चीन पर भरोसा नहीं करता है भारत, ऐसे में मोदी-जिनपिंग मुलाकात से क्या बदलेगा समीकरण, 4 प्वाइंट्स में समझें
प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग
Modi Jinping Meeting : भारत और चीन के बीच संबंध सुधारने की प्रैक्टिस एक बार फिर शुरू हुई है. इस पहल को दोनों देशों के लिए पाॅजिटिव संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए. भारत और चीन ने उस वक्त बातचीत की शुरुआत की है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अपने टैरिफ से भारत पर दबाव बनाने की कोशिश में हैं. यही वजह है कि भारत-चीन की मीटिंग काफी अहम हो गई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बातचीत एक तरह से पूरे विश्व का सिनारियो बदल सकती है और अमेरिकी अहम को चोट पहुंचा सकती है.
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Modi Jinping Meeting : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई है और यह वार्ता काफी सकारात्मक रही है. दोनों ही देश की तरफ से ऐसे संकेत मिले हैं कि वे संबंध सुधारने और विश्वास बढ़ाने के इच्छुक हैं. पीएम मोदी ने शी जिनपिंग से कहा कि भारत-चीन के बीच अगर सहयोग बढ़ता है, तो यह 2.8 अरब लोगों के कल्याण से जुड़ा मसला होगा. हम आपसी विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता के आधार पर अपने सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है. वहीं इस मौके पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि वे पीएम मोदी से मिलकर बहुत खुश हैं. उन्होंने कहा कि दोनों देशों को अपने संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखना चाहिए, ताकि बेहतर संबंध स्थापित हो सकें. उन्होंने कहा कि भारत और चीन को बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था बनाने और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अधिक लोकतांत्रिक बनाने के लिए भी काम करना चाहिए. इस बातचीत के कई मायने हैं, जिसे समझने की जरूरत है.
भारत-चीन संबंध की नई शुरुआत कितनी महत्वपूर्ण?
भारत और चीन दोनों ही विश्व की बड़ी शक्तियां हैं. दोनों देशों की सीमाएं एक दूसरे से जुड़ती हैं, इसलिए दोनों पड़ोसी भी भी हैं. इतिहास की बात करें, तो भारत और चीन के संबंध काफी पुराने हैं. दोनों ही पुरानी सभ्यताएं हैं और व्यापार और बौद्ध धर्म के प्रचार ने दोनों देशों को काफी पहले से जोड़कर रखा है. लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि भारत की आजादी के बाद दोनों देशों के संबंध ऐसे कभी नहीं रहे कि दोनों को एक आदर्श पड़ोसी कहा जाए. दोनों देशों ने एक दूसरे को शंका की दृष्टि से देखा है और 1962 के युद्ध ने तो यह साबित कर दिया था कि भारत की जमीन पर चीन की नजर है. उसके बाद नाथू ला और चो ला संघर्ष, फिर गलवान घाटी मुठभेड़ ये तमाम चीजें यह साबित करती हैं कि भारत और चीन के संबंध किस तरह के हैं. बावजूद इसके अगर भारत और चीन ने संबंधों को सुधारने की कोशिश की है और द्विपक्षीय वार्ता कर रहे हैं, तो इसे बेहतर संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए.
भरोसा कायम करना भारत-चीन वार्ता के लिए सबसे जरूरी

भारत और चीन दोनों ही ऐसे देश हैं, जो एक दूसरे पर भरोसा नहीं करते हैं. दोनों के बीच भरोसा सबसे बड़ा मुद्दा है. चीन ने जिस तरह भारत के साथ किए गए पंचशील समझौते का उल्लंघन करते हुए भारत पर 1962 में हमला किया, उससे भारत का भरोसा अपने पड़ोसी पर नहीं रहा है. साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी ने प्रभात खबर से बात करते हुए कहा कि भारत और चीन अगर बातचीत के लिए साथ आएं हैं, तो यह एक पाॅजिटिव साइन है, लेकिन इस बातचीत के आधार पर अभी दोनों देशों के संबंधों पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी. भारत-चीन के बीच जिस तरह के संबंध रहे हैं, उसमें यह बातचीत अभी बहुत सतही दौर में है, यानी आप इसे एक शुरुआत कह सकते हैं, इसके आधार पर कोई गणना अभी नहीं की जा सकती है. अभी तो दोनों देशों को सीमा पर शांति बहाल करनी चाहिए. इसके साथ ही एक दूसरे के हितों का सम्मान करना चाहिए. चीन को यह कोशिश करनी चाहिए कि वह दक्षिण एशिया के मामले में ज्यादा दखल ना दें और यहां की शांति को भंग ना करें.
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व्यापारिक संबंधों में और सुधार की जरूरत
भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध बहुत मजबूत हैं. चीन और भारत के बीच 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का व्यापार होता है. लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि चीन से भारत आयात ज्यादा करता है, निर्यात काफी कम होता है. इस संतुलन को बनाने की जरूरत है. चीन को चाहिए कि वह अगर दोनों देशों के बीच संबंध सुधारना चाहता है, तो अपने बाजारों को भारतीय सामानों को अपने देश के लिए खोले. प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी कहते हैं कि चीन को अपना रवैया बदलन की जरूरत है, अगर वह यह चाहता है कि भारत-चीन के बीच संबंध बेहतर हों, तो उसे उस तरह के कार्य नहीं करने चाहिए जो दोनों देशों के संबंध को खराब करत हैं. उदाहरण के दौर पर एपल कंपनी के मुद्दे को लें जिसमें फॉक्सकॉन ने भारत में अपनी iPhone फैक्ट्रियों से लगभग 300 से अधिक चीनी इंजीनियरों और तकनीशियनों को चीन वापस बुला लिया. यह कदम मई 2025 से शुरू हुआ और इसकी वजह से एपल की भारत में iPhone 17 के उत्पादन को बढ़ाने की योजना को बड़ा झटका लगा. चीन को इस तरह के आचरण रोकने होंगे. टिकटाॅक जैसे एप को भारत ने सुरक्षा कारणों से बैन किया, भारत की सुरक्षा पर जो एप खतरा साबित हो सकते हैं, उसके प्रति चीन को नजरिया बदलना होगा. साथ ही यह भी देखने वाली बात होगी कि क्या भारत, चीन पर इतना भरोसा कर पा रहा है कि वह उन क्षेत्रों में चीन को एंट्री दे दे, जहां उसने बैन लगा रखा है.
क्या ट्रंप टैरिफ की वजह से भारत-चीन आ रहे हैं पास?
भारत और चीन के बीच जो बातचीत शुरू हुई है, उसे ट्रंप के टैरिफ का परिणाम बताया जा रहा है. लेकिन यह बात सही नहीं है. निश्चित तौर पर ट्रंप के टैरिफ की वजह से भारत अपने निर्यात को बढ़ाने के लिए दूसरे आॅप्शन पर विचार कर रहा है, लेकिन भारत इस बात को अच्छी तरह से जानता है कि चीन पर आंख मूंद के भरोसा करने की स्थिति में वह नहीं है. हां यह बात भी सही है कि अब भारत, अमेरिका पर अत्यधिक भरोसा नहीं कर रहा है, लेकिन चीन के साथ संबंध बेहतर करने के प्रयास सिर्फ ट्रंप-टैरिफ का परिणाम नहीं हैं. प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी कहते हैं कि ट्रंप टैरिफ की वजह से अमेरिका के साथ भारत के संबंध ऐसे बन गए हैं, जैसे कि वह अब कुछ भी कर सकता है. बात सिर्फ ट्रंप की नहीं है, बात अमेरिका की है. संभव है कि ट्रंप के बाद भी जो व्यक्ति अमेरिका का राष्ट्रपति बने उसपर भी भारत विश्वास ना कर पाए, इसलिए अब भारत नए विकल्प तलाश रहा है. चीन के साथ तो भारत को अपने संबंध सुधारने ही चाहिए, साथ ही दक्षिण एशियाई देशों के साथ, यूरोप, ब्राजील, मैक्सिको, अफ्रीकी देशो के साथ भी अपने संबंध सुधारने चाहिए.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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