गया : अतिक्रमण से घुट रहा पहाड़ों व फल्गु नदी का दम
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 10 Feb 2019 9:46 AM
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नीरज कुमार गया : गयाजी को विश्व स्तर पर मोक्षधाम के रूप में जाना जाता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाले पितृपक्ष मेले व बुद्ध की ज्ञानस्थली होने से भी इस शहर की पहचान है. अंतःसलिला फल्गु नदी व चारों ओर स्थित पहाड़ों ने भी गयाजी को विश्व स्तर पर पहचान दिलायी है. लेकिन, […]
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नीरज कुमार
गया : गयाजी को विश्व स्तर पर मोक्षधाम के रूप में जाना जाता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाले पितृपक्ष मेले व बुद्ध की ज्ञानस्थली होने से भी इस शहर की पहचान है. अंतःसलिला फल्गु नदी व चारों ओर स्थित पहाड़ों ने भी गयाजी को विश्व स्तर पर पहचान दिलायी है.
लेकिन, कुछ लोगों के निजी स्वार्थ व प्रशासनिक उदासीनता के कारण धीरे-धीरे इस शहर की पहचान पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. पहाड़ों पर अतिक्रमण कर सैकड़ों घर बना लिये गये हैं, जो इसके आकर्षण व सुंदरता को धूमिल कर रहे हैं. इसी तरह अंतःसलिला फल्गु नदी के पूर्वी व पश्चिमी तट पर भी अतिक्रमणकारियों ने सैकड़ों घर बना लिये हैं. इन घरों से निकलनेवाले कचरे से नदी प्रदूषित हो रही है.
बढ़ रहा पर्यावरण प्रदूषण का खतरा पहाड़ों व नदियों पर बने घरों से निकलने वाले प्रदूषित, बदबूदार व रसायनयुक्त पानी नदी व पहाड़ों में जाकर उसकी शुद्धता को खत्म कर रहा है. शहर में बढ़ते मच्छर के प्रकोप से बचने के लिए प्रायः सभी घरों के लोग कीटनाशक का इस्तेमाल करते हैं, जो किसी न किसी रूप में नाली के पानी के साथ बाहर निकल जाता है. पानी में मिल कर निकलने वाले इन विषाक्त रसायनों से फल्गु नदी के साथ-साथ पहाड़ों को भी नुकसान पहुंच रहा है.
स्वस्थ जीवन के लिए स्वच्छ पर्यावरण का होना जरूरी: औषधि विभाग के विशेषज्ञ डॉ प्रांशु कुमार बताते हैं कि पर्यावरण के असंतुलित होने से लोगों में सांस, एलर्जी, दमा, हफनी जैसी कई गंभीर बीमारियों के होने का खतरा बढ़ जाता है.
यदि पर्यावरण का संतुलन इसी तरह बिगड़ता रहा, तो ये बीमारियां लोगों के लिए जानलेवा भी साबित हो सकती हैं. उन्होंने बताया कि स्वस्थ जीवन के लिए स्वच्छ पर्यावरण का होना जरूरी है. हरियाली से ही स्वच्छ पर्यावरण को बरकरार रखा जा सकता है.
गया खनन विभाग के सहायक निदेशक कमल किशोर शरण ने कहा कि : जिन पहाड़ों का विभागीय स्तर पर बंदोबस्त किया जाता है, उसकी सुरक्षा की जवाबदेही खनन विभाग की होती है. यह विभाग मूलतः राजस्व प्राप्ति के लिए बनाया गया है.
नदी की खुदाई के सवाल पर बताया गया कि 10 फुट से ज्यादा गहरा कर बालू का उठाव करना गैरकानूनी है. जानकारी मिलने पर जांच कर दोषियों के विरुद्ध विभागीय व कानूनी कार्रवाई की जाती है. अतिक्रमण से इस विभाग का कोई लेना देना नहीं है.
पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के हेड आशीष कुमार गुप्ता ने कहा कि : बिना जानकारी व सुरक्षा के पहाड़ों को नुकसान पहुंचाना जानलेवा साबित हो सकता है, क्योंकि पत्थर तोड़ने के दौरान उससे निकलने वाले धूलकण सांस के जरिये मनुष्य के फेफड़े में प्रवेश कर जाते हैं, जो गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं.
सही जानकारी के अभाव में पत्थरों को तोड़ना जानलेवा बन सकता है. दूसरी तरफ अवैध रूप से पहाड़ों को नुकसान पहुंचाना पर्यावरण को प्रभावित करना है. पत्थरों को तोड़ने से पहले माइनिंग विभाग से स्वीकृति लेना जरूरी है. अवैध रूप से पहाड़ों को नुकसान पहुंचाने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है. पहाड़ों, वृक्षों व नदी की सुरक्षा व संरक्षण की जवाबदेही जिला प्रशासन की है. सूचना मिलने पर पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड भी जिला प्रशासन को ही जानकारी देता है.
खत्म होते जा रहे मौसमी पौधे भी
पहाड़ों पर अतिक्रमण से मौसमी पौधों को भी नुकसान पहुंच रहा है. पहाड़ों पर विशेषकर बरसात में स्वत: पौधे उगते हैं, जो काफी दिनों तक हरियाली बनायी रखते हैं. लेकिन, पहाड़ों पर घर बनाये जाने से इस हरियाली को भी नुकसान पहुंच रहा है.
पर्यावरणविदों की मानें, तो हरियाली का सीधा संबंध पर्यावरण से होता है. पहाड़ों पर लगे पौधों को हटाये जाने से शहर का पर्यावरण प्रभावित हो रहा है. पर्यावरण के असंतुलित होने से शहर के लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है. पर्यावरण के असंतुलित होने से लोगों में बीमारियों के होने का खतरा बढ़ जाता है.
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