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आज के राष्‍ट्रवाद से कितना अलग था प्रेमचंद का राष्‍ट्रवाद...!

Updated at : 31 Jul 2018 7:21 PM (IST)
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आज के राष्‍ट्रवाद से कितना अलग था प्रेमचंद का राष्‍ट्रवाद...!

मुंशी प्रेमचंद की 138वीं जयंती पर संगोष्‍ठी का आयोजन रांची : आज के इस आत्ममुग्धता के दौर में प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता पर चर्चा के लिए इप्टा, प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ के संयुक्त तत्वाधान में ‘प्रेमचंद साहित्य के आलोक में राष्ट्र की संकल्पना’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गयी. उनके 138वीं जयंती […]

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मुंशी प्रेमचंद की 138वीं जयंती पर संगोष्‍ठी का आयोजन

रांची : आज के इस आत्ममुग्धता के दौर में प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता पर चर्चा के लिए इप्टा, प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ के संयुक्त तत्वाधान में ‘प्रेमचंद साहित्य के आलोक में राष्ट्र की संकल्पना’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गयी. उनके 138वीं जयंती पर आयोजित इस संगोष्ठी में रणेंद्र जी ने प्रेमचंद के एक लेख ‘क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं’ पर चर्चा की. साथ ही आजादी के बात के समता वाले समाज पर भी उनके विचार पर प्रकाश डाला.

उन्होंने कहा कि राष्ट्र जो है, नक्शे पर खिंची कोई रेखा नहीं है. जब राष्ट्र गौरव की बात होती है तो वो राष्ट्र के लोगों की गरिमा की बात होती है. आज हमारे बीच की राष्ट्र की जिस संकल्पना की बात हो रही है वह हमारे शास्त्रों में वर्णित ‘वसुधैव कुटुम्‍बकम’ की कल्पना को बांध देती है.

जमशेद कमर ने आज के समय और प्रेमचंद के साहित्य में वर्णित देश की परिकल्पना पर चर्चा की. महादेव टोप्पो ने ‘पूस की रात’ कहानी में किसान के चरित्र चित्रण को प्रेमचंद ने किस प्रकार जीवंत किया और कैसे उन्होंने आम भारतीय जीवन को अपनी कहानियों में पिरोया उसपर प्रकाश डाला. उन्‍होंने कहा कि प्रेमचंद ‘मैं’ की नहीं ‘हम’ की कहानी कहते थे.

कार्यक्रम में पंकज मित्र ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियां हमेशा से ही संवेदना मुख्य स्वर के रूप में रही है और प्रश्न किया कि क्या वही संवेदना वाला भारत हम फिर से बना पायेंगे. अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में वरिष्ठ कथाकार कौलेश्वर जी ने प्रेमचंद के एक लेख ‘जीवन में साहित्य के स्थान’ पर चर्चा की.

संगोष्ठी के बात प्रेमचंद की कहानी ‘कफन’ का नाटकीय पाठ पंकज मित्र एवं दिनेश लाल के द्वारा किया गया. उसके बाद प्रेमचंद की कहानी पर आधारित और सत्यजीत रे निर्देशित फिल्म ‘सद्गति’ दिखायी गयी. आयोजन के अंत मे ललित आदित्य ने धन्यवाद ज्ञापन किया.

संगोष्ठी में उमेश नजीर, ललित आदित्य, हृषिकेश फरजाना फारूकी, मेहुल, वीना श्रीवास्तव, कुमार बृजेन्द्र, संगीता कुजारा, रश्मि शर्मा, भारती जी, रमजान कुरैशी प्रकाश देवकुलिश इत्यादि उपस्थित थे.

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