कलेक्टर साहब…झारखंड के CM की भी नहीं सुनता आपका दफ्तर? हेमंत सोरेन के आदेश के बाद भी दिव्यांग परेशान

परदेशिया लोहरा की फाइल फोटो
Hemant soren: गुमला जिले के भरनो प्रखंड स्थित अंबाटोली गांव के एक दिव्यांग, परदेशिया लोहरा की कहानी झारखंड के प्रशासनिक ढांचे की संवेदनहीनता को उजागर करती है. मुख्यमंत्री के वरीय आप्त सचिव द्वारा 12 जनवरी 2026 को आवास देने के स्पष्ट निर्देश के बावजूद, परदेशिया आज भी रेंगकर समाहरणालय के चक्कर काटने को मजबूर हैं. हैरानी की बात यह है कि सीएमओ का पत्र उपायुक्त कार्यालय में ही दब गया और ब्लॉक तक नहीं पहुंच सका. देखिए, कैसे एक गरीब दिव्यांग सिस्टम की लापरवाही के कारण अपने संवैधानिक हक से वंचित है.
Hemant soren, गुमला (दुर्जय पासवान की रिपोर्ट): यह खबर प्रशासनिक व्यवस्था का ऐसा चेहरा दिखाता है जो मन को विचलित कर देता है. एक ओर तो झारखंड सरकार ‘जनता के द्वार तक पहुंचने’ का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर गुमला के भरनो प्रखंड के अंबाटोली गांव निवासी परदेशिया लोहरा जैसे लोग आज भी रेंगकर अपना हक मांगने को मजबूर हैं. दोनों पैरों से दिव्यांग परदेशिया मंगलवार को करीब 50 किलोमीटर का लंबा और कष्टदायी सफर तय कर गुमला समाहरणालय पहुंचे. हाथों के सहारे रेंगते हुए जब वे उपायुक्त के जनता दरबार में पहुंचे, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं, लेकिन प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही.
मुख्यमंत्री के निर्देश को भी दिखाया ठेंगा
परदेशिया की बेबसी केवल आवास न मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मामला मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के निर्देशों की अवहेलना का भी है. परदेशिया ने काफी संघर्ष के बाद अपनी फरियाद मुख्यमंत्री तक पहुंचाई थी. इसके बाद मुख्यमंत्री के वरीय आप्त सचिव ने संज्ञान लेते हुए 12 जनवरी 2026 को गुमला उपायुक्त को एक आधिकारिक पत्र भेजा था. इस पत्र में स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि मामले की अविलंब जांच कर नियमानुसार परदेशिया को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ दिया जाए. लेकिन तीन महीने बीत जाने के बाद भी फाइल टस से मस नहीं हुई.
डीसी ऑफिस में दब गई मुख्यमंत्री सचिवालय की फाइल
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री कार्यालय का वह महत्वपूर्ण पत्र गुमला उपायुक्त कार्यालय की फाइलों के बोझ तले दबकर रह गया. वह पत्र न तो आगे प्रोसेस हुआ और न ही संबंधित भरनो ब्लॉक तक पहुंच पाया. सिस्टम की इस लापरवाही का खामियाजा परदेशिया को भुगतना पड़ रहा है, जो अपने शरीर को घसीटते हुए सरकारी दफ्तरों की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं. यह सवाल खड़ा करता है कि अगर मुख्यमंत्री के निर्देशों का यह हश्र है, तो आम जनता की सुनवाई आखिर कैसे होती होगी?
हक की लड़ाई में घिसते हाथ
परदेशिया लोहरा का कहना है कि उन्होंने सालों तक स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ब्लॉक के अधिकारियों के आगे हाथ जोड़े, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई. थक-हारकर उन्होंने रांची का रुख किया और मुख्यमंत्री से गुहार लगाई. अब जब राज्य के सर्वोच्च कार्यालय ने आदेश दे दिया, तब भी प्रशासन की नींद नहीं खुल रही है. परदेशिया सवाल उठाते हैं कि जिस योजना का आधार ही अंत्योदय (सबसे अंतिम व्यक्ति का उदय) है, उसी योजना के लिए एक लाचार दिव्यांग को इतना क्यों तड़पाया जा रहा है? क्या झारखंड का प्रशासन वाकई इतना संवेदनहीन हो चुका है?
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लेखक के बारे में
By Sameer Oraon
इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.
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