क्या आप जानते हैं कोर्ट मैरिज करने के लिए माता–पिता की सहमति जरूरी है या नहीं?

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 22 Feb 2026 3:20 PM

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कोर्ट मैरिज के नियम

Marriage Registration Law In India : गुजरात सरकार ने 20 फरवरी को एक ऐसा प्रस्ताव विधानसभा में पेश किया है, जिससे प्रेम विवाह करने वालों पर संकट आ सकता है. हालांकि गुजरात सरकार ने अभी विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2006 में बदलाव नहीं किया है, लेकिन सरकार की मंशा इसमें बदलाव करने की है. सरकार यह दावा कर रही है कि प्रेम की जाल में फंसकर कई बार महिलाएं गलत फैसला कर लेती हैं, इस जाल से उन्हें बचाने के लिए विवाह के आवश्यक दस्तावेजों में माता–पिता की सहमति का पत्र भी शामिल करने पर सरकार विचार कर रही है. हालांकि संविधान का आर्टिकल 21 हर व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वतंत्रता की इजाजत देता है. 

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Marriage Registration Law In India : क्या आप किसी के प्रेम में हैं, लेकिन आपके माता–पिता इस रिश्ते से खुश नहीं है और आपको शादी की इजाजत नहीं दे रहे हैं? अगर आप अपनी मर्जी से अपना जीवनसाथी चुनना चाहते हैं, तो रूकिए, पहले आप यह तो जान लें कि भारत में कोर्ट मैरिज, जिसे रजिस्टर्ड मैरिज कहा जाता है, उसके लिए कानून क्या हैं? क्या माता–पिता की सहमति के बिना रजिस्टर्ड मैरिज करना संविधान के विपरीत है? 

भारत में कैसे होता है कोर्ट मैरिज?

भारत में कोर्ट मैरिज के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं,जिनका पालन करते हुए कोई भी बालिग युवक और युवती शादी कर सकते हैं. भारत का कानून बालिग जोड़ों को अपनी मर्जी से विवाह करने की इजाजत देता है. धनबाद के अधिवक्ता जीतेंद्र सिंह बताते हैं कि देश में मैरिज का रजिस्ट्रेशन हिंदू मैरिज एक्ट 1955 और स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के तहत होता है. हिंदू मैरिज एक्ट 1955 के तहत हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन धर्म के लोगों की शादी होती है और अगर दो अलग–अलग धर्म के लोग कोर्ट में शादी करते हैं, तो उनकी शादी स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत होती है. हालांकि इस एक्ट के तहत किसी भी जाति और धर्म के लोग शादी कर सकते हैं.

कानून के हिसाब से नहीं है गुजरात सरकार का प्रस्ताव

गुजरात में कोर्ट मैरिज के लिए माता–पिता की सहमति आवश्यक करने के प्रस्ताव पर जीतेंद्र सिंह ने कहा कि यह प्रस्ताव वर्तमान कानून के हिसाब से सही नहीं है, क्योंकि देश का संविधान दो बालिग लोगों को अपनी इच्छा से अपने जीवन से जुड़े निर्णय लेने की इजाजत देता है, उसमें उसके माता–पिता की सहमति आवश्यक नहीं है. वैसे भी अब देश में सरकारें इंटरकास्ट मैरिज को प्रमोट कर रही हैं. इसके लिए कई तरह की योजनाएं चलाई जा रही है, इन परिस्थितियों में अगर कोर्ट मैरिज के लिए माता–पिता की सहमति का पत्र मांगा जाएगा, तो यह कहीं ना कहीं एक बाधा बनेगा. अगर गुजरात सरकार इस तरह का कोई संशोधन मैरिज एक्ट में करती है, तो उसे कोर्ट खारिज कर देगा, क्योंकि यह संविधान के विपरीत माना जाएगा.

कोर्ट मैरिज के लिए अभी क्या डाॅक्यूमेंट देना है जरूरी?

कोई भी दो बालिग जोड़े जिनकी आयु लड़की की 18 साल और लड़के की 21 साल है, वो अपनी इच्छा से रजिस्ट्रर्ड मैरिज कर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता शिवागी रंजन बताती हैं कि हमारा संविधान दो एडल्ट लोगों को अपनी इच्छा से शादी करने की इजाजत देता है. इसके लिए माता–पिता की सहमति की जरूरत नहीं है, क्योंकि देश का कानून यह मानता है कि दो बालिग लोग अपने जीवन के बेहतर फैसले ले सकते हैं. शिवांगी रंजन बताती हैं कि रजिस्टर्ड मैरिज करने के लिए लड़का और लड़की को रजिस्टार के पास एप्लीकेशन देना होता है. उसके साथ ही एज प्रूफ के लिए बर्थ सर्टिफिकेट, रेसीडेंट प्रूफ के लिए आधार कार्ड, मैरिज रजिस्ट्रेशन की फीस (यह राज्य के अनुसार अलग–अलग होती है) दो–तीन पासपोर्ट साइट फोटोग्राफ देना होता है. इसके अलावा गवाह की जरूरत होती है. दोनों पक्ष से अगर एक–एक गवाह हो तो बेहतर वरना एक गवाह होने से भी मैरिज का रजिस्ट्रेशन हो जाता है.

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यहां गौर करने वाली बात यह है कि शादी करने वाले दोनों पक्ष को कहीं और इंगेज नहीं होना चाहिए. कहने का आशय यह है कि एक शादीशुदा व्यक्ति चाहे वो लड़का हो या लड़की हो किसी दूसरे से कोर्ट मैरिज नहीं कर सकता है. अगर कोई तलाकशुदा स्त्री या पुरुष किसी दूसरे व्यक्ति से कोर्ट मैरिज कर रहा हो, तो उसे तलाक की डिक्री समिट करनी होती है. इसी तरह अगर कोई विधवा या विधुर शादी कर रहा हो, तो उसे अपने पार्टनर का डेथ सर्टिफिकेट लगाना होगा. आवेदन के बाद 30 दिन का समय रजिस्टार वेरिफिकेशन के लिए लेते हैं, उसी दौरान एक तारीख दी जाती है, जिसमें कपल की शादी हो जाती है. 30 दिन से पहले भी शादी की तारीख मिल सकती है, ऐसा जरूरी नहीं है कि 30 दिन के बाद ही शादी होगी. वेरिफिकेशन के दौरान शादी की सूचना लड़का या लड़की के माता–पिता को नहीं दी जाती है.

क्या कोई लड़का या लड़की लिव इन में रहते हुए किसी दूसरे से कोर्ट मैरिज कर सकता है?

आजकल समाज में लिव इन का ट्रेंड काफी बढ़ गया है. ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या लिव इन में रहते हुए किसी और से शादी की जा सकती है? इसके जवाब में शिवांगी रंजन बताती हैं कि हां, कोई भी लड़का या लड़की लिव इन में रहते हुए किसी दूसरे से शादी कर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कुछ समय पहले ही यह व्यवस्था दी थी कि लिव इन में रहना एक तो उचित नहीं है, दूसरी बात यह कि लिव इन में रहना किसी कपल को शादी करने के लिए बांउडेड नहीं करता है. लिव इन में प्राॅमिस ऑफ मैरी की इजाजत नहीं है, इसलिए कोई भी लड़का या लड़की किसी के साथ लिव इन में रहकर भी किसी और से शादी करने के लिए स्वतंत्र हैं.

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लेखक के बारे में

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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