कश्मीर को लेकर क्यों कम नहीं हो रहा पाकिस्तान का लालच, ये है असली वजह

Edited by Rajneesh Anand
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पाकिस्तान ने अपनी गलतियों से कभी सबक नहीं लिया

Pakistan and Kashmir : पाकिस्तान ने अपनी गलतियों से कभी सबक नहीं लिया, अगर वह अपनी गलतियों से सबक लेता, तो वह इतना बदहाल और बेबस ना होता. पाकिस्तान ने अपने पड़ोसी मुल्क भारत से हमेशा बैर किया, जबकि पाकिस्तानियों के रग में हिंदुस्तान का ही खून दौड़ता है. उनकी सभ्यता-संस्कृति सबकुछ भारत की ही देन है. धर्म के नाम पर देश के दो टुकड़े करने वाला पाकिस्तान अगर यह समझ गया होता कि उसने बंटवारा करके बहुत बड़ी गलती की है, तो वह भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाता, लेकिन उसने भारत की ओर बम और गोले फेंके. भारत के अभिन्न अंग कश्मीर पर नजर गड़ाकर वह हमेशा मुंह की खाता रहा है, फिर भी कश्मीर को लेकर उसकी जो वासना है वह कम होने का नाम ही नहीं लेती है.

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Pakistan and Kashmir : पाकिस्तान एक ऐसा देश है, जिसकी गिद्ध दृष्टि कश्मीर पर हमेशा लगी रहती है. उसकी कोशिश यह रहती है कि वह किसी तरह कश्मीर पर अपना हक जमा ले. अपनी इस नापाक कोशिश में पाकिस्तान कई बार मुंह की खा चुका है, लेकिन पाकिस्तान की निर्लज्जता जाती नहीं और वह लगातार इस कोशिश में रहता है कि वह किसी तरह कश्मीर में अपनी घुसपैठ कर ले. बंटवारे के बाद से अबतक पाकिस्तान ने कश्मीर को लेकर भारत के साथ कई युद्ध किए हैं और जब उसे युद्ध में सफलता नहीं मिली तो उसने आतंकवाद को बढ़ावा देकर कश्मीर को अशांत किया है.

बंटवारे के वक्त क्या थी कश्मीर की स्थिति

बंटवारे के वक्त अंग्रेजों ने देसी रियासतों को यह स्वतंत्रता दी थी कि वे अपनी इच्छा से भारत या पाकिस्तान में शामिल हो सकते हैं या फिर स्वतंत्र भी रह सकते हैं. जिन देसी रियासतों ने भारत और पाकिस्तान के साथ जाने के लिए सहमति दी उन्हें एक दस्तावेज साइन करना था जिसे नाम दिया गया था इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन (Instrument of Accession). आजादी के वक्त भारत में कुल 565 रियासतें थीं, जिनमें से एक जम्मू-कश्मीर भी था. इन 565 रियासतों में अधिकतर ने भारत के साथ जाना स्वीकार किया, जबकि सात रियासतें पाकिस्तान के साथ गईं. उस वक्त जम्मू-कश्मीर ने इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन यानी किसी भी देश के साथ विलय के दस्तावेज पर साइन नहीं किया था, जिसकी वजह से वह स्वतंत्र था.

मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग के आधार पर बना था पाकिस्तान

Partition of india
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भारत का विभाजन इस सिद्धांत पर हुआ था कि हिंदू और मुसलमान एक देश में साथ नहीं रह सकते हैं. मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने इस बात को सबसे अधिक स्थापित करने की कोशिश की और अलग पाकिस्तान की मांग की. जिन्ना की जिद की वजह से ही देश के दो टुकड़े हुए और देश के जिन इलाकों में मुसलमानों की संख्या ज्यादा थी उसे पाकिस्तान बनाया गया. ब्रिटिश भारत में भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन की रेखा लॉर्ड रेडक्लिफ ने खिंची थी, उन्हें इंग्लैंड से इसी काम के लिए भारत बुलाया गया था. उन्हें भारत के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था, इसलिए एक देश को दो टुकड़ों में बांटना उनके लिए बहुत कठिन काम था.लॉर्ड रेडक्लिफ ने दोनों देशों के बीच जो सीमा रेखा खिंची उसी को बाद में दोनों देश के बीच विभाजन रेखा मान लिया गया था. उस भारत के पूर्वी और पश्चिमी दोनों ही तरफ पाकिस्तान था, जिसे नाम दिया गया था पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिम पाकिस्तान. पाकिस्तान के इन दो हिस्सों में मुसलमानों की जनसंख्या ज्यादा थी.

पाकिस्तान की कश्मीर पर क्यों थी नजर

आजादी के वक्त कश्मीर ने स्वतंत्र रहना स्वीकार किया था, लेकिन पाकिस्तान यह चाहता था कि कश्मीर उसमें शामिल हो जाए क्योंकि जम्मू-कश्मीर की बहुसंख्यक आबादी मुसलमान थी. इसी वजह से जिन्ना ने अपनी बुरी नजर पाकिस्तान पर लगाकर रखी थी, जबकि कश्मीर के महाराजा हरिसिंह पाकिस्तान के साथ जाना नहीं चाहते थे. यही वजह थी कि उन्होंने स्वतंत्र रहना स्वीकार किया था. भारत को कश्मीर का अलग रहना स्वीकार्य नहीं था, क्योंकि भारत कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक राष्ट्र था, लेकिन कश्मीर के इस निर्णय से भारत की वह छवि टूट रही थी, लेकिन लॉर्ड माउंटबेटेन भारत को कश्मीर के इस फैसले में दखल देने से रोक रहे थे. वहीं पाकिस्तान ने कश्मीर के साथ स्टैंड डील एग्रीमेंट भी साइन कर लिया था, जिसके तहत प्रशासनिक समझौता किया गया था. इस समझौते का अर्थ था पाकिस्तान कश्मीर के खिलाफ कोई कानूनी और व्यावसायिक गतिविधि नहीं करेगा. भारत ने इस एग्रीमेंट को साइन नहीं किया था, क्योंकि भारत यह चाहता था कि कश्मीर विलय के दस्तावेज साइन करे. तमाम समझौतों के बावजूद पाकिस्तान ने कश्मीर पर कबीलाइयों के वेश में हमला किया और उसे अपने में शामिल करने की कोशिश की. जब महाराजा हरिसिंह पाकिस्तान की आर्मी का मुकाबला नहीं कर पाए, तो उन्होंने भारत से सहायता मांगी. उस वक्त भारत ने कहा कि भारतीय सेना तभी मदद करेगी जब विलय के दस्तावेज साइन किए जाएंगे. जब महाराजा हरिसिंह ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज साइन किए, तब जाकर भारत ने कश्मीर से पाकिस्तानी सेना को खदेड़ा.

कश्मीरी भारत के साथ रहना चाहते थे

जम्मू-कश्मीर में आबादी के हिसाब से तीन क्षेत्र थे. जम्मू में जहां हिंदुओं की आबादी अधिक थी, वहीं कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यक थे, जबकि लद्दाख में बौद्ध और शिया मुसलमान अधिक थे. कश्मीर में नेशनल काॅन्फ्रेंस सबसे मजबूत पार्टी थी और वह भारत के पक्ष में खड़ी थी. जम्मू के लोग हर हाल में भारत में रहना चाहते थे और यही स्थिति लद्दाख की भी थी. कश्मीरी अपने राजा से तो नाखुश थे, लेकिन वे भारत में पक्ष में थे. वे यह जानते थे कि भारत में उनके अधिकार ज्यादा सुरक्षित हैं.

1965 में पाकिस्तान ने फिर की कश्मीर में घुसपैठ

आजादी के बाद 1965 में पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर में घुसपैठ की और कश्मीर को अशांत करने की कोशिश की थी. वे कश्मीरियों के वेश में थे और यह कोशिश कर रहे थे कि कश्मीर में विद्रोह फैल जाए और कश्मीर भारत से अलग हो जाए, ताकि वह कश्मीरियों से सहानुभूति दिखाकर अपने में शामिल कर सके. लेकिन उस वक्त के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान को मुंह तोड़ जवाब दिया और पाकिस्तान को एक बार फिर बताया कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है उसे भारत से कोई अलग नहीं कर सकता है. लेकिन पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज आने वाला नहीं था और उसने 1971 के युद्ध के बाद आतंकवाद के जरिए कश्मीर को अशांत किया. पहलगाम की घटना भी पाकिस्तान के इसी मंसूबे का परिणाम है.

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लेखक के बारे में

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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