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इंसेफ्लाइटिस: सामान्य नियमों का भी नहीं हो रहा पालन

Updated at : 04 Aug 2014 9:13 PM (IST)
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इंसेफ्लाइटिस: सामान्य नियमों का भी नहीं हो रहा पालन

कोलकाता संवाददाता सिलीगुड़ी: उत्तर बंगाल में पिछले कुछ महीनों से जारी इंसेफ्लाइटिस की बीमारी को काबू में करने का दावा राज्य सरकार की ओर से भले ही की जा रही हो, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल उलट है. सिलीगुड़ी सहित पूरे उत्तर बंगाल में जापानी दिमागी बुखार इंसेफ्लाइटिस ने महामारी का रूप ले लिया है और […]

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कोलकाता संवाददाता

सिलीगुड़ी: उत्तर बंगाल में पिछले कुछ महीनों से जारी इंसेफ्लाइटिस की बीमारी को काबू में करने का दावा राज्य सरकार की ओर से भले ही की जा रही हो, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल उलट है. सिलीगुड़ी सहित पूरे उत्तर बंगाल में जापानी दिमागी बुखार इंसेफ्लाइटिस ने महामारी का रूप ले लिया है और सातों जिले में इसको लेकर रेड अलर्ट जारी है.

इसके बावजूद राज्य के स्वास्थ्य विभाग द्वारा सामान्य नियमों तक का पालन नहीं किया जा रहा है. उत्तर बंगाल के विभिन्न इलाकों में अब तक 100 से भी अधिक लोगों की मौत इस बीमारी से हो चुकी है. इसके अलावा सैकड़ों लोग उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज एवं जिले के विभिन्न अस्पतालों में भरती हैं.

क्या है नियम

स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इंसेफ्लाइटिस की बीमारी से जिस रोगी की मौत होती है, उसके घर तथा आसपास के इलाकों में ऐहतियात के तौर पर कुछ कदम उठाने पड़ते हैं. इसके अनुसार जिस रोगी की मौत हुई है, उसके घर तथा आसपास के 100 मीटर के इलाके में फोगिंग तथा स्प्रे द्वारा मच्छरों को मारने का प्रावधान है. इसके अलावा उस 100 मीटर के इलाके में जितने लोग रहते हैं उन सबों के स्वास्थ्य की जांच होगी.

अनिवार्य रूप से सभी के रक्त का नमूना संग्रह होगा और इसकी जांच की जायेगी. अगर रक्त की नमूने की जांच के बाद कोई संदिग्ध मरीज निकला, तो राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा उसकी चिकित्सा की जाएगी. स्वास्थ्य विभाग ने ही इस नियम को निर्धारित किया है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के द्वारा ही इन नियमों की अनदेखी भी की जा रही है.

उत्तर बंगाल में दक्षिण दिनाजपुर से लेकर कूचबिहार जिले तक कोई ऐसा जिला नहीं है, जहां इंसेफ्लाइटिस की बीमारी से किसी न किसी की मौत नहीं हुई है. लेकिन कहीं भी इन नियमों का पालन नहीं किया गया है.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

इस संबंध में वेस्ट बंगाल वोलंटियर ब्लड डोनर्स फोरम की ओर से सोमनाथ चटर्जी ने बताया कि इस बीमारी ने भले ही जितना ही घातक रूप धारण क्यों न कर लिया हो, राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही वाला रवैया जस की तस बनी हुई है. उन्होंने कहा कि सिलीगुड़ी में ही इस नियम का पालन नहीं किया गया. सिलीगुड़ी तथा इसके आसपास के इलाके मिलन मोड़, गुलमा चाय बागान तथा नक्सलबाड़ी इलाके में इंसेफ्लाइटिस से कई रोगियों की मौत हुई, लेकिन कहीं भी स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी या कर्मचारी जांच के लिए नहीं पहुंचे.

श्री चटर्जी ने कहा कि यह एक गंभीर बीमारी है और मच्छरों तथा सुकरों की वजह से इसके फैलने की संभावना अधिक होती है. यही कारण है कि जिस घर में इंसेफ्लाइटिस की बीमारी से किसी रोगी की मौत हुई हो, वहां से मच्छरों का प्रकोप पूरी तरह से खत्म करने के लिए फोगिंग एवं मच्छरनाशक तेल के छिड़काव का प्रावधान है. इतना ही नहीं, आसपास के इलाके में कोई और इसके वायरस से प्रभावित नहीं हुआ है इसकी जांच करनी पड़ती है. लेकिन कहीं भी इन नियमों का पालन नहीं हो रहा है.

दूसरी तरफ उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज सहित विभिन्न जिला अस्पतालों में रोगियों के भरती होने का सिलसिला जारी है, लेकिन इन लोगों को आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिल रही है. रोगियों के परिजनों ने सरकारी अस्पतालों में सामान्य दवा भी उपलब्ध नहीं होने की शिकायत की है. इन लोगों का आरोप है कि अधिकांश दवाएं बाहर की दुकानों से खरीदनी पड़ रही है, जबकि राज्य सरकार ने सरकारी खर्चे पर इंसेफ्लाइटिस पीडि़त रोगियों की चिकित्सा कराने की घोषणा की है.

इस संबंध में रोगियों के कुछ परिजनों ने बताया कि उन्होंने भी राज्य सरकार द्वारा ऐसी घोषणाएं किये जाने की खबर सुन रखी है. लेकिन अब तक कोई लाभ नहीं हुआ है. फिर भी मरीजों के परिजन बाहर से दवा खरीद कर बिल सुरक्षित रख रहे हैं. इनका कहना है कि हो सकता है कि राज्य सरकार देर-सबेर इस बिल का भुगतान कर दे.

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