केंद्र व राज्य में सियासी पैठ बनायी है पलामू के नेताओं ने
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 06 Apr 2024 12:16 AM
पलामू राजनीतिक रूप से काफी समृद्ध रहा है. एकीकृत बिहार के जमाने से यहां के नेताओं की मजबूत पकड़ राज्य के साथ केंद्र की राजनीति में भी रही. इसके बावजूद यहां के नेताओं के केंद्र सरकार में भागीदारी कम ही रही है.
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केंद्र में मंत्री के साथ सात राज्यों के राज्यपाल रहे हैं पलामू के भीष्म नारायण सिंह
कोयलांचल में ददई ने जीता था चुनाव, रांची रही है सुबोधकांत की कर्मभूमिअविनाश, रांची
पलामू राजनीतिक रूप से काफी समृद्ध रहा है. एकीकृत बिहार के जमाने से यहां के नेताओं की मजबूत पकड़ राज्य के साथ केंद्र की राजनीति में भी रही. इसके बावजूद यहां के नेताओं के केंद्र सरकार में भागीदारी कम ही रही है. पलामू संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित सांसदों में कमला कुमारी को इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में केन्द्रीय उपमंत्री का पद मिला था. इस पद पर 1982 से 83 तक रही थीं. कमला कुमारी को कृषि और ग्रामीण पुनर्निर्माण विभाग का दायित्व मिला था. वही पलामू से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करनेवाले भीष्म नारायण सिंह (अब स्वर्गीय ) को इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में केंद्रीय मंत्री के साथ-साथ सात राज्यों का राज्यपाल भी बनने का अवसर मिला. वर्ष 1984 से 1989 तक वे असम और मेघालय (सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश का अतिरिक्त प्रभार) के राज्यपाल रहे . साथ ही 1991 से 1993 तक वह तमिलनाडु के राज्यपाल भी रहे, जिसमें पुंडुचेरी (तत्कालीन पांडिचेरी) और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का अतिरिक्त प्रभार भी था.भीष्म नारायण सिंह ने 1967 में पहली बार एकीकृत बिहार मेंं पलामू के हुसैनाबाद विधानसभा का चुनाव जीता था. चुनाव जीतने के बाद बिहार के शिक्षा मंत्री बने. 1972 में दुबारा विधायक बने और बिहार में खान मंत्री बनाये गये. इसके बाद 1976 में वह पहली बार राज्यसभा के लिए चुने गये और 1980 में इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में संसदीय कार्य मंत्री की जिम्मेदारी निभायी. 1983 में वह केंद्रीय खाद्य आपूर्ति मंत्री भी बने. इसके पूर्व 1980 में वह संसदीय मामलों के राज्य मंत्री रहे और 1980 से 1983 तक संचार, श्रम और गृह निर्माण विभाग का भी अतिरिक्त प्रभार उनके पास रहा. भीष्म नारायण सिंह मूल रूप से पलामू जिला के छतरपुर प्रखंड के उदयगढ़ के रहनेवाले थे. वैसे देखा जाये तो भीष्म नारायण सिंह के बाद इंदर सिंह नामधारी ने भी पलामू से राजनीति शुरू कर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान स्थापित की. एकीकृत बिहार में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे. लालू प्रसाद के मंत्रिमंडल में भू -राजस्व मंत्री रहे. अलग झारखंड बना तो राज्य के प्रथम विधानसभाध्यक्ष भी बने. इसके अलावा मूल रूप से पलामू के ही सुबोधकांत सहाय ने राजनीति में रांची को अपनी कर्मभूमि बनाया, कई दफा संसदीय चुनाव जीता और केंद्र में मंत्री भी रहे. श्री सहाय पलामू के तरहसी प्रखंड के निवासी हैं.
2004 में झारखंड की चार लोकसभा सीट जीती थी पलामू के नेताओं नेअलग राज्य गठन के बाद वर्ष 2004 में लोकसभा चुनाव में झारखंड की 14 सीटों में चार सीटों पर पलामू के धरती पुत्रों ने जीत दर्ज की थी. इसमें पलामू से राजद के मनोज कुमार, धनबाद से चंद्रशेखर दुबे उर्फ ददई दुबे ,रांची से सुबोधकांत सहाय और लोहरदगा से रामेश्वर उरांव ने जीत दर्ज की थी. चंद्रशेखर दुबे पलामू के विश्रामपुर से कई दफा विधायक रहे हैं. श्री उरांव (वर्तमान में राज्य सरकार के मंत्री ) मूल रूप से पलामू के सदर प्रखंड के चियांकी के रहनेवाले हैं. 2009 के चुनाव में भी चतरा से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में इंदरसिंह नामधारी और रांची से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में सुबोधकांत सहाय ने चुनाव जीता था. कुल मिला कर देखा जाये तो पलामू से निकल कर यहां के नेताओं ने राजनीति में अपनी गहरी पैठ बनायी है. अपनी परंपरागत सीट को छोड़ कर बाहर निकल कर चुनाव में जीत हासिल कर राजनीति में अपना दम-खम दिखाया है. देखा जाये तो 2004 के पहले पलामू में विधायक रहते राज्य के किसी दूसरे संसदीय क्षेत्र में जा कर जीत दर्ज का कोई इतिहास नहीं था. ऐसा पहली बार ददई दुबे ने किया था. इसके पूर्व 1996 में नामधारी जमशेदपुर से भी चुनाव लड़े पर महाभारत सीरियल में कृष्ण की भूमिका अदा करनेवाले भाजपा प्रत्याशी नीतिश भारद्वाज से चुनाव हार गये थे. अलग राज्य गठन के बाद वर्ष 2004 के चुनाव जदयू प्रत्याशी के तौर पर नामधारी ने चतरा संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़े. लेकिन, सफलता नहीं मिल पायी. 2009 में फिर चतरा संसदीय क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ कर जीत दर्ज की. इनके बाद पलामू का कोई नेता अपनी परंपरागत सीट को छोड़ कर संसद तक नही पहुंच पाया है.
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