दुर्भावना नर्मिूल करें तभी बनेगा समरस समाज : गुरूवानंद

Published at :01 Jan 2016 6:52 PM (IST)
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दुर्भावना नर्मिूल करें तभी बनेगा समरस समाज : गुरूवानंद

दुर्भावना निर्मूल करें तभी बनेगा समरस समाज : गुरूवानंद — इस खबर पर दो सौ कॉपी अखबार बुक है — फोटो – मधेपुरा 08,09कैप्शन – प्रवचन देते संत गुरूवानंद महाराज एवं उपस्थित श्रद्धालु – सदगुरूवेव संत सत्यानंद काग बाबा की जयंती समारोह श्रद्धापूर्व मनायी गयीप्रतिनिधि, मधेपुरासदगुरूदेव संत सत्यानंद काग बाबा की जयंती समारोह मधेपुरा जिला […]

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दुर्भावना निर्मूल करें तभी बनेगा समरस समाज : गुरूवानंद — इस खबर पर दो सौ कॉपी अखबार बुक है — फोटो – मधेपुरा 08,09कैप्शन – प्रवचन देते संत गुरूवानंद महाराज एवं उपस्थित श्रद्धालु – सदगुरूवेव संत सत्यानंद काग बाबा की जयंती समारोह श्रद्धापूर्व मनायी गयीप्रतिनिधि, मधेपुरासदगुरूदेव संत सत्यानंद काग बाबा की जयंती समारोह मधेपुरा जिला अंतर्गत साहुगढ़, दुधराम टोला में शुक्रवार को आयोजित किया गया. इस दौरान शिष्य गुरूवानंद बाबा उनके दर्शन के आलोक में कहा कि मनुष्य की चाह आनंद है. आनंद के लिए तीन प्रकार के सत्संग करना चाहिए. जिस गिविध सत्संग कहते हैं. प्रथम यानि उच्च सत्संग धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने से सत्य का ज्ञान होता है तथा उसके प्रति उत्कंठा बढती है. द्वितीय उच्चतर सत्संग जो साधु संतों की संगति है जिनके वचन एवं ग्रंथों से उत्पन्न शंकाएं मिट जाती है. साथ ही साथ सत्य की और अत्यधिक जिज्ञासा सताने लगती है. तृतीय और उच्चतम सत्संग ध्यान है जो मन के उर्ध्वमुखी बनाता है. जिससे आत्म दर्शन होता है. जहां आनंद ही आनंद है. जिसे मुक्ति भी कहते है. अत: किसी सच्चे गुरू से योग विद्या से प्राप्त ज्ञान का नित्य पति एक निष्ठ भाव से किये गये अभ्यास से आनंद की प्राप्ति होती है. जो जीवन की सार्थकता है. अन्यथा वर्तमान और भावी जीवन कष्टमय हो जायेगा. साधना तथा उपदेश ग्रहण करने तक साथ रहे. संत काग बाबा ने आत्म से ब्रम्हज्ञान प्राप्त ज्ञान की प्रभा से मानव मात्र के समस्त दुखों का सुगमता तथा सहजता से निवृति के लिए चतुष्पाद साधना आत्मनिरीक्षण, आत्मसंयम, आत्मानुवेषण तथा आत्मदर्शन का अनुवेषण किया. उन्होंने मनुष्य को एक परमात्मा और एक धर्म का संदेश दिया. उन्होंने कहा सृष्टि की उत्पति उसी एक परमात्मा से हुई है. धर्म भी उसी परमात्मा के साथ है. इसलिए मानव मात्र के अंदर एक सगुण धर्म की अभिव्यक्ति सत्य, अहिंसा और प्रेम के रूप में हुई है. यही मानव मात्र का धर्म है, जिसे मानवीय धर्म भी कहते है. जिसके ज्ञान से संप्रदायवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, प्रांतवाद, राष्ट्रवाद, उंच नीच छोटा – बड़ा की दूषित दुर्भावना निर्मूल होकर एक समरस समाज की कल्पना साकार हो सकती है और राम राज्य में बदल सकता है. सत्संग को सफल बनाने में अनील, विरेंद्र, दिनेश, विष्णुदेव, उमेश, राम प्रवेश, अर्जुन आदि सत्संग प्रेमियों का सराहनीय सहयोग रहा.

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