ईरान के सर्वोच्च नेता का दावा: समझौते के लिए बेताब थे ट्रंप, लगाया हर तरह का दबाव

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डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई (गोल घेरे में)

अमेरिका-ईरान डील पर पहली बार रिएक्शन देते हुए ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने कहा कि उन्होंने इस समझौते को मंजूरी दी है. उन्होंने बताया कि ईरानी अधिकारियों ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि देश के हितों और ‘रेजिस्टेंस फ्रंट’ के अधिकारों की पूरी तरह रक्षा की जाएगी, तभी उन्होंने इसकी अनुमति दी.

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अमेरिका और ईरान के बीच समझौता होने के एक दिन बाद ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि ट्रंप इस समझौते को लेकर बहुत ही बेताब नजर आ रहे थे. इस डील को कराने के लिए उन्होंने हर तरह का दबाव और प्रभाव इस्तेमाल किया. मोजतबा खामेनेई ने कहा कि शुरुआत में उन्होंने सिद्धांत के तौर पर इस समझौते का विरोध किया था. हालांकि बाद में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सदस्यों ने उन्हें भरोसा दिलाया कि देश के हितों को पूरी तरह से ध्यान में रखा जाएगा.

खामेनेई ने कहा कि ईरानी अधिकारियों ने नेक इरादे और देश की चिंता को ध्यान में रखते हुए इस समझौते के लिए काफी मेहनत की. 18 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन कई महीनों से जारी तनाव को खत्म करने के लिए आगे बढ़े. दोनों ने बातचीत का रास्ता खोलने के उद्देश्य से एक समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर किए. इससे पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी वार्ताकार मोहम्मद बाकेर कालीबाफ ने दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके बाद दोनों नेताओं ने इसे वर्चुअल तरीके से मंजूरी दी.

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ईरान अपने राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं करेगा

खामेनेई के इस लिखित बयान से समझौते को लेकर ईरान के भीतर हुई चर्चाओं की झलक भी मिली. उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि अगर भविष्य में अमेरिका की ओर से कोई ऐसी मांग रखी जाती है जो ईरान के हितों के खिलाफ या जरूरत से ज्यादा हो, तो तेहरान उसे स्वीकार नहीं करेगा. उन्होंने कहा कि पेजेशकियन ने स्पष्ट किया था कि तेहरान अपने राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं करेगा.

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समझौते का समर्थन करते हुए भी मोजतबा खामेनेई ने साफ किया कि भविष्य में अमेरिका के साथ आमने-सामने होने वाली बातचीत को अमेरिकी रुख की स्वीकृति नहीं माना जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि बातचीत का मतलब यह नहीं है कि ईरान अमेरिका की बातों से सहमत है. उनके मुताबिक, बातचीत केवल अपने हितों की रक्षा और मुद्दों के समाधान के लिए होगी, न कि किसी दबाव के आगे झुकने के लिए. 

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