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क्या सादे लिबास में पुलिस कर सकती है लाठीचार्ज? जानिए क्या कहता है भारत का कानून

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फाइल फोटो

प्रदर्शन के दौरान युवक पर लाठी चलाता पुलिसकर्मी (फाइल फोटो )

CJP के संसद मार्च के दौरान वायरल वीडियो में कुछ लोग सादे कपड़ों में और कुछ पुलिसकर्मी बिना नेमप्लेट के प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई करते नजर आए. इसके बाद सवाल उठा कि क्या पुलिस अपनी पहचान छिपाकर बल प्रयोग कर सकती है?

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कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा जंतर-मंतर से संसद मार्च के दौरान वायरल हुए, कुछ वीडियो ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है. इसको लेकर सोशल मीडिया पर सवाल किया जा रहा कि क्या पुलिस इस तरह के आंदोलन के दौरान अपनी पहचान छिपाकर कार्रवाई कर सकती है? क्या भारतीय कानून पुलिसकर्मियों को बिना नेमप्लेट या सादे कपड़ों में बल प्रयोग करने की अनुमति देता है? इस लेख में हम इसकी पड़ताल करेंगे और समझेंगे कि इस मामले में कानून और अदालतों के निर्देश क्या कहते हैं.

क्या है मामला

दरअसल, 20 जुलाई को NEET पेपर लीक और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर CJP ने संसद मार्च निकाला था. इस आंदोलन में हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च कर रहे थे. इस मार्च को लेकर पुलिस का कहना था कि इस तरह के किसी भी प्रदर्शन की अनुमति न तो मांगी गई है और ना ही दी गई. इसी दिन संसद का मॉनसून सत्र भी शुरू हो रहा था. इसलिए इलाके में सुरक्षा व्यवस्था को और सख्त रखने के लिए पुलिस ने धारा 163( पहले 144) लागू किया था. हालांकि इन सभी को अनदेखा करते हुए प्रदर्शनकारी संसद की तरफ मार्च कर रहे थे. जिन्हें रोकने के लिए पुलिस ने बल का प्रयोग किया. जिस दौरान दोनों पक्षों में झड़प हो गई. लाठीचार्ज हुआ और कई लोग घायल भी हुए.

क्यों हो रहा विवाद

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो समाने आए, जिनमें कुछ लोग सादे कपड़ों में लाठी लेकर प्रदर्शनकारियों को हटाते दिख रहे हैं. वो प्रदर्शनकारियों  पर लाठी भी चला रहे हैं. इन वीडियो को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी ने आरोप लगाते हुए दिल्ली पुलिस पूछा कि छात्रों और युवाओं के आंदोलन में ये लोग कौन थे और क्या ये पुलिस द्वारा की जाने वाली कार्रवाई में शामिल थे? कुछ वीडियो में पुलिसकर्मी बिना नेमप्लेट के भी दिखाई दिए. जिसको लेकर भी लोगों ने पुलिस की जवाबदेही पर सवाल उठाए. वायरल हो रहे कई वीडियो में प्रदर्शनकारी खुद, उनकी पहचान और नेमप्लेट को लेकर उनसे सवाल पूछते दिखाई दे रहे हैं.

पहचान को लेकर क्या कहता है भारत का कानून ?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अध्याय 11 (धारा 148 से 160) में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को अधिकार दिए गए हैं. हालांकि इन धाराओं में यह साफ नहीं किया गया है कि इस दौरान पुलिसकर्मियों या सुरक्षा बलों को अपनी पहचान दिखाना अनिवार्य है या नहीं.

इस मामले को लेकर कानून के जानकारों का कहना है कि कानून केवल मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी को ही भीड़ हटाने का अधिकार देता है. जिसका मतलब हुआ कि मजिस्ट्रेट या पुलिस की पहचान स्पष्ट होना जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि ऐसा कौन कर रहा है. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी पहचान में न आए, तो भीड़ को तितर-बितर करने के लिए वो कानून के आदेश का पालन कर रहा है यह प्रभावी कैसे माना जाएगा?

सुप्रीम कोर्ट का रुख क्या है

1997 में डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल सरकार मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर कई महत्वपूर्ण दिशा निर्देश जारी किए थे. इस दौरान कोर्ट ने कहा था कि गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी की पहचान स्पष्ट और दिखाई देने वाली होनी चाहिए. हालांकि, डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य वाला मामला गिरफ्तारी से जुड़ा था. वहीं एक दूसरे मामले आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के विधायक नल्लापुरेड्डी प्रसन्न कुमार रेड्डी की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सवाल उठाया था कि यदि पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में हों तो आम नागरिक उन्हें पुलिस अधिकारी के रूप में कैसे पहचानेंगे? रेड्डी पर ड्यूटी कर रहे पुलिस अधिकारी के काम में बाधा डालने का आरोप था. रेड्डी ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि संबंधित पुलिसकर्मी वर्दी में नहीं था, इसलिए वो उसे पहचान नहीं सके. हालांकि दोनों मामले गिरफ्तारी और पुलिस की पहचान से जुड़े थे, न कि भीड़ नियंत्रण या लाठीचार्ज के दौरान पहचान छिपाने के सवाल से,  इसलिए इन्हें सीधे इस मामले पर लागू नहीं माना जा सकता, लेकिन इसको लेकर कई कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि पुलिस की पहचान महत्वपूर्ण है.

पुलिस क्यों छुपाती है अपनी पहचान ?

अब सवाल है कि आखिर पुलिस अपनी पहचान क्यों छुपाती है. जिसको लेकर कई पुलिस अधिकारी तर्क देते है कि कई कई बार नेमप्लेट या पहचान सार्वजनिक होने से उन्हें और उनके परिवार को खतरा हो सकता है. पहचान सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होने पर उन्हें लंबे समय तक कानूनी मुकदमों, सोशल मीडिया पर उत्पीड़न और यहां तक कि उनके परिवारों को भी धमकियों का सामना करना पड़ता है.

मीडिया रिपोर्ट की मानें तो पुलिसकर्मी द्वारा पहचान छिपाने की प्रथा पहले जम्मू-कश्मीर, पंजाब और छत्तीसगढ़ जैसे उग्रवाद प्रभावित इलाकों में शुरू हुई थी. वहां पुलिसकर्मी और सुरक्षा बल अक्सर अपनी नेमप्लेट या रैंक इसलिए नहीं दिखाते थे, ताकि आतंकवादी उन्हें आसानी से निशाना न बना सकें. फिलहाल तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या संसद मार्च के दौरान सादे कपड़ों में दिख रहे लोग पुलिस या किसी अन्य सुरक्षा एजेंसी के सदस्य थे और उनकी तैनाती नियमों के अनुरूप थी ? हालांकि दिल्ली पुलिस की ओर से वायरल वीडियो और इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. ऐसे में यह विवाद पुलिस की जवाबदेही, पारदर्शिता और कानून के पालन को लेकर बहस का विषय बना हुआ है.

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गौतम कुमार

लेखक के बारे में

By गौतम कुमार

दैनिक भास्कर से शुरू हुआ ये कारवां अब प्रभात खबर तक आ पहुंचा है. पढ़ाई और पत्रकारिता की बारीकियां सीखने का सफर अभी जारी है, किताबों से भी सीख रहा हूं, लोगों से भी और खबरें तो है हीं..

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