कश्मीर को लेकर क्यों कम नहीं हो रहा पाकिस्तान का लालच, ये है असली वजह

पाकिस्तान ने अपनी गलतियों से कभी सबक नहीं लिया
Pakistan and Kashmir : पाकिस्तान ने अपनी गलतियों से कभी सबक नहीं लिया, अगर वह अपनी गलतियों से सबक लेता, तो वह इतना बदहाल और बेबस ना होता. पाकिस्तान ने अपने पड़ोसी मुल्क भारत से हमेशा बैर किया, जबकि पाकिस्तानियों के रग में हिंदुस्तान का ही खून दौड़ता है. उनकी सभ्यता-संस्कृति सबकुछ भारत की ही देन है. धर्म के नाम पर देश के दो टुकड़े करने वाला पाकिस्तान अगर यह समझ गया होता कि उसने बंटवारा करके बहुत बड़ी गलती की है, तो वह भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाता, लेकिन उसने भारत की ओर बम और गोले फेंके. भारत के अभिन्न अंग कश्मीर पर नजर गड़ाकर वह हमेशा मुंह की खाता रहा है, फिर भी कश्मीर को लेकर उसकी जो वासना है वह कम होने का नाम ही नहीं लेती है.
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Pakistan and Kashmir : पाकिस्तान एक ऐसा देश है, जिसकी गिद्ध दृष्टि कश्मीर पर हमेशा लगी रहती है. उसकी कोशिश यह रहती है कि वह किसी तरह कश्मीर पर अपना हक जमा ले. अपनी इस नापाक कोशिश में पाकिस्तान कई बार मुंह की खा चुका है, लेकिन पाकिस्तान की निर्लज्जता जाती नहीं और वह लगातार इस कोशिश में रहता है कि वह किसी तरह कश्मीर में अपनी घुसपैठ कर ले. बंटवारे के बाद से अबतक पाकिस्तान ने कश्मीर को लेकर भारत के साथ कई युद्ध किए हैं और जब उसे युद्ध में सफलता नहीं मिली तो उसने आतंकवाद को बढ़ावा देकर कश्मीर को अशांत किया है.
बंटवारे के वक्त क्या थी कश्मीर की स्थिति
बंटवारे के वक्त अंग्रेजों ने देसी रियासतों को यह स्वतंत्रता दी थी कि वे अपनी इच्छा से भारत या पाकिस्तान में शामिल हो सकते हैं या फिर स्वतंत्र भी रह सकते हैं. जिन देसी रियासतों ने भारत और पाकिस्तान के साथ जाने के लिए सहमति दी उन्हें एक दस्तावेज साइन करना था जिसे नाम दिया गया था इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन (Instrument of Accession). आजादी के वक्त भारत में कुल 565 रियासतें थीं, जिनमें से एक जम्मू-कश्मीर भी था. इन 565 रियासतों में अधिकतर ने भारत के साथ जाना स्वीकार किया, जबकि सात रियासतें पाकिस्तान के साथ गईं. उस वक्त जम्मू-कश्मीर ने इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन यानी किसी भी देश के साथ विलय के दस्तावेज पर साइन नहीं किया था, जिसकी वजह से वह स्वतंत्र था.
मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग के आधार पर बना था पाकिस्तान

भारत का विभाजन इस सिद्धांत पर हुआ था कि हिंदू और मुसलमान एक देश में साथ नहीं रह सकते हैं. मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने इस बात को सबसे अधिक स्थापित करने की कोशिश की और अलग पाकिस्तान की मांग की. जिन्ना की जिद की वजह से ही देश के दो टुकड़े हुए और देश के जिन इलाकों में मुसलमानों की संख्या ज्यादा थी उसे पाकिस्तान बनाया गया. ब्रिटिश भारत में भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन की रेखा लॉर्ड रेडक्लिफ ने खिंची थी, उन्हें इंग्लैंड से इसी काम के लिए भारत बुलाया गया था. उन्हें भारत के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था, इसलिए एक देश को दो टुकड़ों में बांटना उनके लिए बहुत कठिन काम था.लॉर्ड रेडक्लिफ ने दोनों देशों के बीच जो सीमा रेखा खिंची उसी को बाद में दोनों देश के बीच विभाजन रेखा मान लिया गया था. उस भारत के पूर्वी और पश्चिमी दोनों ही तरफ पाकिस्तान था, जिसे नाम दिया गया था पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिम पाकिस्तान. पाकिस्तान के इन दो हिस्सों में मुसलमानों की जनसंख्या ज्यादा थी.
पाकिस्तान की कश्मीर पर क्यों थी नजर
आजादी के वक्त कश्मीर ने स्वतंत्र रहना स्वीकार किया था, लेकिन पाकिस्तान यह चाहता था कि कश्मीर उसमें शामिल हो जाए क्योंकि जम्मू-कश्मीर की बहुसंख्यक आबादी मुसलमान थी. इसी वजह से जिन्ना ने अपनी बुरी नजर पाकिस्तान पर लगाकर रखी थी, जबकि कश्मीर के महाराजा हरिसिंह पाकिस्तान के साथ जाना नहीं चाहते थे. यही वजह थी कि उन्होंने स्वतंत्र रहना स्वीकार किया था. भारत को कश्मीर का अलग रहना स्वीकार्य नहीं था, क्योंकि भारत कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक राष्ट्र था, लेकिन कश्मीर के इस निर्णय से भारत की वह छवि टूट रही थी, लेकिन लॉर्ड माउंटबेटेन भारत को कश्मीर के इस फैसले में दखल देने से रोक रहे थे. वहीं पाकिस्तान ने कश्मीर के साथ स्टैंड डील एग्रीमेंट भी साइन कर लिया था, जिसके तहत प्रशासनिक समझौता किया गया था. इस समझौते का अर्थ था पाकिस्तान कश्मीर के खिलाफ कोई कानूनी और व्यावसायिक गतिविधि नहीं करेगा. भारत ने इस एग्रीमेंट को साइन नहीं किया था, क्योंकि भारत यह चाहता था कि कश्मीर विलय के दस्तावेज साइन करे. तमाम समझौतों के बावजूद पाकिस्तान ने कश्मीर पर कबीलाइयों के वेश में हमला किया और उसे अपने में शामिल करने की कोशिश की. जब महाराजा हरिसिंह पाकिस्तान की आर्मी का मुकाबला नहीं कर पाए, तो उन्होंने भारत से सहायता मांगी. उस वक्त भारत ने कहा कि भारतीय सेना तभी मदद करेगी जब विलय के दस्तावेज साइन किए जाएंगे. जब महाराजा हरिसिंह ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज साइन किए, तब जाकर भारत ने कश्मीर से पाकिस्तानी सेना को खदेड़ा.
कश्मीरी भारत के साथ रहना चाहते थे
जम्मू-कश्मीर में आबादी के हिसाब से तीन क्षेत्र थे. जम्मू में जहां हिंदुओं की आबादी अधिक थी, वहीं कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यक थे, जबकि लद्दाख में बौद्ध और शिया मुसलमान अधिक थे. कश्मीर में नेशनल काॅन्फ्रेंस सबसे मजबूत पार्टी थी और वह भारत के पक्ष में खड़ी थी. जम्मू के लोग हर हाल में भारत में रहना चाहते थे और यही स्थिति लद्दाख की भी थी. कश्मीरी अपने राजा से तो नाखुश थे, लेकिन वे भारत में पक्ष में थे. वे यह जानते थे कि भारत में उनके अधिकार ज्यादा सुरक्षित हैं.
1965 में पाकिस्तान ने फिर की कश्मीर में घुसपैठ
आजादी के बाद 1965 में पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर में घुसपैठ की और कश्मीर को अशांत करने की कोशिश की थी. वे कश्मीरियों के वेश में थे और यह कोशिश कर रहे थे कि कश्मीर में विद्रोह फैल जाए और कश्मीर भारत से अलग हो जाए, ताकि वह कश्मीरियों से सहानुभूति दिखाकर अपने में शामिल कर सके. लेकिन उस वक्त के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान को मुंह तोड़ जवाब दिया और पाकिस्तान को एक बार फिर बताया कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है उसे भारत से कोई अलग नहीं कर सकता है. लेकिन पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज आने वाला नहीं था और उसने 1971 के युद्ध के बाद आतंकवाद के जरिए कश्मीर को अशांत किया. पहलगाम की घटना भी पाकिस्तान के इसी मंसूबे का परिणाम है.
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By Rajneesh Anand
राजनीति,सामाजिक, इतिहास, खेल और महिला संबंधी विषयों पर गहन लेखन किया है. तथ्यपरक रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक लेखन में रुचि. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक. IM4Change, झारखंड सरकार तथा सेव द चिल्ड्रन के फेलो के रूप में कार्य किया है. पत्रकारिता के प्रति जुनून है. प्रिंट एवं डिजिटल मीडिया में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव.
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