कानूनन क्या होगी बच्चे की जाति अगर माता-पिता अलग जाति के हैं और परिस्थितियां कुछ इस तरह की हैं…

Edited by Rajneesh Anand
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सुप्रीम कोर्ट

Caste Of The Child : भारत एक जाति आधारित समाज है, जहां आधुनिक युग में भी जन्म के आधार पर जाति तय की जाती है. मान्यता यह है कि एक बच्चे की जाति वही होगी, जो उसके पिता की है. बदलते सामाजिक माहौल में इस व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए हैं, क्योंकि अब यह जरूरी नहीं रह गया है कि एक बच्चे के माता-पिता की जाति एक ही हो. अंतरजातीय विवाह में भी यही मान्यता है कि पिता की जाति से ही बच्चे की जाति तय की जाएगी, लेकिन सवाल तब खड़े हो जाते हैं जब माता सिंगल हो और बच्चे की पूरी परवरिश उसने स्वयं की हो, पिता की उसमें कोई भागीदारी ना हो.

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Caste Of The Child : सुप्रीम कोर्ट के सामने अंतरजातीय विवाह से जन्म लेने वाले एक बच्चे का केस आया है, जिसमें उसकी मां ने यह मांग की है कि उसके बच्चे को उसकी जाति प्रदान की जाए. चूंकि वह अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी से आती है, इसलिए उसके बच्चे को भी ओबीसी का जाति प्रमाणपत्र जारी किया जाए. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 23 जून को सिंगल मदर्स के बच्चों को जाति प्रमाणपत्र जारी करने के दिशा-निर्देशों की कमी को चिन्हित किया है और इस केस की अगली सुनवाई 22 जुलाई को होगी.

किस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कमी बताई है

सुप्रीम कोर्ट के सामने एक केस आया है, जिसमें याचिकाकर्ता संतोष कुमारी ने यह कहा है कि चूंकि वह ओबीसी समुदाय से आती है और वो एक सिंगल मदर हैं, तो उनके बच्चे को ओबीसी का सर्टिफिकेट मिलना चाहिए, क्योंकि वो खुद इसी समुदाय से आती हैं. संतोष कुमारी ने यह कहा कि उनके बच्चे को ओबीसी का सर्टिफिकेट देने से मना करना जाति प्रमाण पत्र पर पितृवंशीय परंपरा को बढ़ावा देने का प्रतीक है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत लैंगिक समानता पर सवाल उठाता है. कोर्ट ने संतोष कुमारी की याचिका को जरूरी बताया है और इसपर सुनवाई के लिए 22 जुलाई की तारीख मुकर्रर की है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि देश में सिंगल मदर्स के बच्चों को जाति प्रमाण पत्र जारी करने के नियमों में काफी कमी है.

जाति प्रमाण पत्र को लेकर क्या हैं नियम

जब किसी बच्चे का जाति प्रमाण पत्र बनता है, तो उसके पिता या फिर पैतृक रक्त संबंधों के जाति प्रमाण पत्र को आधार बनाकर ही बच्चे का जाति प्रमाण पत्र जारी किया जाता है. परंपरा अनुसार यही माना जाता है कि पिता की जाति ही बच्चे की जाति होगी. अंतरजातीय शादियों में भी पत्नियों को पति की जाति नहीं मिलती है, लेकिन ऐसी शादियों से उत्पन्न संतान की जाति वही मानी जाती है, जो उसके पिता की होगी. यहां तक कि जो प्रमाणपत्र के लिए जो आवेदन किया जाता है, उसमें भी यही अंकित होता है कि बच्चे की जाति वही मानी जाएगी, जो उसके पिता की होगी.

बदलते दौर में अपवाद आए हैं सामने

रमेशभाई दाभाई नायका बनाम गुजरात राज्य के केस में सुप्रीम कोर्ट ने रमेश भाई को उसकी माता की जाति स्वीकार करने का हक दिया और उन्हें आरक्षण की सुविधा भी मिली थी. यह मामला 2012 का है जब सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की थी कि जाति की पहचान जन्म से तय होती है, लेकिन सामाजिक परिवेश और पालन-पोषण भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं. इस केस में रमेशभाई दाभाई नायका ने अनुसूचित जनजाति के प्रमाण पत्र और आरक्षण का लाभ लेने के लिए आवेदन किया था. उस वक्त गुजरात सरकार ने उनके आवेदन को अस्वीकार कर दिया था, क्योंकि रमेशभाई के पिता गैर जनजाति समाज से थे. हालांकि रमेशभाई की मां गुजरात की मान्यता प्राप्त अनुसूचित जनजाति “ढोड़ा” समाज से आती थीं. जब गुजरात में रमेशभाई का एसटी प्रमाणपत्र वैध नहीं माना गया, तब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए यह माना कि अंतरजातीय विवाह या आदिवासी और गैर-आदिवासी के बीच विवाह में पति की जाति से ही बच्चे की जाति तय होती, लेकिन जिस परिवेश में बच्चा पला-बढ़ा हो और उसकी मां की उसमें जो भूमिका है उसे नजर अंदाज भी नहीं किया जा सकता है. कोर्ट ने यह भी माना था कि अंतरजातीय विवाह में अगर एक स्त्री अकेले अपने बच्चे का लालन-पालन करे और उसमें उसके पिता की कोई भूमिका ना हो, तो बच्चे की जाति वही मानी जा सकती है, जो उसकी मां की होगी.

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लेखक के बारे में

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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