हावड़ा से हुगली तक चली थी पहली ट्रेन, खामोश शुरुआत से स्वर्णिम अध्याय तक का ऐसा रहा पूर्वी भारत में रेलवे का सफर

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15 अगस्त 1854 को हावड़ा से चली थी पूर्वी भारत की पहली यात्री ट्रेन. फोटो : पीटीआई

भारत में रेलवे की शुरुआत कैसे हुई? सबसे पहले ट्रेन कहां चली. पूर्वी भारत में रेलवे की शुरुआत और उसका इतिहास कैसा है? इन सब सवालों के जवाब भारतीय रेलवे के एक रिटायर्ड ऑफिसर ने दिये हैं. पीके मिश्रा ने एक पुस्तक लिखी है, जिसमें बताया है कि कैसे पश्चिम बंगाल के हावड़ा से पूर्वी भारत की पहली ट्रेन चली और इसकी शुरुआत में क्या-क्या दिक्कतें सामने आयीं.

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पंद्रह अगस्त 1854 का दिन आम दिनों जैसा ही था. यही वह तारीख थी, जो इतिहास में दर्ज होने जा रही थी. न कोई भव्य आयोजन, न भीड़ का शोर. हावड़ा स्टेशन से सुबह ठीक 8:30 बजे एक ब्रिटिश इंजन 5 डिब्बों को लेकर चुपचाप हुगली की ओर बढ़ चला. शांत प्रस्थान के साथ ही पूर्वी भारत में रेलवे युग का आरंभ हुआ. इंजीनियरिंग कौशल की एक ऐसी कहानी शुरू हुई, जिसने आने वाले समय की रफ्तार तय कर दी.

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1860 के दशक में दिल्ली पहुंचा रेल नेटवर्क

जिस ऐतिहासिक उपलब्धि को उस दौर की ईस्ट इंडियन रेलवे (ईआईआर) ने हासिल किया, और जिसका विशाल रेल नेटवर्क आगे चलकर 1860 के दशक तक दिल्ली पहुंचा, उसके पीछे कई दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं भी हैं. इन घटनाओं ने न केवल रेलवे के विस्तार की रफ्तार को कम कर दिया, बल्कि देश के लोगों को इसके महत्व को समझने में भी समय लगा.

रेल्स थ्रू राज : द ईस्ट इंडियन रेलवे (1841–1861)

ईस्ट इंडियन रेलवे (ईआईआर) और उसे खड़ा करने वाली ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी की स्थापना से लेकर विकास तक की कहानी कहती एक किताब आयी है – ‘रेल्स थ्रू राज : द ईस्ट इंडियन रेलवे (1841–1861)’. 19वीं सदी के अनेक दस्तावेजों और विभिन्न आक्राइव्स से मिली जानकारी के आधार पर इस रेलवे और इसे ईंट-दर-ईंट, लोहे-से-लोहे तक गढ़ने वाले लोगों की एक ‘जीवंत दास्तान’ पेश करने का प्रयास करती है यह नयी किताब.

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29 जून को परीक्षण के तौर पर पहली बार चला था इंजन

इस पुस्तक के लेखक पीके मिश्रा लिखते हैं कि उद्घाटन यात्रा से पहले ही ईस्ट इंडियन रेलवे ने बंगाल के लोगों में जिज्ञासा जगा दी थी. 29 जून 1854 को हावड़ा से पांडुआ तक परीक्षण के तौर पर केवल इंजन चलाया गया. इसके बाद 6 जुलाई को उसी मार्ग पर इंजन के साथ एक डिब्बा जोड़कर एक्सपेरिमेंटल जर्नी शुरू की गयी.

1845 में बनी ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी

भारतीय रेल के वरिष्ठ अधिकारी और हेरिटेज कंजर्वेशन के प्रबल समर्थक पीके मिश्रा कहते हैं कि भारत में वर्ष 1853 में रेलवे के आगमन से पहले ही ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी की नींव पड़ चुकी थी. एक जून 1845 को लंदन में एक संयुक्त स्टॉक कंपनी के रूप में ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी बनी थी. इसका कार्यालय कलकत्ता (अब कोलकाता) में था.

आज का हावड़ा स्टेशन और ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी (इनसेट). फोटो : पीटीआई

नौकरशाही की पहाड़ जैसी बाधाओं ने धीमी कर दी काम की रफ्तार

पुस्तक में लिखा है कि कंपनी की स्थापना से पहले ‘औपनिवेशिक नौकरशाही की पहाड़ जैसी बाधाओं’ को हटाना पड़ा. भूमि अधिग्रहण में देरी तथा ढांचागत अड़चनों ने ईस्ट इंडियन रेलवे की रफ्तार धीमी कर दी. इसी का फायदा उठाते हुए ग्रेट इंडियन पेनिन्सुला रेलवे (जीआईपीआर) ने बढ़त बना ली और भारत की पहली रेलवे बनने का गौरव हासिल किया. भारत की पहली रेल यात्री सेवा 16 अप्रैल 1853 को शुरू हुई थी. ट्रेन बॉम्बे (अब मुंबई) से ठाणे तक चली.

1854 में बिछ चुकी थी कलकत्ता से हुगली के बीच रेल पटरियां

‘ईआईआर : द इनॉगरल जर्नी (1854)’ शीर्षक अध्याय में पीके मिश्रा लिखते हैं कि वर्ष 1854 की शुरुआत तक कलकत्ता और हुगली के बीच रेल पटरियां बिछ चुकीं थीं. पूरी तरह तैयार होने के बावजूद रेल लाइन निष्क्रिय पड़ी थीं.

हावड़ा स्टेशन के बाहर ट्रेन का इंजन. फोटो : पीटीआई

‘केजरी’ के जरिये इंग्लैंड से कलकत्ता पहुंची थी इंजनों की पहली खेप

मिश्रा लिखते हैं कि इंजनों की पहली खेप इंग्लैंड से ऑस्ट्रेलिया होते हुए जहाज ‘केजरी’ के जरिये कलकत्ता पहुंची. उस समय हावड़ा में समुचित सुविधाएं नहीं थीं. ऐसे में ‘इन विशाल लोहे के इंजनों’ को उतारना अपने आप में तात्कालिक जुगाड़ और इंजीनियरिंग कौशल की एक बड़ी जीत थी.

बंगाल की खाड़ी में भीषण आपदा ने हालात कर दिये गंभीर

वह लिखते हैं कि ईस्ट इंडियन रेलवे के लिए उस दौर में घट रही इन घटनाओं के बीच कहानी ने एक दुखद मोड़ भी लिया. बंगाल की खाड़ी में आयी एक भीषण आपदा ने हालात और गंभीर कर दिये. यही ईआईआर आजादी के बाद वर्ष 1952 में स्थापित भारतीय सरकार के अधीन पूर्व रेलवे के रूप में विकसित हुई.

91 मिनट में ट्रेन ने तय किया 38 किलोमीटर का सफर

आखिरकार वह निर्णायक पल आया. आज के भव्य स्टेशन भवन से बिल्कुल अलग, हावड़ा में बने एक साधारण से अस्थायी शेड से 15 अगस्त 1854 की सुबह ट्रेन रवाना हुई. लगभग 38 किलोमीटर का सफर तय करते हुए महज 91 मिनट में यह ट्रेन हुगली पहुंच गयी.

ट्रेन की क्षमता से 10 गुना अधिक आये यात्रियों के आवेदन

पीके मिश्रा के अनुसार, इस पहली यात्रा के लिए करीब 3,000 आवेदन आये थे, जो ट्रेन की क्षमता से 10 गुना अधिक थे. इसके बाद 3 फरवरी 1855 को हावड़ा-रानीगंज खंड का उद्घाटन पूरे ठाठ-बाट से हुआ. इस ऐतिहासिक अवसर पर तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी स्वयं हावड़ा स्टेशन पर मौजूद थे. इसी के साथ पूर्वी भारत में रेल इतिहास के एक स्वर्णिम अध्याय की औपचारिक शुरुआत हुई.

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