बंगाल की राजनीति में संक्रमण काल, ममता के सामने कुनबे को जोड़कर रखने की चुनौती, क्या होगा भविष्य?
Published by : Rajneesh Anand Updated At : 04 Jun 2026 6:00 PM
ममता बनर्जी
Mamata Banerjee TMC : बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में बवाल मचा हुआ है. बगावत के सुर इतने ऊंचे हैं कि ममता बनर्जी जैसी योद्धा राजनेता भी कमजोर नजर आ रही हैं. उनके सामने पार्टी को जोड़कर रखने की चुनौती है, क्योंकि उनकी लड़ाई बीजेपी से नहीं, अपने लोगों से हो रही है.
Mamata Banerjee TMC : टीएमसी में फूट पर पश्चिम बंगाल के कैबिनेट मंत्री दिलीप घोष ने कहा कि हमने पहले भी कहा था कि जिस दिन टीएमसी चुनाव में हारेगी, पार्टी खत्म हो जाएगी. यह पार्टी सिर्फ करप्शन पर बनी है. पार्टी में अभी जो कुछ हो रहा है वह तो होना ही था. हमारे पास बहुत सारे एप्लीकेशन आ रहे हैं, लेकिन हमारे दरवाजे बंद हैं. हमें पता था कि ऐसा होने वाला है, इसलिए हमने दरवाजे कसकर बंद कर दिए हैं. देखते हैं आगे क्या होता है. बीजेपी के नेता का यह बयान काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके इस बयान में टीएमसी का भविष्य तो नजर आ ही रहा है, साथ ही बंगाल की राजनीति किस ओर जाएगी यह भी दिख रहा है.
संकट का सामना कर रही हैं ममता बनर्जी और टीएमसी
अमूमन जैसा होता है, बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी दोनों ही बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही हैं. पार्टी के अंदर बगावत के सुर तेज होते जा रहे हैं. दो मेयर अभी तक पद छोड़ चुके हैं और पार्टी के अंदर यह बात तेज हो गई है कि वे उन्हें अभिषेक बनर्जी की लीडरशिप मंजूर नहीं है. पार्टी में ममता बनर्जी की लीडरशिप पर तो सवाल नहीं उठ रहे हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी को पसंद नहीं किया जा रहा है.
कहां से हुई संकट की शुरुआत
विधानसभा चुनाव में हार के बाद टीएमसी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है. पार्टी को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब 58 विधायकों के एक समूह ने ऋतब्रता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. बागी गुट ने अपने नेता को विपक्ष का नेता बनाने की अपील की जिसे विधानसभा अध्यक्ष ने मंजूर भी कर लिया है और इस गुट को मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में मान्यता भी दे दी है. गौर करने वाली बात यह है कि इस गुट ने खुद को टीएमसी ही बताया है, लेकिन यह गुट मौजूदा नेतृत्व के खिलाफ खड़ा है. उनका आरोप है कि पार्टी के अंदर लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं कमजोर हो गई हैं और कुछ लोग अपनी मनमानी कर रहे हैं.
ममता बनर्जी के प्रति सम्मान अभिषेक पर निशाना
बागी विधायकों का यह कहना है कि ममता बनर्जी अब भी उनकी नेता है, लेकिन वे पार्टी में अभिषेक बनर्जी की भूमिका को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं. उनका यह मानना है कि पार्टी के पूरे संगठनात्मक व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है. बागी गुट ममता बनर्जी को अब मार्गदर्शक की भूमिका में देखना चाहता है. दरअसल यह पार्टी के भीतर चल रहे नेतृत्व और उत्तराधिकार की जंग है, क्योंकि अभिषेक बनर्जी ममता दीदी के उत्तराधिकारी बनना चाहते हैं और ऋतब्रता बनर्जी जैसे लोगों को यह स्वीकार्य नहीं है.
फिरहाद हकीम और कृष्ण चक्रवर्ती का इस्तीफा
कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम टीएमसी के सबसे प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं और ममता बनर्जी के भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाते हैं. उनके इस्तीफे के बाद यह चर्चा आम हो गई है कि पार्टी के शीर्ष पदों पर भी एका नहीं है और उनके बीच विवाद है. इस स्थिति ने पार्टी के भीतर अस्थिरता की भावना को और बढ़ा दिया है. फिरहाद हकीम के बाद बिधाननगर नगर निगम की मेयर कृष्णा चक्रवर्ती ने भी इस्तीफा देने की घोषणा कर दी. इस इस्तीफों ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी संक्रमण काल से गुजर रही है और बड़ा बदलाव जल्द नजर आएगा.
बंगाल में आगे क्या होगा?
बंगाल में और टीएमसी की राजनीति में जो कुछ चल रहा है, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि पार्टी में बड़ा बदलाव होगा. सत्ता से बाहर होने के बाद ममता बनर्जी के सामने यह चुनौती सबसे बड़ी है कि वे अपनी पार्टी को एकजुट रखें. बीजेपी के लिए यह अवसर है क्योंकि विपक्ष आपस में उलझा रहेगा तो उसे रोकने वाला कोई नहीं होगा. इसी वजह से वह वेट एंट वाॅच की मुद्रा में है और एक तरह से मजे ले रही है, लेकिन ममता बनर्जी के लिए यह संक्रमण काल बड़ी चुनौतियां लेकर आया है.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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