सिंगूर की ‘नैनो’ कसक : टाटा के जाने के 18 साल बाद खंडहर में भविष्य ढूंढ़ रहे लोग, न खेती बची न उद्योग, पछता रहे आंदोलनकारी

Published by :Mithilesh Jha
Published at :25 Apr 2026 9:24 PM (IST)
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Singur Tata Nano Project Ground Report West Bengal Election 2026

Singur Tata Nano Project Ground Report: पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा नैनो प्रोजेक्ट हटने के 18 साल बाद भी किसान और युवा बदहाली के शिकार हैं. खेती बर्बाद हो चुकी है और उद्योग आये नहीं. जानें 29 अप्रैल के चुनाव से पहले क्या है यहां का माहौल.

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Singur Tata Nano Project Ground Report: पश्चिम बंगाल की राजनीति का ‘कुरुक्षेत्र’ कहे जाने वाले सिंगूर में आज भी सन्नाटा है. वर्ष 2008 में टाटा मोटर्स की नैनो फैक्टरी के यहां से विदा होने के 18 साल बाद भी यह इलाका दोहरी बर्बादी के बीच फंसा हुआ है. जो जमीन कभी सोना उगलती थी, वह अब बंजर कंक्रीट का ढेर है और जिस फैक्टरी ने रोजगार के सपने दिखाये थे, उसके अवशेषों को अब लोग कबाड़ के रूप में बेच रहे हैं. कभी ममता बनर्जी को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने वाले इस आंदोलन की भूमि पर अब ‘जीत का जश्न’ धीरे-धीरे ‘पछतावे के आंसू’ में बदल गया है.

बंजर जमीन, कंक्रीट का ढेर और कागजी जीत की हकीकत

वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने किसानों को जमीन वापस करने का आदेश दिया, लेकिन हकीकत यह है कि वह जमीन अब खेती के लायक नहीं रही. किसान आशीष बेरा ने बताया कि उन्होंने अपनी तीन बीघा जमीन साफ करने में 1.5 लाख रुपए खर्च किये. फिर भी वहां कुछ नहीं उगता. कंक्रीट और दबे हुए लोहे ने मिट्टी की जान निकाल दी है.

आजीविका का संकट : महादेव दास

आंदोलन का चेहरा रहे महादेव दास, जिनके पास कभी 12 बीघा जमीन, ट्रैक्टर, पावर टिलर और पंप थे. मैंने उस जमीन के इर्द-गिर्द अपना पूरा कारोबार खड़ा कर लिया था. अब मेरे पास कुछ नहीं है. आज वह एक छोटी-सी चाय की दुकान चलाने को मजबूर हैं. उनका कहना है कि उन्होंने ऐसी बंजर जमीन के लिए लड़ाई नहीं लड़ी थी.

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युवाओं का गहराता दर्द- हमें गलत बताया गया था

सिंगूर में सबसे बड़ा बदलाव वहां के लोगों की सोच में आया है. कल तक उद्योग का विरोध करने वाले हाथ आज काम की तलाश में भटक रहे हैं. नैनो संयंत्र के लिए प्रशिक्षण लेने वाले युवा आज ऐप-आधारित टैक्सी चला रहे हैं या राज्य से बाहर पलायन कर चुके हैं.

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Singur Tata Nano Project: सक्रिय कार्यकर्ताओं का पछतावा

पूर्व कार्यकर्ता बिकास दास कहते हैं कि अगर कारखाना रहता, तो आज उनके पास नौकरी होती. स्नातकोत्तर छात्रा साथी दास का कहना है कि पिता को जमीन तो मिली, लेकिन वह रोजगार नहीं दे पायी.

मैंने अपनी तीन बीघा जमीन साफ ​​कराने में ही 1.5 लाख रुपये खर्च कर दिये. इससे पहले हम धान, जूट, आलू और सब्जियां उगाते थे. जमीन उपजाऊ थी. अब उसमें मुश्किल से कुछ उगता है.

आशीष बेरा, किसान

सियासी समीकरण- क्या बदलेगा जनादेश?

बदहाली के बावजूद सिंगूर तृणमूल कांग्रेस (TMC) का अभेद्य किला बना हुआ है. मंत्री और प्रत्याशी बेचाराम मान्ना का कहना है कि लोगों को याद है कि संकट में ममता बनर्जी उनके साथ खड़ी थीं. सड़कों और सामाजिक योजनाओं का लाभ हर घर तक पहुंचा है. दूसरी तरफ, भाजपा का आरोप है कि तृणमूल ने सत्ता पाने के लिए सिंगूर का इस्तेमाल किया. फिर उसे लावारिस छोड़ दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल ही में यहां रैली कर उद्योगों को बाहर करने का आरोप लगाया था.

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2.42 लाख मतदाताओं का फैसला 29 अप्रैल को

सिंगूर निर्वाचन क्षेत्र में ग्रामीण मतदाताओं का दबदबा है. 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण के मतदान में यहां के लोग यह तय करेंगे कि वे ‘सामाजिक योजनाओं’ पर मुहर लगायेंगे या ‘उद्योग और विकास’ की अधूरी चाहत पर. फिलहाल, सिंगूर के खेतों में उगा खर-पतवार और टाटा की फैक्टरी की जंग लगी छड़ें राज्य की राजनीति के एक बड़े बदलाव की गवाह बनी खड़ी हैं.

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मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 30 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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