नरसंहार की टीस ने दी हिम्मत

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खगडियाः अमौसी दियारा एक बार फिर सुर्खियों में है. दियारा से सटे इचरूआ गांव के लोग आज भी अमौसी नरसंहार को नहीं भूल पाये है. नक्सलियों ने इचरूआ के 16 लोगों को अमौसी दियारा में मौत के घाट उतार दिया था. नरसंहार के बाद किसी भी सामाजिक सरोकार में ग्रामीणों की हिस्सेदारी नहीं के बराबर […]

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खगडियाः अमौसी दियारा एक बार फिर सुर्खियों में है. दियारा से सटे इचरूआ गांव के लोग आज भी अमौसी नरसंहार को नहीं भूल पाये है. नक्सलियों ने इचरूआ के 16 लोगों को अमौसी दियारा में मौत के घाट उतार दिया था. नरसंहार के बाद किसी भी सामाजिक सरोकार में ग्रामीणों की हिस्सेदारी नहीं के बराबर रह गयी थी. क्योंकि नक्सली के धमकी के कारण गांव का 600 परिवार काफी डरे-सहमे हुए थे. कयास लगाया जा रहा था इतने बड़े कांड के बाद इस चुनाव में इचरूआ के ग्रामीण मतदान में दिलचस्पी नहीं दिखायेंगे.

क्योंकि 16 हत्याओं में अब तक किसी भी आरोपी को सजा नहीं मिली है. लेकिन गांव में स्थिति बिल्कुल उलट थी. इचरूआ के ग्रामीणों ने मतदान में गजब का उत्साह दिखाया. यह उत्साह भले ही लोकतंत्र की आस्था को प्रदर्शित करता है, लेकिन इचरू आ के ग्रामीणों के लिए इसके मायने बिल्कुल अलग थे. इचरूआ के ग्रामीण परिवर्तन चाहते हैं. परिवर्तन इसलिए नहीं कि उनके गांव का विकास हो. रोड बने. घर-घर पानी-बिजली हो. बल्कि परिवर्तन इसलिए कि अमौसी नरसंहार में मारे गये गांव के 16 बेटों के हत्यारों को सजा मिले.

31 सितंबर 2009 की रात हुए नरसंहार में गांव का बाइस वर्षीय गौतम सिंह समेत 16 लोगों को को नक्सली ने गोलियों से छलनी कर दिया था. एक भी नहीं बचे थे. गौतम के पिता योगी सिंह इस घटना के बाद पूरी तरह से टूट गये थे. लेकिन इसे लोकतंत्र की ताकत कहिये या न्याय के प्रति ग्रामीणों की जिजीविषा, जो मतदान के दिन सारे गमों को भूल कर इस महापर्व में ग्रामीणों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी निभायी. गांव में दो बूथ बना था. नक्सली इलाका होने के कारण यहां शाम चार बजे तक ही मतदान होना था. सो, दोपहर पौने तीन बजे तक एक बूथ पर 720 और दूसरे बूथ पर 757 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर चुके थे. दोनों बूथों पर वोट देने के लिए मतदान कतार में भी खड़े थे.

मतदान का यह प्रतिशत चौंकाने वाला है. क्योंकि इचरूआ जैसे खगड़िया जिले के सैकड़ों गांवों के मतदाताओं में मतदान को लेकर ऐसा उत्साह बिरले ही दिखा. गौतम के पिता योगी सिंह, भाई पप्पू सिंह कहते हैं कि हमलोगों को परिवर्तन चाहते हैं, ताकि दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले. सरकार ने मुआवजे की भी घोषणा की थी, लेकिन अब तक मुआवजा राशि भी नहीं मिली है. नरसंहार के आरोप में 28 में 14 आरोपी बरी हो चुके हैं. बाकी बचे जिन 14 आरोपियों को निचली अदालत से फांसी की सजा मिली थी, वे भी बरी हो चुके हैं. मामला अब सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

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