कौन थे नरेंद्र मोदी के गुरू लक्ष्मणराव इनामदार, जिनके साथ मुलाकात ने बदल दी उनकी जिंदगी?

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हर नेता के बनने की कहानी एक जैसी नहीं होती है. कई बार नेता परिस्थितियों की उपज होते हैं तो कभी कोई शख्स उन्हें राजनीति में लाता है. गांधी जी के राजनीतिक गुरू गोपाल कृष्ण गोखले थे. मायावती को राजनीति में लाने का श्रेय कांशीराम को जाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक गुरू लक्ष्मणराव […]

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हर नेता के बनने की कहानी एक जैसी नहीं होती है. कई बार नेता परिस्थितियों की उपज होते हैं तो कभी कोई शख्स उन्हें राजनीति में लाता है. गांधी जी के राजनीतिक गुरू गोपाल कृष्ण गोखले थे. मायावती को राजनीति में लाने का श्रेय कांशीराम को जाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक गुरू लक्ष्मणराव इनामदार थे. जिनके जन्मदिवस पर आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री ने हिस्सा लिया.

लक्ष्मणराव आरएसएस के स्वयंसेवक थे. वकालत की पढ़ाई कर चुके इनामदार गुजरात में संघ के प्रांत प्रचारक थे. नरेंद्र मोदी को संघ में लाने का श्रेय उन्हें जाता है. एक चाय बेचने वाले पिता के बेटे का राजनीतिक झुकाव को महज संयोग ही कहा जायेगा लेकिन यह इनामदार ही थे जिनके संपर्क के साथ हीउनकीदिलचस्पीसामाजिक कार्य में बढ़ती गयी.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सेतुबंध के नाम से किताब भी लिखा है. इस किताब में उन्होंने लक्ष्मणराव ईनामदार का जिक्र किया है. इनामदार ने हीउन्हें बीए में दाखिला लेने की सलाह दी थी. मोदी के जीवन पर किताब लिखने वाले लोगों का मानना है कि मोदी के जीवन पर अगर किसी एक शख्स का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है तो वह लक्ष्मराव इनामदार थे. अपनी किताब में मोदी लिखते हैं इनामदार जीकी शख्सीयतसे जो मैंने सबसे बड़ी बात सीखी वह अपने श्रोताओं को हर दिन के उदाहरण से काम करने के लिए प्रेरित करने की कला थी. मोदी ने उनके साथ जुड़ी एक कहानी का जिक्र करते हुए कहा कि लक्ष्मण राव बांसुरी को दिखा कर कहा करते थे, अगर आपको बजाना आता हो तो यह बांसुरी होता है और नहीं तो सिर्फ एक छड़ी है.
मोदी ने जब 17 साल की उम्र में घर छोड़ा तो उनके पास जीवन के प्रति कोई ठोस योजना नहीं थी. रामकृष्ण मिशन आश्रम राजकोट व कोलकाता के बेलुड़ मठ पहुंच गये. कहा तो यह भी जाता है कि मोदी विवेकानंद के अल्मोड़ा स्थित आश्रम भी गये. दो साल बाद जब वडनगर लौटे तो घर में ज्यादा दिन तक रूके नहीं. मोदी वापस अहमदाबाद चले गये जहां उन्होंने अपने चाचा की चाय दुकान में काम किया. यहां फिर से वह लक्ष्मराव इनामदार से जुड़ गये. अहमदाबाद स्थित हेडगेवोर भवन पहुंचे. इसके बाद से परिवारिक जीवन में वे कभी नहीं लौटे.
मोदी के जीवन पर इनामदार का प्रभाव
मोदी ने कठोर अनुशासन, लगातार मेहनत करने की क्षमता और लोगों से मिलने-जुलने का स्किल भी इनामदार से सीखा. योग और प्रणायाम की आदत भी मोदी को उन्हीं से पड़ी. आपातकाल के वक्त जब आरएसएस पर पाबंदी लगी तो मोदी सिख के वेश में आ गये वहीं इनामदार ने धोती पहनना छोड़ा, कुर्ता पजामा पहनने लगे.
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