कौन हैं बोस्टन ब्राह्मण, जिनकी चर्चा ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो ने अमेरिकी टैरिफ को सही ठहराने के लिए किया

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 02 Sep 2025 6:12 PM

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राष्ट्रपति ट्रंप के साथ पीटर नवारो

Boston Brahmin : अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर 50% टैरिफ लगाया है और यह साबित करने में भी जुटा है कि अमेरिका का यह कदम सही है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो ने यह कहा है कि नरेंद्र मोदी एक अच्छे व्यक्ति हैं, लेकिन पता नहीं क्यों वे पुतिन और जिनपिंग जैसे तानाशाहों की गोद में बैठना चाह रहे हैं. नवारो ने यह कहा कि भारतीय ब्राह्मण वहां की रणनीति तय कर रहे हैं, दरअसल नवारो अमेरिका के उस एलिट क्लास से भारतीय एलिट क्लास की तुलना कर रहे हैं जिन्हें बोस्टन ब्राह्मण कहा जाता है.

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Boston Brahmin : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो ने सोमवार को भारत पर एक बार फिर हमला बोला. नवारो ने कहा कि  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक महान नेता हैं, लेकिन यह समझ नहीं आ रहा है कि वे क्यों पुतिन और जिनपिंग जैसे नेताओं की शरण में जा रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि भारत की आर्थिक नीतियों को तय करने में ब्राह्मणों की भूमिका रही है, जो वहां के गरीबों और जरूरतमदों को दरकिनार कर अपने हित में नीतियां बनवा रहे हैं. पीटर नवारो के इस बयान के बाद भारत में हंगाम मच गया है.  

भारत में कौन हैं ब्राह्मण?

भारत में ब्राह्मण जाति व्यवस्था के शीर्ष पर हैं और उनका बिजनेस से कोई लेना–देना नहीं है. पुराने समय में वे धार्मिक कार्यों में अधिक संलग्न रहते थे और राजा के सलाहकार भी होते थे. ब्राह्मण जाति आज भी समाज में शक्तिशाली और अपनी प्रतिष्ठा रखती है, लेकिन उनका बिजनेस से कोई लेना देना नहीं है. ऐसे में जब नवारो ने ब्राह्मण शब्द का प्रयोग किया, तो इसे भारतीयों ने जातिसूचक शब्द के रूप में लिया.

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बोस्टन ब्राह्मण कौन है?

पीटर नवारो ने भारत पर 50% टैरिफ को सही ठहराने के लिए यह कहा कि वहां के एलिट क्लास ने जरूरतमंदों को दरकिनार कर नीतियां बनाई हैं. इसी एलिट क्लास को उन्होंने ब्राह्मण कहा. यहां उनका ब्राह्मण कहने का आशय बोस्टन के उन ब्राह्मणों से तुलना है, जो अमेरिका में एलिट क्लास होते हैं. ‘बोस्टन ब्राह्मण’ अमेरिका के बोस्टन में धनी, सुशिक्षित प्रोटेस्टेंटों का समुदाय था. ये लोग 18वीं और 19वीं सदी में ताकतवर समुदाय थे, वे अमेरिका के अंग्रेज उपनिवेशवादियों के वंशज थे. इन लोगों ने बिजनेस में भाग्य आजमाया और सफल भी हुए. बोस्टन ब्राह्मण अन्य लोगों से अलग रहते थे और अपनी एक अलग जीवन शैली में जीते थे. उन्हें दूसरे वर्ग के लोगों के साथ मिलना–जुलना पसंद नहीं था. वे शादी भी आपस में ही करते थे. बाहरी लोगों में इनकी छवि एक घमंडी समुदाय के रूप में थी, जो सिर्फ अपना हित देखता है. ‘बोस्टन ब्राह्मण’ शब्द का प्रयोग  सबसे पहले ओलिवर वेंडेल होम्स सीनियर ने 1861 में एक लेख में किया था. उन्होंने भारतीय ब्राह्मणों की सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति को देखकर ही  उनके लिए बोस्टन ब्राह्मण शब्द का प्रयोग किया था.

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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