कटिहार : कहीं शिक्षक नहीं, तो कहीं झोंपड़ी में पढ़ाई

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 09 May 2018 6:40 AM

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कटिहार : जिले में राज्य सरकार के तमाम दावों के बावजूद शैक्षणिक व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हो रहा है. प्रारंभिक से लेकर माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह बदहाल है. जिले के अधिकांश माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों सहित आधारभूत संरचना का घोर अभाव है. दूसरी तरफ प्रारंभिक विद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का […]

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कटिहार : जिले में राज्य सरकार के तमाम दावों के बावजूद शैक्षणिक व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हो रहा है. प्रारंभिक से लेकर माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह बदहाल है. जिले के अधिकांश माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों सहित आधारभूत संरचना का घोर अभाव है. दूसरी तरफ प्रारंभिक विद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का दावा खोखला साबित हो रहा है. प्रारंभिक विद्यालयों में शैक्षणिक सत्र के एक महीना बीतने के बाद भी बच्चों को पाठ्यपुस्तक नसीब नहीं हुआ है.
प्रारंभिक विद्यालयों में बच्चों को मिलने वाली दोपहर का भोजन यानी एमडीएम की स्थिति भी ठीक नहीं है. सरकार की घोषणा के बावजूद अब तक बच्चों को एमडीएम में मौसमी फल नहीं दिया जा रहा है. जिले में करीब 290 से अधिक प्राथमिक विद्यालय झोपड़ी में चल रहे हैं. कई ऐसे विद्यालय है. जमीन होने के बावजूद अब तक भवन निर्माण नहीं हो सका है. शिक्षा अधिकार कानून लागू होने के बाद भी प्रारंभिक विद्यालयों की स्थिति कानून का उल्लंघन के साथ-साथ सरकार के दावों पर भी सवाल खड़ा करती है. माध्यमिक व उच्च माध्यमिक विद्यालयों में तो विज्ञान के शिक्षक का घोर अभाव है. जानकार बताते हैं कि अप्रैल 2010 में शिक्षा अधिकार कानून लागू की गयी.उसके बाद भी आरटीई के प्रावधानों के अनुरूप छात्र छात्राओं को सुविधा नहीं मिल रही है. यद्यपि शिक्षा अधिकार कानून लागू होने के बाद लोगों के बीच यह उम्मीद थी कि शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक सुधार होगा. पर स्थिति जस की तस बनी हुई है. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के दावों की हवा निकल रही है. शिक्षक एवं पाठ्यपुस्तक नहीं होने से गरीब एवं मजदूर वर्ग के बच्चे की शिक्षा अधिक प्रभावित होती है.
पढ़ाई के नाम पर हो रही खानापूर्ति
पूर्व से स्थापित माध्यमिक व उच्च माध्यमिक विद्यालयों में विषयवार शिक्षकों का घोर अभाव है. जिले के माध्यमिक व उच्च माध्यमिक 58 विद्यालय की यही स्थिति है. शिक्षकों की कमी होने की वजह से छात्र-छात्राओं को पढ़ाई में काफी परेशानी झेलनी पड़ती है. अधिकांश छात्र छात्राएं तो नामांकन कराने के बाद कोचिंग की ओर रुख कर जाते है. सबसे ज्यादा प्रभावित गरीब एवं मजदूर वर्ग के बच्चे होते हैं. गरीब व मजदूर वर्ग के बच्चे कोचिंग व ट्यूशन नहीं कर पाते है. इन विद्यालयों के प्रयोगशाला की स्थिति भी बदतर है.
अधिकतर स्कूलों के पास अपना भवन नहीं
शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे करीब 290 से अधिक प्राथमिक विद्यालय है. जिनके पास अपना कोई भवन नहीं है. ऐसे विद्यालय या तो किसी हवा महल में चल रहा है. ये फिर झोपड़ी में संचालित किया जा रहा है. भगवान भरोसे ही ऐसे बच्चों को शिक्षा है. इन विद्यालयों में अधिकांश बच्चे गरीब मजदूर वर्ग के ही पढ़ते है. शिक्षा अधिकार कानून लागू होने के बाद भी इतने बड़े तादाद में विद्यालय को अपना भवन नहीं होना कानून का उल्लंघन है. बाढ़ व बारिश के समय बच्चों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है. ऐसे विद्यालय को भवन उपलब्ध कराने के लिये सरकार के पास कोई स्पष्ट नीति भी नहीं है.
जिले के 60 उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालयों में एक भी शिक्षक नहीं
उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय द्वाशय में 9वी व 10वी में करीब 400 छात्र-छात्राएं नामांकित है. इसके लिए यहां मात्र एक शिक्षक अभी हाल ही में पदस्थापित किये गये हैं. उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय नेपड़ा में करीब 350 छात्र छात्राएं नामांकित हैं. यहां एक भी शिक्षक पदस्थापित नहीं है. जिले में ऐसे 108 उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय हैं. इन विद्यालयों में कुल 105 शिक्षक पदस्थापित हैं. ऐसे विद्यालयों में से करीब 60 विद्यालय में एक भी शिक्षक नहीं हैं. इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय में बच्चे को किस तरह की शिक्षा दी जा रही होगी.
बच्चों को एमडीएम में नहीं मिलता मौसमी फल
मध्याह्न भोजन योजना के तहत करीब डेढ़ वर्ष पूर्व सरकार ने बच्चों को दोपहर में उपलब्ध कराने वाले मिड डे मील में मौसमी फल देने का निर्देश दिया था. पर जिले के अधिकांश विद्यालयों में बच्चों को मिड डे मील में मौसमी फल उपलब्ध नहीं कराया जाता है. मिडिल में डे मील के तहत छात्र छात्राओं को मौसमी फल उपलब्ध कराने संबंधित आदेश जारी होने के बाद संशोधित मीनू भी जारी की गयी. साल भर बाद छात्र-छात्राओं को मीनू के अनुसार भोजन नहीं मिलता है. हालांकि अभी सप्ताह में एक दिन अंडा दिया जा रहा है. पर सभी विद्यालयों में सही से इसका अनुपालन नहीं हो रहा है.
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