उत्तर बंगाल में ‘वर्ग संघर्ष’ की जगह अब ‘पहचान’ की लड़ाई, चाय बागानों से पहाड़ों तक कैसे बदली सियासत? समझें पूरा समीकरण

Published by :Mithilesh Jha
Published at :22 Apr 2026 4:09 PM (IST)
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North Bengal Identity Politics West Bengal Election 2026

North Bengal Identity Politics: उत्तर बंगाल की राजनीति में एक दशक के भीतर बड़ा बदलाव आया है. वर्ग संघर्ष की जगह अब जातीय पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता ने ले ली है. राजबंशी और चाय बागान श्रमिकों के बदलते रुख से 2026 का चुनाव दिलचस्प हो गया है.

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North Bengal Identity Politics: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बीच उत्तर बंगाल का राजनीतिक मिजाज पूरी तरह बदल चुका है. कभी ‘लाल गलियारे’ के नाम से मशहूर यह क्षेत्र, जहां राजनीति का केंद्र ‘वर्ग संघर्ष’ (Class Struggle) और मजदूर अधिकार हुआ करते थे, आज वहां ‘पहचान की राजनीति’ (Identity Politics) हावी है.

टीएमसी और भाजपा के लिए चनौतियां और अवसर

चाय बागानों के श्रमिकों से लेकर राजबंशी और गोरखा समुदायों तक, अब हर कोई अपनी सांस्कृतिक और जातीय पहचान को लेकर मुखर है. राजनीति के इस बड़े बदलाव ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए नयी चुनौतियां और अवसर पैदा कर दिये हैं.

वर्ग संघर्ष से पहचान की ओर : एक बड़ा राजनीतिक बदलाव

दशकों तक उत्तर बंगाल की राजनीति वामपंथी विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमती रही. उस दौर में मुद्दा अमीर बनाम गरीब का था, लेकिन अब तस्वीर बदल गयी है.

  • जातीय अस्मिता का उदय : राजबंशी, कामतापुरी और गोरखा समुदाय अब केवल रोटी-बेटी की बात नहीं करते, वे अपनी भाषा, संस्कृति और अलग राज्य या स्वायत्तता की मांग को चुनावी मुद्दा बना रहे हैं.
  • भाजपा की सेंधमारी : पहचान की इसी राजनीति को भांपते हुए भाजपा ने 2019 और 2021 में यहां जबर्दस्त प्रदर्शन किया था. ‘मां-माटी-मानुष’ की बात करने वाली टीएमसी के लिए यह क्षेत्र एक कठिन चुनौती बना हुआ है.

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चाय बागानों का बदला मिजाज

उत्तर बंगाल की अर्थव्यवस्था की रीढ़ ‘चाय बागान’ अब केवल ट्रेड यूनियन की राजनीति तक सीमित नहीं है. बागानों में काम करने वाली नयी पीढ़ी अब केवल न्यूनतम मजदूरी की बात नहीं करती. उन्हें पट्टा (भूमि अधिकार), बेहतर शिक्षा और अपनी जातीय पहचान का सम्मान चाहिए. आदिवासी और नेपाली भाषी समुदायों के बीच अपनी पहचान को लेकर बढ़ती जागरूकता ने पुराने राजनीतिक समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है.

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कामतापुर और ग्रेटर कूचबिहार की मांग

राजबंशी समुदाय के बीच ‘कामतापुर’ और ‘ग्रेटर कूचबिहार’ की भावनाओं ने उत्तर बंगाल को अशांत और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना दिया है. दोनों प्रमुख दल अब समुदाय के महापुरुषों (जैसे पंचानन बर्मा) के नाम पर योजनाएं शुरू कर रहे हैं. एक पक्ष इसे राज्य के विभाजन की साजिश बताता है, तो दूसरा पक्ष इसे ऐतिहासिक उपेक्षा के खिलाफ हक की लड़ाई करार देता है.

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North Bengal Identity Politics: 2026 में क्या होगा असर?

उत्तर बंगाल की इन 54 सीटों पर इस बार भी वही दल बाजी मारेगा, जो ‘पहचान के इस पेचीदा जाल’ को सुलझाने में कामयाब होगा. विकास के दावों के बीच, पहचान का मुद्दा एक ऐसा अंडरकरंट है, जो किसी भी वक्त चुनावी नतीजों को पलट सकता है. ममता बनर्जी का सांस्कृतिक कार्ड और भाजपा का पहचान आधारित राष्ट्रवाद इस बार आमने-सामने है.

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लेखक के बारे में

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मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 30 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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