राज्यों में ( अपवाद छोड़ कर) में. इसके उलट भाजपा चार सालसे केंद्र में सत्ता में है व 20 राज्यों में भाजपा के सरकार में होने या उसके साझेदार होने के बाद एंटी इन्कंबेंसी का फैक्टर कुछ न कुछ तो है ही.

नि:संदेह नरेंद्र मोदी अब भी सबसे लोकप्रिय नेता हैं, लेकिन 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव ने देश को महागंठबंधन का फार्मूला दे दिया है. असहमतियों व राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल के बावजूद विरोधी पार्टियां भाजपा को हराने के लिए एकजुट होती दिख रही हैं. सबसे बड़े सूबे उत्तरप्रदेश में सपा व बसपा साथ आ गयी है और रालोद का मार्जिन वोट भी उसके साथ है. दक्षिण में बीजेपी की सबसे बड़ी सहयोगी चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी उसका साथ छोड़ चुकी है तो पश्चिम में सबसे बड़ी सहयोगी शिवसेना यह कह चुकी है कि वह अगला चुनाव अकेले लड़ सकती है. ऐसे में भाजपा को पूरब में अपने सबसे बड़े सहयोगी नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड से काफी उम्मीदें हैं. नीतीश कुमार जैसे बड़े राजनीतिक चेहरे की गठबंधन में मौजूदगी दूसरे सहयोगियों व संभावित सहयोगियों पर साकारात्मक प्रभाव डालती हैं.


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मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर 26 मई को जब अमित शाह प्रेस कान्फ्रेंस करने मीडिया के सामने आये थे तो उनसे पत्रकारों ने सवाल पूछा कि चंद्रबाबू नायडू जैसे साथी एनडीए छोड़ गये तो इस सवाल पर शाह का जवाब था – अगर चंद्रबाबू नायडू गये हैं तो नीतीश कुमार साथ आये भी हैं. शाह का यह बयान नीतीश की अहमियत को भी इंगित करती है.

अमित शाह की आज नीतीश कुमार के साथ बैठक होने वाली है और यह संभावना है कि इसमें 2019 के सीट शेयरिंग फार्मूले पर चर्चा हो, जिसको लेकर नीतीश कुमार के नेताओं ने बीते दिनों काफी मुखरता दिखायी थी.हालांकिबाद में नीतीश कुमार ने कार्यकारिणी के माध्यम से व फिर जन संवाद के माध्यमइस नरमी का संकेत दिया. उन्होंने जनसंवाद में कहा था: हमारे बीच कोई विवाद नहीं है…सीटों को लेकर आज कोई स्पष्टता ही नहीं है तो क्या कहा जा सकता है? जब बात होगी तो सबके सामने आएगी.

राजनीति में प्रतीकात्मक चीजेंकाफी मायने रखती हैं. चुनाव से एन पहले जिस गठबंधन का पलड़ा भारी लगता है, कई छोटे दल उसकी ओर अंतिम समय में निर्णय लेते हैं. ऐसे में भाजपा के लिए यह जरूरी है कि वह अपने गठजोड़ की इस समय ही मजबूती प्रकट करे. इसको लेकर नीतीश कुमार के जदयू से संबंधों को लेकर स्पष्टता बहुत अहम है.

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तीन दिन पहले चेन्नई के दौरे पर गये अमित शाह ने एनडीए को सहयोगियों को पूरा सम्मान देने व चुनाव से पहले एनडीए का विस्तार होने की बात कही थी. अमित शाह ने तब भले ही तमिलनाडु में गठबंधन सहयोगी बढ़ाने की बात कही थी, लेकिन उनका ऐसा प्रयास राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी है. अमित शाह दिल्ली से बाहर जब संपर्क अभियान पर निकले तो वे सबसे पहले मुंबई उद्धव ठाकरे से मिलने पहुंचे. इस कदम से भी यह समझा जा सकता है कि गठबंधन सहयोगियों को लेकर भाजपा कितनी संजीदा है. इस मुलाकात के बाद शिवेसना के बयानों में थोड़ी नरमी तो आयीहै.

एनडीए में अभी भाजपा के नेतृत्व में कुल 46 पार्टियां शामिल हैं, जिसमें ज्यादातर के पास एक भी सांसद नहीं है. हालांकि ये पार्टियां राज्य व क्षेत्रीय राजनीति में अपना एक आधार रखती हैं और इनका मार्जिन वोट महत्व रखता है. ऐसे में एनडीए में जदयू, शिवसेना, अकाली, लोजपा, अपना दल जैसे प्रमुख क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी और सक्रियता 2019 की राह को अासान करने के लिए बेहद अहम है.

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