दक्षिण दिनाजपुर में नोटबंदी की मार मिड-डे मील पर

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 24 Nov 2016 2:06 AM

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बालुरघाट. नोटबंदी की मार अब दक्षिण दिनाजपुर जिले के स्कूलों में चलनेवाली मिड-डे मील योजना भी पड़नी शुरू हो गयी है. अधिकतर विद्यालयों में यह योजना बंद होने के कगार पर है. स्कूल अभी किसी तरह से उधार-बाकी करके छात्र-छात्राओं के लिए मिड-डे मील चला रहे हैं. लेकिन ऐसा कब तक चल पायेगा कहा नहीं […]

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बालुरघाट. नोटबंदी की मार अब दक्षिण दिनाजपुर जिले के स्कूलों में चलनेवाली मिड-डे मील योजना भी पड़नी शुरू हो गयी है. अधिकतर विद्यालयों में यह योजना बंद होने के कगार पर है. स्कूल अभी किसी तरह से उधार-बाकी करके छात्र-छात्राओं के लिए मिड-डे मील चला रहे हैं. लेकिन ऐसा कब तक चल पायेगा कहा नहीं जा सकता.

देश के अन्य इलाकों की तरह ही दक्षिण दिनाजपुर जिले में भी नोटबंदी का व्यापक असर पड़ा है. इससे कुछ भी अछूता नहीं है, चाहे वह सरकारी-गैर सरकारी प्रतिष्ठान हों, विकास परियोजनाएं हों या फिर अंतरराष्ट्रीय व्यापार. अब इसकी चपेट में मिड-डे मील योजना आती भी दिख रही है. सूत्रों के मुताबिक जिले के कुल स्कूलों में से करीब 3000 स्कूलों में मिड-डे मील योजना चल रही है. सभी स्कूलों में यह योजना प्रभावित हुई है. बुधवार को बालुरघाट शहर के ललित मोहन आदर्श उच्च विद्यालय में जाने पर देखा गया कि नोटबंदी के चलते मिड-डे मील का बजट घटाना पड़ा है. स्कूल के प्रधान शिक्षक अभिजीत मुखोपाध्याय ने बताया कि विद्यालय में रोज करीब 850 छात्रों के लिए खाना पकता है.

इस पर हर महीने एक-डेढ़ लाख रुपये का खर्च आता है. इस खर्च का ज्यादातर हिस्सा नकद चुकाना होता है. राशन के लिए चेक दिया जाता है, लेकिन 11 रसोई कर्मियों, गैस, सब्जी आदि के लिए पैसा नकद देना पड़ता है. इसके लिए विद्यालय को अभी 60-70 हजार रुपये नकद की जरूरत है. लेकिन बैंक खाते से इतनी रकम निकल नहीं पा रही है. इसकी वजह से विद्यालय प्रबंधन मुसीबत में पड़ गया है. कोई रास्ता नहीं निकलने पर सभी लेनदारों का उधार किया जा रहा है. कोई तो मान जाता है, तो कोई मुंह फेर लेता है. ऐसे में मिड-डे मील का बजट घटाकर काम चलाने के बारे में सोचा जा रहा है.


इधर गंगारामपुर उत्तर सर्किल के कुरुमशुर जूनियर हाईस्कूल के प्रभारी प्रधान शिक्षक लक्ष्मण घोष ने बताया कि बहुत से स्कूलों का मिड-डे मील खाता विभिन्न ग्रामीण बैंकों में है. अभी इन बैंकों में पैसा ही नहीं है. जरूरत के उलट कभी 500 तो कभी 2000 रुपये मिलते हैं. खाना पकानेवाले स्वयं सहायता समूह को चेक से पेमेंट करने के बावजूद खाद्य सामग्री की खरीद के लिए नकद चाहिए. उन्होंने कहा कि किसी तरह बजट कम करके काम चलाया जा रहा है, लेकिन अगर जल्द ही हालात नहीं सुधरे तो क्या होगा, यह समझ में नहीं आ रहा है.
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