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What is Santhara: तीन साल की बच्ची की स्वैच्छिक मृत्यु, जानें कैसे मिली संथारा की अनुमति

Updated at : 06 May 2025 1:46 PM (IST)
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What is Santhara: तीन साल की बच्ची की स्वैच्छिक मृत्यु, जानें कैसे मिली संथारा की अनुमति

What is Santhara: क्या किसी को स्वैच्छिक मृत्यु चुनने का अधिकार है? आमतौर पर बीमारी, परेशानी से ग्रस्त होकर लोग स्वैच्छिक मृत्यु की मांग राष्ट्रपति से करते हैं, लेकिन ये अनुमति मिलती नहीं है. लेकिन तीन साल की बच्ची को स्वैच्छिक मृत्यु की अनुमति दी गई. यही नहीं उसका नाम गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में भी दर्ज किया गया है. जानते हैं कैसे संभव हुआ ये...

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What is Santhara: मध्‍य प्रदेश के इंदौर में एक तीन साल की बच्ची को ब्रेन ट्यूमर था. माता-पिता ने उसका इलाज कराया. डॉक्टरों की सलाह पर ब्रेन की सर्जरी करायी. इससे बच्ची की सेहत में कुछ सुधार तो हुआ, लेकिन अचानक उसकी तबियत फिर बिगड़ गई. डॉक्टरों के पास दौड़ लगायी. इसके बावजूद बच्ची को स्वास्थ्य लाभ नहीं हुआ. ऐसे में माता-पिता अध्यात्म की शरण में गए. उनके धर्म गुरु ने स्वैच्छिक मृत्यु के माध्यम से बच्ची को इस कष्ट से निजात दिलाने का रास्ता बताया. इसके बाद माता-पिता ने धर्म गुरु की सलाह पर बच्ची का उपवास कराया और उसे स्वैच्छिक मृत्यु देकर दर्दनाक बीमारी से मुक्ति दिला दी.

गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज

पढ़ने में ये सब भले ही अजीब लगे, लेकिन ऐसा संभव हुआ है. जिस माध्यम से बच्ची को स्वैच्छिक मृत्यु दी गई, उसे ‘संथारा’ कहते हैं. जो कि जैन धर्म में स्वेच्छा से शरीर त्यागने का एक संस्कार है. बच्ची और उसके माता-पिता जैन धर्म से आते हैं, इसलिए उन्हें संथारा चुनने का अधिकार मिला. यही नहीं सबसे कम उम्र में संथारा लेने वाली बच्ची के रूप में उसका नाम गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज भी किया गया है.

क्या है संथारा?

आइए जानते हैं कि ‘संथारा’ क्या है! यह जैन धर्म में स्‍वैच्छिक मृत्‍यु तक उपवास की प्रथा है. इसे ‘सल्लेखाना’ के नाम से भी जाना जाता है. जिसमें व्यक्ति स्वेच्छा से उपवास के माध्यम से अपना जीवन समाप्त करने का रास्ता चुनता है. इस प्रथा में धीरे-धीरे भोजन और पानी से परहेज किया जाता है. जैन धर्म में लोग इसे आत्मा को शुद्ध करने और मुक्ति प्राप्त करने के तरीके के रूप में अपनाते हैं. बताया जाता है कि जैन धर्मग्रंथों में स्पष्ट रूप से जानकारी दी गई है कि संथारा केवल उसी समय लिया जाना चाहिए, जब मृत्यु करीब हो या कोई व्यक्ति वृद्धावस्था, लाइलाज बीमारी या अकाल की स्थितियों में धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो.

संथारा का कैसे पालन किया जाता है ?

संथारा व्रत लेने वाले किसी भी व्यक्ति को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना होता है. अपनी सारी संपत्ति त्यागकर मानसिक रूप से परिवार से अलग हो जाना होता है. सभी को माफ करना होता है. साथ ही अपने गलत कामों के लिए माफी मांगनी होती है. शांत मन से ध्यान केंद्रित करना चाहिए. इसके बाद धीरे-धीरे खाना-पीना बंद कर देना चाहिए. ये उपवास मृत्यु तक जारी रहता है.

कानूनी रूप से कितना सही

जैन धर्म में संथारा को एक प्रथा के रूप में स्थान दिया गया है. लेकिन वर्ष 2015 में राजस्थान हाईकोर्ट ने संथारा को अवैध बताते, इसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 306 के तहत आत्महत्या के बराबर माने जाने की बात कही थी. कोर्ट का कहना था कि किसी के जीवन को समाप्त करने का स्वैच्छिक निर्णय धार्मिक प्रथा के रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता है. जैन समुदाय के विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी. धार्मिक स्वतंत्रता संरक्षण के तहत संथारा को जारी रखने की अनुमति दी गई थी. तीन साल की बच्ची के मामले में 21 मार्च 2025 को जैन भिक्षु राजेश मुनि महाराज के दर्शन के बाद माता-पिता पियूष जैन और वर्षा जैन की सहमति से बच्ची वियाना को संथारा व्रत दिलाया गया था. गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में स्थान मिलने के बाद ये मामला चर्चा में आया.

10 मिनट में हो गई मृत्यु

पियूष जैन और वर्षा जैन अध्यात्मिक गुरु राजेश मुनि महाराज के पास गए थे. जो कि 107 संथारा का संचालन कर चुके हैं. उन्होंने बच्ची वियाना की हालत को देखते हुए संथारा की प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी. 30 मिनट के धार्मिक संस्कारों के दौरान ही वियाना की मौत हो गई.

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Amit Yadav

लेखक के बारे में

By Amit Yadav

UP Head (Asst. Editor)

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