कबाड़ बैटरियों से निकलेगा ‘काला सोना’, CSIR-NML और बेंगलुरु की कंपनी से बड़ा करार

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Jamshedpur csir battery recycling

CSIR-NML का बेंगलुरु की कंपनी से करार, Pic Credit- AI, Only for Symbolism

Jamshedpur CSIR Battery Recycling: CSIR-NML जमशेदपुर ने बेंगलुरु की कंपनी सिरक्योर प्राइवेट लिमिटेड के साथ कबाड़ लिथियम-आयन बैटरियों से लिथियम और कोबाल्ट जैसी कीमती धातुएं निकालने के लिए MoU किया है. पढ़ें, इसका क्या फायदा मिलेगा.

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जमशेदपुर से संजीव भारद्वाज की रिपोर्ट

Jamshedpur CSIR Battery Recycling, जमशेदपुर : आज के डिजिटल और इलेक्ट्रिक युग में मोबाइल, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EV) का इस्तेमाल बहुत तेजी से बढ़ रहा है. लेकिन इसके साथ ही एक बड़ी समस्या भी पैदा हो रही है वो है कबाड़ हो चुकी लिथियम-आयन बैटरियों के कचरे (ई-वेस्ट) का अंबार. इस बड़ी चुनौती को एक शानदार अवसर में बदलने के लिए झारखंड के जमशेदपुर स्थित सरकारी लैब सीएसआइआर-राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (CSIR-NML) ने एक बेहद ऐतिहासिक कदम उठाया है. एनएमएल ने बेंगलुरु की प्रसिद्ध कंपनी मेसर्स सिरक्योर प्राइवेट लिमिटेड के साथ एक विशेष समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं. इस समझौते के तहत अब कबाड़ हो चुकी बैटरियों को फेंकने के बजाय उनसे ‘काला सोना’ यानी बेहद कीमती धातुएं निकाली जाएंगी. यह स्वदेशी तकनीक आने वाले समय में बैटरी कचरे को एक मूल्यवान संसाधन में बदलने के लिए पूरी दुनिया में ‘गेमचेंजर’ साबित होने वाली है.

पूरी तरह स्वदेशी तकनीक

इस आधुनिक और उन्नत धातुकर्म प्रक्रिया की सबसे खास बात यह है कि यह पूरी तरह से भारत में विकसित स्वदेशी तकनीक है. इस तकनीक की मदद से बेकार और कबाड़ हो चुकी बैटरियों को बहुत ही सुरक्षित, साफ-सुथरे और वैज्ञानिक तरीके से रिसायकल किया जाएगा. इस प्रक्रिया के जरिए कबाड़ बैटरियों के अंदर से लिथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज, निकेल, तांबा, एल्युमिनियम और ग्रेफाइट जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और महंगे पदार्थों को वापस निकाल लिया जाएगा. अब तक इन कबाड़ बैटरियों को नष्ट करने का कोई इतना सुरक्षित और सटीक उपाय देश में नहीं था, लेकिन अब इस तकनीक से कचरे से भी करोड़ों का कीमती सामान निकाला जा सकेगा.

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विदेशी आयात पर लगेगी रोक

वर्तमान समय की बात करें तो भारत अपनी जरूरत के लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसी महत्वपूर्ण सामग्रियों के लिए बहुत बड़े पैमाने पर विदेशी आयात (दूसरे देशों से खरीदने) पर निर्भर है. चूंकि देश में इलेक्ट्रिक वाहनों, मोबाइल और पावर बैंक का चलन दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है, इसलिए कच्चे माल की मांग भी बढ़ती जा रही है. एनएमएल के निदेशक डॉ. संदीप घोष चौधरी और मुख्य वैज्ञानिक डॉ. मनीष कुमार झा की सीधी देखरेख में विकसित की गई यह तकनीक इन खराब बैटरियों को कच्चे माल के एक बेहतरीन विकल्प (सेकेंडरी सोर्स) के रूप में खड़ा कर देगी. इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि भारत को अब इन कीमती धातुओं के लिए प्राकृतिक खनन पर और दूसरे देशों से आयात करने पर अपनी निर्भरता को बहुत हद तक कम करने में मदद मिलेगी, जिससे देश का पैसा बचेगा.

पर्यावरण को सुरक्षा और सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा

समझौते के दौरान सिरक्योर प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक श्रीकुमार वाचस्पति भी मौजूद थे. उन्होंने इस तकनीक की तारीफ करते हुए कहा कि आज के समय में उद्योग जगत को इस तरह की तकनीक की बहुत ज्यादा जरूरत थी. पर्यावरण विशेषज्ञों का भी मानना है कि इस करार से न केवल खतरनाक बैटरी कचरे का सुरक्षित और सही प्रबंधन हो सकेगा, बल्कि प्रकृति और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना देश में ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ (कचरे से कंचन बनाने की व्यवस्था) को रफ्तार मिलेगी. इससे प्रधानमंत्री के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प को भी एक मजबूत आधार मिलेगा. इस खास एमओयू (MoU) के मौके पर एनएमएल के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संजय कुमार और सीओए जय शंकर शरण सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे.

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समीर उरांव

लेखक के बारे में

By समीर उरांव

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

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